राजस्वकर्मियों को जीपीएस से लैस मिलेगा बाइक

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार सहित देश के कई राज्यों में भूमि विवाद सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक समस्याओं की जड़ रहा है। खेत की मेड़ से लेकर शहरी जमीनों तक, दाखिल-खारिज, सीमांकन, कब्जा, उत्तराधिकार और रजिस्ट्रेशन से जुड़े मामलों ने आम नागरिकों को वर्षों तक अदालतों और दफ्तरों का चक्कर कटवाता है। आंकड़ा बताता है कि देश की अदालतों में लंबित मामलों में एक बड़ा हिस्सा भूमि विवादों से जुड़ा है। बिहार में तो यह समस्या और भी विकराल रूप ले चुका है।

ऐसे में राज्य सरकार द्वारा राजस्व कर्मचारियों को जीपीएस से लैस बाइक देने की घोषणा न केवल तकनीकी सुधार का संकेत है, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही, पारदर्शिता और समयबद्ध समाधान की दिशा में एक क्रांतिकारी पहल के रूप में देखा जा रहा है।

मुजफ्फरपुर में आयोजित जनकल्याण संवाद कार्यक्रम के दौरान उपमुख्यमंत्री सह राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री विजय कुमार सिन्हा द्वारा की गई यह घोषणा, आम जनता में नई उम्मीद जगा रही है।

जनकल्याण संवाद कार्यक्रम का उद्देश्य सरकार और आम जनता के बीच सीधा संवाद स्थापित करना है। इस मंच पर लोग बिना किसी बिचौलिये के अपनी समस्याएं सीधे मंत्रियों और वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रख सकते हैं। 

मुजफ्फरपुर में आयोजित इस संवाद में भूमि विवाद, दाखिल-खारिज में देरी, अंचल कार्यालयों में भ्रष्टाचार, मापी और सीमांकन में अनियमितता और ऑनलाइन सेवाओं में तकनीकी बाधाएं, जैसे मुद्दे प्रमुख रूप से सामने आया है।

उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि अब भूमि मामलों में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी और जनता की समस्याओं का समाधान अधिकतम 15 दिनों (एक पखवाड़े) के भीतर किया जाएगा।

राजस्व कर्मचारियों, विशेष रूप से राजस्व कर्मचारी, अमीन और अंचल स्तर के फील्ड स्टाफ, की कार्यप्रणाली को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। लोकेशन ट्रैकिंग- कर्मचारी किस क्षेत्र में गए हैं, कितनी देर रुके हैं, कितने मामलों का निष्पादन किया है। फर्जी रिपोर्ट पर रोक- बिना स्थल निरीक्षण के रिपोर्ट देने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना, समयबद्ध कार्रवाई- सीमांकन, मापी और निरीक्षण में देरी कम होगी। भ्रष्टाचार पर लगाम- “नजराना” और अनौपचारिक लेन-देन पर रोक लगाना, जनता का भरोसा बहाल- नागरिक जान सकेंगे कि उनका मामला वास्तव में जमीन पर देखा गया है या नहीं।

राज्य सरकार पहले ही कई डिजिटल सुधार लागू कर चुकी है। ऑनलाइन दाखिल-खारिज, भूमि रिकॉर्ड का डिजिटलीकरण, भू-अभिलेख पोर्टल और ऑनलाइन म्यूटेशन ट्रैकिंग। अब जीपीएस बाइक के जुड़ने से फील्ड स्तर की निगरानी भी डिजिटल हो जाएगा।

उपमुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि यदि कोई कर्मचारी निर्धारित समय सीमा में कार्य नहीं करता है, या गलत रिपोर्ट देता है, तो उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई तय है। यह पहली बार है जब राजस्व विभाग में परफॉर्मेंस आधारित निगरानी को इस स्तर पर लागू किया जा रहा है।

भूमि विवाद के प्रमुख कारण होता है अस्पष्ट रिकॉर्ड, पुराने नक्शे और कागजात, संयुक्त परिवारों में बंटवारे का अभाव, अवैध कब्जा और स्थानीय स्तर पर मिलीभगत।सरकार के समाधानात्मक कदम है विशेष भूमि विवाद निपटारा शिविर, अंचल स्तर पर लोक शिकायत सुनवाई, ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और समयबद्ध अपील प्रणाली। जीपीएस बाइक योजना इन सभी प्रयासों को जमीनी स्तर पर मजबूती देगी।

राजस्व विभाग वह कड़ी है जो सीधे आम आदमी के जीवन से जुड़ी है। खेत, घर, दुकान, सब कुछ भूमि से जुड़ा है। लेकिन वर्षों से शिकायत रही है कि बिना रिश्वत काम नहीं होता है। महीनों तक फाइलें अटकी रहती हैं और कर्मचारी मौके पर नहीं पहुंचते हैं। इसलिए सरकार ने निगरानी को सख्त और तकनीक आधारित बनाने का फैसला किया है।

मुजफ्फरपुर जनकल्याण संवाद में शामिल लोगों ने इस घोषणा का स्वागत किया है। कई नागरिकों ने कहा कि “अगर यह योजना सही तरीके से लागू हुई, तो गरीबों को बहुत राहत मिलेगी।” “अब कर्मचारी बहाने नहीं बना पाएंगे कि वे मौके पर गए थे।”

राजनीतिक दृष्टि से सरकार की सुशासन की छवि मजबूत होगी। जनता के बीच विश्वसनीयता में वृद्धि होगी। विपक्ष के आरोपों का जवाब मिलेगा। प्रशासनिक दृष्टि से भी सिस्टम में अनुशासन आएगा। डेटा आधारित निर्णय होगी और शिकायतों में कमी आएगी।

सरकार संकेत दे चुकी है कि आने वाले समय में मोबाइल ऐप से फील्ड रिपोर्टिंग होगा, ड्रोन से भूमि सर्वेक्षण किया जाएगा।  AI आधारित विवाद पहचान प्रणाली लागू होगी और डिजिटल नक्शा अपडेट होगा, जैसे कदम भी उठाया जा सकता है।

हालांकि योजना सराहनीय है, लेकिन कुछ चुनौतियां भी होगी, जैसे- तकनीकी प्रशिक्षण, जीपीएस सिस्टम की विश्वसनीयता, डेटा सुरक्षा और ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क समस्या, इन सभी पर सरकार को समानांतर रूप से काम करना होगा।

राजस्व कर्मचारियों को जीपीएस से लैस बाइक देने की घोषणा केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है, बल्कि शासन की सोच में बदलाव का प्रतीक है। यह दिखाता है कि सरकार अब जवाबदेही चाहती है। तकनीक को अपनाने को तैयार है और जनता की पीड़ा को गंभीरता से ले रही है। यदि यह योजना प्रभावी ढंग से लागू होती है, तो आने वाले वर्षों में बिहार में भूमि विवादों में ऐतिहासिक कमी देखी जा सकती है।



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