कभी विज्ञान कथाओं में पढ़ा, देखा गया दृश्य, नन्हे-नन्हे रोबोट जो इंसान के शरीर के भीतर जाकर बीमारियों से लड़ते हैं, अब हकीकत बनने की दहलीज पर खड़ा है। अमरीकी वैज्ञानिकों ने ऐसा “नैनो रोबोट” विकसित किया है, जो आकार में एक मिलीमीटर से भी छोटा है, बल्कि नमक के दाने से भी छोटा है। यह रोबोट न केवल महसूस कर सकता है, बल्कि सोचकर फैसला भी ले सकता है और काम कर सकता है। सबसे चौंकाने वाली बात यह कि यह सौर ऊर्जा से चलता है। यह खोज सिर्फ एक नई तकनीक नहीं है, बल्कि चिकित्सा विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव की शुरुआत है। ऐसी खोजें उन समस्याओं का समाधान बन सकता हैं, जिन्हें अब तक मानव सर्जरी और भारी-भरकम इलाज के जरिए ही सुलझाया जाता था।
पिछले चार दशकों से वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ी चुनौती थी, क्या इतना छोटा रोबोट बनाया जा सकता है जिसमें कंप्यूटर, सेंसर और मोटर एक साथ फिट हो सकें? अब तक इसका जवाब नकारात्मक ही रहा था। माइक्रोस्केल पर इन सभी घटकों को एक साथ जोड़ना असंभव माना जाता था। लेकिन मार्क मिस्किन और उनकी टीम ने इस असंभव को संभव कर दिखाया। मार्क मिस्किन के शब्दों में,“यह पहला ऐसा रोबोट है जो इतनी छोटी साइज का होते हुए भी अपने आसपास की स्थिति को समझकर स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता है।” यह उपलब्धि केवल इंजीनियरिंग नहीं, बल्कि मानव बुद्धि और नवाचार की सीमा को आगे बढ़ाने वाली छलांग है।
“नैनो रोबोट” कोई साधारण मशीन नहीं है। यह एक स्वायत्त (Autonomous) सूक्ष्म यंत्र है, जिसे विशेष रूप से मानव शरीर जैसे जटिल वातावरण में काम करने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका आकार एक मिलीमीटर से भी कम है, कंप्यूटर चिप 55 नैनोमीटर, तापमान सेंसर 0.3 डिग्री तक बदलाव पहचानने की क्षमता, ऊर्जा स्रोत सोलर सेल, सुरक्षा कवच कांच जैसी पारदर्शी परत है। यह रोबोट पुराने रोबोट्स की तुलना में 100 गुना छोटा, लेकिन कई गुना अधिक शक्तिशाली है।
अब तक रोबोट्स को निर्देश देकर चलाया जाता था। लेकिन यह नैनो रोबोट अपने आसपास के वातावरण को महसूस कर सकता है और उसी के अनुसार निर्णय ले सकता है। यह सेंसर से तापमान, दबाव और परिवेश की जानकारी लेता है। माइक्रो-कंप्यूटर उस डेटा का विश्लेषण करता है और फिर तय करता है कि अगला कदम क्या हो, दवा छोड़नी है, रुकना है या आगे बढ़ना है। यह क्षमता इसे साधारण मशीन से अलग बनाता है।
“नैनो रोबोट” की सबसे अनोखी विशेषता है कि यह सूरज की रोशनी से चलता है। इसमें लगे सूक्ष्म सोलर सेल प्रकाश को ऊर्जा में बदलता है। इसके बैटरी बदलने की जरूरत नहीं होता है। शरीर के अंदर लंबे समय तक काम कर सकता है और ऊर्जा खत्म होने का खतरा कम रहता है। भविष्य में वैज्ञानिक इसे शरीर के अंदर मौजूद रोशनी या बाहरी प्रकाश स्रोतों से भी चार्ज करने पर काम करता है।
यह ब्लॉक नसों को खोलना, सीधे बीमार कोशिकाओं तक दवा पहुंचाना, कैंसर सेल्स की निगरानी, सूजन या संक्रमण वाले हिस्से की पहचान और नसों में माइक्रो-लेवल रिपेयर, तकनीक से सर्जरी की जरूरत काफी हद तक कम हो सकता है। फिलहाल यह नैनो रोबोट लैब स्तर पर परीक्षण में है। इसे अभी छोटे रोबोटिक शरीर और मीठे पानी के वातावरण में सफलतापूर्वक चलाया गया है।
डेविड ब्लाउ के अनुसार, “यह तकनीक अभी शुरुआती चरण में है। हमें इसे पूरी तरह से शरीर के लिए सुरक्षित बनाना होगा। अगले 10 सालों में इसका वास्तविक इस्तेमाल शुरू हो सकता है।”
इतनी उन्नत तकनीक के बावजूद, सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह मानव शरीर के लिए पूरी तरह सुरक्षित होगी? इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया, रोबोट के बाहर निकलने की व्यवस्था, लंबे समय तक शरीर में रहने के प्रभाव, अनचाही जगहों पर पहुंचने का खतरा, इन्हीं पहलुओं पर वैज्ञानिक गहन शोध कर रहे हैं।
“नैनो रोबोट” का सबसे बड़ा योगदान कैंसर चिकित्सा में हो सकता है। केवल कैंसर सेल्स पर हमला, स्वस्थ कोशिकाओं को नुकसान नहीं, कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स कम, शुरुआती स्तर पर कैंसर की पहचान, यह तकनीक कैंसर को “लक्षित इलाज” की दिशा में ले जाएगी।
आज बड़ी सर्जरी में जोखिम, दर्द और लंबा रिकवरी समय होता है।” नैनो रोबोट” इस तस्वीर को बदल सकता है। बिना चीरा, बिना टांका, बिना लंबे अस्पताल प्रवास, यह चिकित्सा विज्ञान में नॉन-इनवेसिव ट्रीटमेंट का नया अध्याय खोल सकता है।
हर नई तकनीक के साथ नैतिक प्रश्न भी आता है। क्या शरीर में मशीन रखना सही है? डेटा की गोपनीयता कैसे सुनिश्चित होगी? तकनीक का दुरुपयोग तो नहीं होगा? इन सवालों पर वैश्विक स्तर पर चर्चा जरूरी है। अगर यह तकनीक सस्ती और सुलभ बनी, तो भारत जैसे देशों में ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, जटिल सर्जरी की जरूरत कम और स्वास्थ्य खर्च में कमी, यह तकनीक स्वास्थ्य समानता की दिशा में बड़ा कदम हो सकता है।
नमक के दाने से भी छोटा यह “नैनो रोबोट” सिर्फ एक मशीन नहीं है, बल्कि मानवता के लिए आशा की किरण है। यह खोज दिखाता है कि जब विज्ञान, तकनीक और कल्पना एक साथ मिलता है, तब असंभव भी संभव हो जाता है। अभी यह लैब में है, लेकिन आने वाले वर्षों में यह इलाज की परिभाषा बदल सकता है। जहां चाकू की जगह रोशनी होगी, जहां दर्द की जगह सटीकता होगी और जहां बीमारी से लड़ने का तरीका होगा “नैनो रोबोट” की अदृश्य ताकत।
