बिहार ने वर्षों की मेहनत और चिकित्सा प्रयासों के बाद आखिरकार कालाजार उन्मूलन के राष्ट्रीय लक्ष्य को हासिल कर लिया है। यह उपलब्धि केवल सरकारी योजनाओं की सफलता नहीं है, बल्कि लाखों स्वास्थ्यकर्मियों, आशा कार्यकर्ताओं और ग्रामीण समुदायों की सामूहिक जीत भी है। अब राज्य सरकार अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाने जा रही है, राज्य को कालाजार मुक्त घोषित करने का। इसी उद्देश्य से स्वास्थ्य विभाग 21 दिसंबर से एक व्यापक घर-घर खोज अभियान शुरू करने जा रहा है, जिसके तहत 32 जिलों में संभावित मरीजों की तलाश की जाएगी।
हालाँकि बिहार में कालाजार के मामलों में भारी कमी आई है, लेकिन बीमारी का पूरी तरह उन्मूलन तभी संभव है जब नए मामलों का समय पर पता चल सके और उसका तुरंत उपचार किया जाए। इसके लिए आवश्यक है कि कोई छिपा हुआ या प्रारंभिक स्तर का मरीज अनदेखा न रह जाए।
इस अभियान में मुख्य रूप से दो प्रकार के मरीजों की खोज की जाएगी। पहला कालाजार (Visceral Leishmaniasis) के नए संभावित मरीज और दूसरा पोस्ट-कालाजार डर्मल लाइशमैनियासिस (PKDL) के रोगी, जिनमें इलाज के बाद त्वचा पर दाग-धब्बे उभर आते हैं और जो संक्रमण फैलाने का स्रोत भी बन सकते हैं।
21 दिसंबर से स्वास्थ्य विभाग की प्रशिक्षित टीमें 32 जिलों में घर-घर जाएंगी। आशा कार्यकर्ताओं, स्वास्थ्य सेवकों और निगरानी टीमों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया है, ताकि किसी भी संदिग्ध लक्षण की पहचान तुरंत हो सके। घरों में लोगों से जानकारी ली जाएगी, उनके स्वास्थ्य की जांच की जाएगी और अगर कालाजार के संभावित लक्षण मिले तो उन्हें तुरंत चिकित्सा केंद्रों तक ले जाया जाएगा। जिलों में विशेष लैब और जांच केंद्रों को भी अलर्ट पर रखा गया है ताकि तेजी से निदान संभव हो सके।
PKDL अक्सर कालाजार के उपचार के बाद उभरता है। इस बीमारी में त्वचा पर सफेद या लाल चकत्ते दिखाई देता है। मरीज को गंभीर परेशानी तो नहीं होती है, लेकिन यह संक्रमण को फैलाने का प्रमुख माध्यम बन सकता है। इसलिए इन रोगियों की पहचान और उपचार कालाजार उन्मूलन की अंतिम सीढ़ी माना जाता है। स्वास्थ्य विभाग का यह अभियान PKDL के मरीजों की समय पर पहचान कर संक्रमण की संभावित श्रृंखला को तोड़ने में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
बिहार एक समय कालाजार से सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में गिना जाता था। लेकिन पिछले वर्षों में बेहतर स्वास्थ्य अवसंरचना, जागरूकता, कीटनाशक छिड़काव और तेजी से चलाए गए उपचार कार्यक्रमों ने इसकी स्थिति नाटकीय रूप से बदली है। अब अंतिम चरण में प्रवेश करते हुए राज्य इस बीमारी को हमेशा के लिए खत्म करने की तैयारी में है।
21 दिसंबर से शुरू होने वाला घर-घर खोज अभियान न केवल राज्य की सुदृढ़ स्वास्थ्य व्यवस्था की निशानी है, बल्कि एक स्वस्थ, सुरक्षित और रोगमुक्त बिहार की दिशा में निर्णायक कदम भी है।
