जम्मू-कश्मीर का पुंछ जिला, जो दशकों से भारत-पाकिस्तान सीमा तनाव, गोलाबारी और संघर्ष की कहानियों का साक्षी रहा है, अब एक नई पहचान की ओर बढ़ रहा है। नियंत्रण रेखा (एलओसी) के निकट बसे सीमावर्ती गांव बांदीचेचियां के बनवत व्यू पॉइंट पर 105 फुट ऊंचे राष्ट्रीय ध्वज की आधारशिला रखे जाने के साथ ही यह इलाका केवल सामरिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि भावनात्मक और प्रतीकात्मक रूप से भी राष्ट्रीय चेतना का मजबूत स्तंभ बनता जा रहा है। यह तिरंगा केवल कपड़े का ध्वज नहीं होगा, बल्कि यह उन भावनाओं, बलिदानों और संघर्षों का प्रतिनिधित्व करेगा, जो इस क्षेत्र के लोगों और भारतीय सेना ने वर्षों से झेला है।
पुंछ जिला जम्मू-कश्मीर के उन सीमावर्ती इलाकों में से है, जहां इतिहास की परतें बार-बार संघर्ष और पुनर्निर्माण की गाथा लिखता रहा है। 1947 से लेकर अब तक, इस क्षेत्र ने कई युद्धों, संघर्षविराम उल्लंघनों और आतंकी घटनाओं का सामना किया है। यहां के लोग गोलियों की आवाज के बीच जीना जानते हैं, बंकरों में शरण लेते हुए भी अपने खेतों और घरों से प्रेम करते हैं और हर बार हालात सामान्य होते ही जीवन को फिर से संवारने में जुट जाते हैं।
इन गांवों के बच्चों ने बचपन में खिलौनों से ज्यादा सेना की चौकियों, तारबंदी और बंकर देखे हैं। बावजूद इसके, उनके मन में भारत के प्रति जो लगाव है, वह किसी महानगर में रहने वाले नागरिक से कम नहीं है। ऐसे में 105 फुट ऊंचे तिरंगे की स्थापना, उनके आत्मसम्मान और देशभक्ति की भावना को नई ऊंचाई देने वाला कदम है।
105 फुट की ऊंचाई अपने आप में एक संदेश है। यह ऊंचाई बताता है कि भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता किसी भी चुनौती से ऊपर है। सीमावर्ती गांव में इतने विशाल राष्ट्रीय ध्वज की स्थापना यह स्पष्ट करता है कि यह इलाका न केवल भौगोलिक रूप से, बल्कि भावनात्मक रूप से भी भारत का अभिन्न हिस्सा है।
तिरंगा जब हवा में लहराएगा, तो उसकी हर लहर उन सैनिकों को सलाम होगी, जो दिन-रात सीमा की रक्षा में तैनात रहते हैं। यह ध्वज उन नागरिकों के धैर्य को भी सम्मान देगा, जिन्होंने वर्षों तक अनिश्चितता और खतरे के बीच जीवन बिताया है, लेकिन कभी अपने देश पर भरोसा नहीं छोड़ा।
इस तिरंगे की आधारशिला ऐस ऑफ स्पेड्स डिवीजन के जनरल ऑफिसर कमांडिंग मेजर जनरल कौशिक मुखर्जी द्वारा रखी गई। यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दर्शाता है कि भारतीय सेना अब केवल सुरक्षा बल नहीं है, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों में सामाजिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव का भी माध्यम बन रहा है।
सेना द्वारा ऐसे प्रतीकात्मक कदम उठाने का उद्देश्य केवल ध्वज फहराना नहीं है, बल्कि स्थानीय आबादी के मन में यह विश्वास मजबूत करना है कि राष्ट्र उनके साथ खड़ा है। स्कूलों के निर्माण, स्वास्थ्य शिविरों, सड़क और संचार सुविधाओं के विकास के साथ-साथ ऐसे राष्ट्रीय प्रतीकों की स्थापना सेना और नागरिकों के बीच भरोसे की डोर को और मजबूत करता है।
बांदीचेचियां गांव का बनवत व्यू पॉइंट न केवल एक खूबसूरत प्राकृतिक स्थल है, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां से नियंत्रण रेखा से लगे कई इलाके दिखाई देता है। ऐसे स्थान पर तिरंगे की स्थापना यह संदेश देता है कि भारत अपनी सीमाओं को लेकर न केवल सजग है, बल्कि गर्व से उन्हें संजो भी रहा है।
यह व्यू पॉइंट भविष्य में स्थानीय लोगों और पर्यटकों के लिए भी एक आकर्षण का केंद्र बन सकता है। यहां आने वाले लोग तिरंगे को नमन करते हुए सीमा पर रहने वाले नागरिकों और सैनिकों की कहानी को करीब से महसूस कर सकेंगे।
महानगरों में राष्ट्रवाद अक्सर भाषणों, रैलियों और सोशल मीडिया पोस्ट तक सीमित रह जाता है। लेकिन सीमावर्ती गांवों में राष्ट्रवाद जीवन का हिस्सा होता है। यहां हर दिन यह तय नहीं होता है कि शाम शांति से कटेगी या गोलाबारी की आवाज सुनाई देगी। ऐसे माहौल में तिरंगे का लहराना लोगों को यह एहसास दिलाता है कि उनका संघर्ष व्यर्थ नहीं है।
