संथाली भाषा में - ओल चिकी लिपि में जारी हुआ संविधान

Jitendra Kumar Sinha
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राष्ट्रपति भवन में आयोजित एक गरिमामय समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भारत के संविधान को संथाली भाषा में ओल चिकी लिपि में जारी किया है। यह पहल न केवल संथाली समुदाय के लिए, बल्कि भारत की भाषाई विविधता और समावेशी लोकतंत्र की भावना के लिए भी ऐतिहासिक मील का पत्थर है। राष्ट्रपति ने इस अवसर पर कहा कि अब संथाली समाज के लोग अपनी मातृभाषा में संविधान को पढ़ और समझ सकेंगे, जिससे उनमें संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूकता और भी मजबूत होगी।


संथाली भाषा भारत की प्रमुख आदिवासी भाषाओं में से एक है, जिसे आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया है। ओल चिकी लिपि में संविधान का प्रकाशन इस बात का प्रतीक है कि भारतीय लोकतंत्र केवल बहुसंख्यक भाषाओं तक सीमित नहीं, बल्कि हर भाषा, हर संस्कृति और हर समुदाय को समान सम्मान देता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू स्वयं एक आदिवासी समुदाय से आती हैं, इसलिए इस पहल का भावनात्मक और सांस्कृतिक महत्व और भी बढ़ जाता है।


राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, बल्कि वह संस्कृति, परंपरा और पहचान का वाहक भी होती है। जब कोई समुदाय अपनी भाषा में संविधान पढ़ता है, तो लोकतंत्र उससे और अधिक जुड़ जाता है। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान का उद्देश्य केवल कानून बनाना नहीं है, बल्कि देश के हर नागरिक को सम्मान, समानता और न्याय का अधिकार देना है, और मातृभाषा में संविधान उपलब्ध होना इस लक्ष्य को और सशक्त करता है।


संथाली समुदाय झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, बिहार और असम सहित कई राज्यों में फैला हुआ है। लंबे समय से यह मांग उठती रही है कि संवैधानिक और प्रशासनिक दस्तावेज आदिवासी भाषाओं में भी उपलब्ध कराए जाएं। ओल चिकी लिपि में संविधान का प्रकाशन इसी दिशा में एक ठोस कदम है। इससे शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ावा मिलेगा।


इस पहल से यह संदेश भी जाता है कि भारत का संविधान जीवंत दस्तावेज है, जो समय और समाज की जरूरतों के अनुसार, खुद को और अधिक समावेशी बनाता है। आज जब दुनिया में कई देशों में अल्पसंख्यक और आदिवासी भाषाएं हाशिए पर जा रही हैं, भारत का यह कदम भाषाई संरक्षण और सांस्कृतिक सम्मान का उदाहरण प्रस्तुत करता है।


संथाली भाषा में संविधान का विमोचन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज के आत्मसम्मान, पहचान और लोकतांत्रिक सशक्तिकरण का उत्सव है। यह पहल आने वाली पीढ़ियों को यह विश्वास दिलाएगी कि भारतीय लोकतंत्र में हर भाषा और हर समुदाय की आवाज सुनी जाती है।



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