तेजी से बढ़ते शहरीकरण, उपभोक्तावाद और जनसंख्या दबाव के कारण भारत के शहरों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (Solid Waste Management) एक गंभीर समस्या बन चुका है। बढ़ते कचरे ने न केवल नगर निकायों की व्यवस्थाओं पर दबाव डाला है, बल्कि पर्यावरण, स्वास्थ्य और शहरी जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित किया है। इसी चुनौती को अवसर में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की शुरुआत हुई है।
भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रायोजित एक महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय शोध परियोजना शुरू की गई है। इस परियोजना का उद्देश्य भारत के प्रमुख शहरी क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की वास्तविक स्थिति का अध्ययन कर नीति-निर्माण और व्यावहारिक समाधान सुझाना है।
बहु-संस्थागत परियोजना में देश के प्रतिष्ठित संस्थान शामिल हैं, जिसमें एनआइटी पटना, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU), सीईपीटी विश्वविद्यालय (CEPT University), आइआइटी रुड़की और आइआइटी तिरुपति है।
इस राष्ट्रीय परियोजना के तहत एनआइटी पटना की टीम को पटना नगर निगम क्षेत्र में शोध की जिम्मेदारी सौंपी गई है। टीम पटना के सभी 75 वार्डों में जाकर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की जमीनी हकीकत का अध्ययन कर रही है।
इस अध्ययन में कचरे के स्रोत, संग्रहण प्रणाली, परिवहन, प्रसंस्करण, निपटान और नागरिक सहभागिता जैसे पहलुओं को शामिल किया गया है। साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि सरकारी योजनाएं धरातल पर किस हद तक प्रभावी हैं।
एनआइटी पटना द्वारा किए जा रहे इस अध्ययन के प्रमुख उद्देश्य हैं, शहरी कचरा प्रबंधन की मौजूदा स्थिति का आंकलन। संरचनात्मक और प्रशासनिक कमियों की पहचान।नागरिकों की भूमिका और जागरूकता का अध्ययन। पर्यावरण अनुकूल और टिकाऊ मॉडल का सुझाव तथा स्थानीय निकायों के लिए व्यावहारिक नीति सिफारिशें।
इस शोध से प्राप्त निष्कर्ष न केवल पटना, बल्कि अन्य भारतीय शहरों के लिए भी मार्गदर्शक साबित हो सकता हैं। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को वैज्ञानिक, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से सुदृढ़ बनाने में यह परियोजना महत्वपूर्ण योगदान देगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे अध्ययन स्वच्छ भारत मिशन और स्मार्ट सिटी जैसे कार्यक्रमों को जमीनी स्तर पर मजबूत करने में सहायक होगी।
कचरे को केवल समस्या नहीं, बल्कि संसाधन मानने की सोच के साथ एनआइटी पटना द्वारा किया जा रहा यह अध्ययन शहरी भारत के लिए एक नई दिशा दिखा सकता है। यदि शोध निष्कर्षों को प्रभावी ढंग से लागू किया गया, तो आने वाले वर्षों में शहर अधिक स्वच्छ, टिकाऊ और रहने योग्य बन सकता है।