105 फुट ऊंचा तिरंगा इन गांवों के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। यह उन्हें बताएगा कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, उनका भविष्य और उनकी पहचान भारत के साथ सुरक्षित है।
बांदीचेचियां और आसपास के गांवों के निवासियों के लिए यह आयोजन केवल एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह उनके जीवन के संघर्षों को मान्यता देने का क्षण था। बुजुर्गों की आंखों में गर्व के आंसू थे, तो युवाओं के चेहरों पर आत्मविश्वास की चमक।
स्थानीय लोगों का मानना है कि इतने बड़े तिरंगे की स्थापना से न केवल उनका मनोबल बढ़ेगा, बल्कि बाहरी दुनिया को भी यह संदेश जाएगा कि सीमावर्ती इलाकों के लोग खुद को अकेला नहीं मानते। यह ध्वज उनके और राष्ट्र के बीच भावनात्मक सेतु का काम करेगा।
तिरंगा भारत की विविधता में एकता का प्रतीक है। जब यह ध्वज पुंछ के सीमावर्ती गांव में लहराएगा, तो यह केवल वहां रहने वालों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक संदेश होगा। यह बताएगा कि भारत की आत्मा उसकी सीमाओं पर भी उतनी ही मजबूत है, जितनी उसके दिल यानि राजधानी और महानगरों में।
यह कदम उन ताकतों को भी स्पष्ट संदेश देता है, जो भारत की एकता और अखंडता पर सवाल उठाती हैं। तिरंगा यह याद दिलाता है कि भारत केवल एक भूखंड नहीं है, बल्कि साझा मूल्यों और संकल्पों का राष्ट्र है।
105 फुट ऊंचा तिरंगा और बनवत व्यू पॉइंट आने वाले समय में देशभक्ति पर्यटन का केंद्र बन सकता है। जैसे वाघा बॉर्डर पर होने वाला बीटिंग रिट्रीट लोगों को आकर्षित करता है, वैसे ही पुंछ का यह स्थल भी पर्यटकों के लिए खास आकर्षण बन सकता है।
पर्यटन बढ़ने से स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी लाभ होगा। छोटे व्यवसाय, होमस्टे, स्थानीय हस्तशिल्प और परिवहन सेवाओं को नया गति मिल सकता है। इस तरह तिरंगा केवल भावनात्मक ही नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से भी क्षेत्र के विकास में योगदान दे सकता है।
सीमावर्ती इलाकों के युवाओं के सामने चुनौतियां भी अधिक हैं और अवसर भी सीमित। ऐसे में राष्ट्रीय प्रतीकों का महत्व और बढ़ जाता है। 105 फुट ऊंचा तिरंगा यह याद दिलाएगा कि वे जिस भूमि पर खड़े हैं, वह बलिदानों से सींची गई है।
यह ध्वज उन्हें शिक्षा, सेवा और राष्ट्र निर्माण के रास्ते पर आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करेगा। सेना, प्रशासन और समाज के बीच सहयोग से यह उम्मीद किया जा सकता है कि आने वाले वर्षों में पुंछ के युवा देश के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी पहचान बनाएंगे।
तिरंगे का केसरिया रंग साहस और बलिदान का प्रतीक है, यह उन सैनिकों और नागरिकों की याद दिलाता है, जिन्होंने सीमा की रक्षा में अपने प्राण न्योछावर किए। सफेद रंग शांति और सत्य का प्रतीक है, यह उस दिन की कामना करता है, जब सीमावर्ती गांव बिना डर के चैन की सांस ले सकें। हरा रंग समृद्धि और आशा का प्रतीक है, यह भविष्य में विकास और खुशहाली की उम्मीद जगाता है। इन तीनों रंगों का मेल पुंछ जैसे इलाकों में और भी अर्थपूर्ण हो जाता है, जहां साहस, शांति और आशा, तीनों की समान आवश्यकता है।
105 फुट ऊंचे तिरंगे की स्थापना एक शुरुआत है, अंत नहीं। यह प्रतीक तभी सार्थक होगा, जब इसके साथ विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसर भी बढ़ें। सीमावर्ती गांवों को केवल रणनीतिक नजरिए से नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखा जाना चाहिए। यदि इस प्रतीक के साथ-साथ सरकार और समाज मिलकर इन इलाकों के समग्र विकास पर ध्यान दें, तो पुंछ जैसे जिले आने वाले समय में संघर्ष की नहीं, बल्कि प्रगति की मिसाल बन सकता है।
पुंछ के बांदीचेचियां गांव में 105 फुट ऊंचे तिरंगे की आधारशिला केवल एक निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि एक भावनात्मक घोषणा है। यह घोषणा है कि भारत अपनी सीमाओं को केवल मानचित्र पर नहीं, बल्कि दिलों में भी सुरक्षित रखता है। यह तिरंगा हर उस व्यक्ति को नमन करेगा, जिसने सीमा पर रहते हुए देश की एकता और अखंडता को अपने जीवन से ऊपर रखा है।
