दिव्यांगजनों के लिए जीविकोपार्जन, कौशल विकास एवं उद्यमिता को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तीन वर्षीय स्वावलंबन परियोजना की शुरुआत सोमवार को की गई। यह परियोजना दिव्यांग व्यक्तियों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। परियोजना का संचालन एक्शन एड एसोसिएशन द्वारा किया जाएगा, जबकि इसके लिए एसबीआई फाउंडेशन ने अपने कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर) के तहत वित्तीय सहयोग प्रदान किया है।
स्वावलंबन परियोजना का मुख्य उद्देश्य दिव्यांगजनों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उन्हें सम्मानजनक आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना है। इसके तहत दिव्यांग व्यक्तियों को उनकी क्षमता, रुचि और आवश्यकता के अनुसार, कौशल प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि वे स्वरोजगार या रोजगार के अवसर प्राप्त कर सकें। परियोजना दिव्यांगजनों में आत्मविश्वास बढ़ाने, सामाजिक समावेशन को प्रोत्साहित करने और उनकी जीवन गुणवत्ता में सुधार लाने पर केंद्रित है।
यह परियोजना बिहार के पटना एवं मुजफ्फरपुर जिलों के कुल आठ प्रखंडों में लागू की जाएगी। इनमें पटना जिला के चार तथा मुजफ्फरपुर जिला के चार प्रखंड शामिल हैं। परियोजना के अंतर्गत लगभग 1,400 दिव्यांगजनों को प्रत्यक्ष रूप से सहयोग प्रदान किया जाएगा। चयनित लाभार्थियों को प्रशिक्षण, मार्गदर्शन, उपकरण तथा आवश्यक संसाधनों की सुविधा दी जाएगी।
स्वावलंबन परियोजना के तहत सिलाई, हस्तशिल्प, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर प्रशिक्षण, कृषि आधारित गतिविधियां, लघु व्यवसाय एवं अन्य रोजगारोन्मुखी कौशलों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। इसके साथ ही उद्यमिता विकास के लिए वित्तीय साक्षरता, व्यवसाय प्रबंधन, विपणन और सरकारी योजनाओं की जानकारी भी दी जाएगी। इससे दिव्यांगजन न केवल रोजगार प्राप्त कर सकेंगे, बल्कि स्वयं का व्यवसाय भी शुरू कर पाएंगे।
परियोजना का एक अहम पहलू समाज में दिव्यांगजनों के प्रति सकारात्मक सोच विकसित करना है। इसके लिए जागरूकता कार्यक्रम, सामुदायिक बैठकें और संवाद सत्र आयोजित किए जाएंगे। इससे दिव्यांग व्यक्तियों को मुख्यधारा में शामिल करने और भेदभाव को कम करने में मदद मिलेगी।
एक्शन एड एसोसिएशन और एसबीआई फाउंडेशन का मानना है कि स्वावलंबन परियोजना दिव्यांगजनों के जीवन में स्थायी बदलाव लाएगी। यह पहल न केवल उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाएगी, बल्कि उन्हें आत्मसम्मान और स्वतंत्रता के साथ जीवन जीने का अवसर भी प्रदान करेगी। आने वाले तीन वर्षों में यह परियोजना बिहार में दिव्यांग सशक्तिकरण का एक प्रभावी मॉडल बन सकता है।
