पूस की रात - जब अँधेरा सिर्फ मौसम नहीं - समय भी बन जाता है

Jitendra Kumar Sinha
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पूस की रात अब केवल कैलेंडर की एक तिथि नहीं रही। यह एक ऐसी अवस्था बन चुकी है, जो ईमान से लेकर व्यापार तक, गाँव से लेकर वैश्विक राजधानी तक, और संवेदना से लेकर सत्ता के गलियारों तक, सबको अपनी चपेट में ले चुकी है। यह रात बिहार की गलियों में हाड़ तोड़ती ठंड बनकर उतरती है, तो दिल्ली के संसद भवन में कानून बनकर, ढाका में तख्तापलट की राख बनती है, तो वाशिंगटन में नैतिकता के अंतिम आवरण को जलाकर राख कर देती है। यह वह रात है जिसमें सब कुछ होता है, लेकिन कुछ भी स्पष्ट नहीं होता है।

पश्चिमी हिम ब्यार की मार से कंपकंपाता बिहार, घने निहार (कोहरे) में डूबा हुआ, मानो खुद अपने भविष्य को देखने में असमर्थ खड़ा है। सड़कों पर सिकुड़ते शरीर, फुटपाथ पर जलती अलाव की लपटें, और आंखों में जमी उम्मीद, यह पूस की रात का स्थायी चित्र है। यह ठंड सिर्फ देह को नहीं तोड़ती, यह आत्मा को भी परखती है, पर इसी कठोरता में कुछ वर्गों के लिए यह रात जन्नत बन जाता है।

जहाँ आम जन के लिए यह रात जीने की चुनौती है, वहीं कुंभिलो, यानि सत्ता, तंत्र और संरक्षण में पलने वाले वर्ग के लिए यह अवसर है। भवानी का किरीट उड़ाया जाना केवल एक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि इस रात में न्याय भी अक्सर नशे में होता है।

जिस समय राज्यसभा में विपक्ष मनरेगा पर गला फाड़ रहा था, उसी समय राजनीतिक यथार्थ का दूसरा दृश्य चल रहा था, पवार के सांसदों का मोटा भाई से गले मिलना। यह दृश्य लोकतंत्र की उस परंपरा को उजागर करता है, जहाँ शोर संसद के लिए और समझौते बंद कमरों के लिए होता है।

ढलती उम्र, रुंधा हुआ नाद, और चीखते जज्बात, खरगे जी की आवाज में सिर्फ विरोध नहीं था, उसमें एक पीढ़ी की हताशा थी। लेकिन पूस की रात भावनाओं को नहीं सुनती है।

देर रात, बिना बहस के अंततः जी राम जी कानून बन गया। यह सिर्फ एक कानून नहीं है, बल्कि एक युगांत का संकेत है, जहाँ सहमति की जगह संख्या ने ले ली है। ‘जी राम जी’ अब केवल धार्मिक या सांस्कृतिक प्रतीक नहीं रहा। वह एक विधायी संरचना में बदल चुका है। यह परिवर्तन बताता है कि आधुनिक भारत में धर्म अब केवल आस्था नहीं है, बल्कि नीति और प्रशासन का औजार भी बन चुका है। यह कानून उन लोगों के लिए उत्सव है, जिन्होंने इसे स्वप्न की तरह देखा था, और उनके लिए भय, जिन्होंने इसे चेतावनी की तरह समझा।

देर रात से एक बार फिर बंग्लादेश अपनी ही बर्बादी की कब्र में कूद पड़ा है। तख्तापलट के अगुआ रहे हादी की मौत ने एक ऐसा ज्वार खड़ा कर दिया है, जिसमें कटरपंथ ने खुद को अग्नि में झोंक दिया है। हर क्रांति का एक बिंदु होता है, जहाँ वह अपने उद्देश्य से भटक जाता है। बंग्लादेश उस बिंदु पर खड़ा है। सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा अब धार्मिक उन्माद में बदल चुका है। “जलता है तो जले, हम तो सद्बुद्धि की दुआ कर सकते हैं।” यह वाक्य केवल एक टिप्पणी नहीं है, बल्कि पूरे उपमहाद्वीप की सामूहिक विवशता है।

दुनिया बेसब्री से जेफ्री एपस्टीन फाइल खुलने का इंतजार कर रही थी। यह फाइल केवल यौन अपराधों की नहीं, बल्कि वैश्विक सत्ता, धन और नैतिक पतन की सूची थी। पर देर रात वाशिंगटन ने जो किया, वह अपेक्षित था, बिल गेट्स सहित कई गैर-राजनीतिक हस्तियों को सामने कर दिया गया। यह वही पुरानी रणनीति है छोटे नाम सामने, बड़े नाम पर्दे के पीछे। यह साबित करता है कि पूस की रात में न्याय भी चयनात्मक होता है।

बिहार, दिल्ली, ढाका और वाशिंगटन, चारों दिशाओं में अलग-अलग घटनाएँ हैं, लेकिन भाव एक ही है। आम आदमी ठंड से मर रहा है। लोकतंत्र प्रक्रिया से। क्रांति विचार से और नैतिकता समझौते से। यह संयोग नहीं है, बल्कि यह समय का संकेत है।

पूस की रात में फैसले इसलिए होते हैं, क्योंकि जनता सो रही होती है। मीडिया या तो व्यस्त होता है या विवश। यह वह समय है जब कानून पास होता हैं। फाइलें दबती हैं। तख्तापलट सफल होता है और इतिहास चुपचाप बदल दिया जाता है

हर सभ्यता में एक ऐसी रात आती है, जो आगे के सौ वर्षों का रास्ता तय कर देती है। यह पूस की रात भी वैसी ही प्रतीत होती है। यह रात पूछती नहीं, बताती है।

सुबह अवश्य होगी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या वह आम आदमी के लिए होगी? या सिर्फ कुंभिलो के लिए? क्या वह लोकतंत्र की होगी? या कानून की भाषा में लिखी गई सत्ता की? जब तक इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिलते, पूस की रात जारी रहेगी।



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