“वराही शक्तिपीठ” (देवी सती का अधोदंत (निचला दाँत) गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना 

भारत के 51 शक्तिपीठों में “वराही शक्तिपीठ” एक अत्यंत रहस्यमय, खोजपूर्ण और गहन शक्तिसाधना का केंद्र माना जाता है। माँ सती के जिस अंग के गिरने से यह पवित्र स्थल बना, वह था माता का “अधोदंत” निचला दाँत। यह अंग स्वयं में अति दुर्लभ है, क्योंकि अधिकांश पीठों में माँ के विविध शारीरिक अंग या आभूषण गिरा हैं, परंतु यहाँ “दंत” का गिरना एक विशिष्ट अध्यात्मिक संकेत माना जाता है- ज्ञान, जिजीविषा, संकल्प और रक्षा-शक्ति का प्रतीक। यहाँ देवी की शक्ति "वराही" के नाम से अधिष्ठित है तथा भैरव रूप "महारुद्र" के नाम से पूजित हैं।

वराही देवी को अष्टमातृका, दशमहाविद्या, तथा श्रीविद्या शक्तिसाधना की मुख्य शक्तियों में से एक माना जाता है। पुराणों में वे वराहावतार की शक्तिरूपा मानी गई हैं, रक्तवर्णा, वराहमुखी, उग्र परंतु कल्याणकारी, रक्षा करने वाली, सिद्धियों और वीरता की अधिष्ठात्री। यह “तमो-नाशिनी” और “दुष्ट-शक्ति-विनाशिनी” के रूप में भी जानी जाती हैं।

“वराही” का अर्थ है वराह की शक्ति, पृथ्वी को संभालने वाली शक्ति, अंधकार को चीरकर ज्ञान उत्पन्न करने वाली शक्ति। इनका स्वरूप भक्त को भयमुक्त करता है तथा जीवन से नकारात्मक शक्तियों को दूर करता है।

इस शक्तिपीठ के स्थान को लेकर विद्वानों और भक्तों में वर्षों से मतभेद हैं। कई परंपराएँ इस पीठ को वाराणसी का पंचसागर क्षेत्र, छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा क्षेत्र और उत्तराखंड का देवीधुरा पर्वतीय क्षेत्र से जोड़ती हैं।  माना जाता है कि “पंचसागर” का उल्लेख तंत्रग्रंथों में है, परंतु उसका सटीक भौगोलिक निर्धारण अभी भी एक रहस्य है। तंत्र परंपरा से जुड़ा, रहस्यपूर्ण, केवल साधकों के लिए अनुकूल और सामान्य जनता को स्पष्ट लोकेशन ज्ञात नहीं है। वराही पीठ पर साधना बिना गुरु दीक्षा के वर्जित माना जाता है, क्योंकि यह अत्यंत उग्र शक्ति का पीठ है।

पंचक्रोशी यात्रा में “पंचसागर” नामक क्षेत्र था, जहाँ तांत्रिक साधनाओं का प्रमुख केंद्र स्थित है। यह स्थान गूढ़ साधना सिद्धियों हेतु प्रसिद्ध, तंत्रमार्गियों का केंद्र, अत्यंत प्राचीन और पौराणिक है। कई विद्वान इसे ही वास्तविक वराही शक्तिपीठ मानते हैं।

छत्तीसगढ़ का दंतेवाड़ा में माँ दंतेश्वरी का प्रसिद्ध शक्तिपीठ है। स्थानीय परंपरा में यह भी माना जाता है कि यहाँ वराही की एक प्राचीन गुफा रही है। यह अधोदंत के गिरने का स्थान हो सकता है। आदिवासी संस्कृति में वराही का विशेष महत्व है। 

देवीधुरा (उत्तराखंड), जिसे देवीधूरा भी कहा जाता है, वहां वराही देवी के स्वरूप में माता वागेश्वरी की पूजा। महादेव- महाभैरव के उग्र रूपों की परंपरा और हर वर्ष प्रसिद्ध “बग्वाल” परंपरा है। कई विद्वान मानते हैं कि तांत्रिक परंपराओं से भरपूर यह क्षेत्र भी वराही पीठ हो सकता है।

भारत के जिस स्थान पर माता का दंत गिरा होगा, वहाँ रक्षा की शक्ति, ज्ञान की जागृति, नकारात्मक ऊर्जा का नाश और सिद्धियों की प्राप्ति स्वाभाविक रूप से होती है। निचला दंत शक्ति का प्रतीक है- अवचेतन मन की शक्ति, मूलाधार से ऊर्जा संचरण, जीवन की जिजीविषा, संकटों से लड़ने की क्षमता। इस पीठ पर आने वाले श्रद्धालु भीतर से मजबूत बनकर लौटता है।

भैरव का नाम है महारुद्र। यह नाम दर्शाता है कि वे अत्यंत उग्र, संसार का रुदन हरने वाले, भक्त की रक्षा हेतु प्रचंड और वराही की शक्ति को संभालने वाले है। महारुद्र की पूजा के बिना वराही साधना अधूरी मानी जाती है।

दस महाविद्याओं में भले प्रमुखता से वराही का नाम नहीं आता हो, लेकिन वे महात्रिपुरसुंदरी की सहचारिणी, श्रीविद्या की विशेष शक्ति और काम, क्रोध, मोह, भय पर नियंत्रण देने वाली है। गुप्त तंत्र में वराही को उग्र रूप, रक्षास्वरूप, काल-विज्ञानी और अमंगल-नाशिनी के रूप में अत्यंत उच्च स्थान दिया गया है।

पाँच मुख्य साधना-पद्धतियाँ में अष्टमातृका साधना, वराही कवच साधना, दुर्गा सप्तशती के विशेष अध्यायों के साथ संयुक्त साधना, लाल किताब और तंत्र दीक्षा आधारित साधना, श्रीविद्या तंत्र में धूमावती–वराही संयोजित साधना, शामिल है। परंपरा में इनके मूल मंत्र अत्यंत गुप्त रखे जाते हैं। कहा जाता है कि “बिना गुरु दीक्षा के मंत्र सिद्ध नहीं होता है।”

वाराणसी रात्रिकालीन पूजा- यहाँ तांत्रिक साधक रात्रिकाल में तंत्रपूजा, बीजमंत्र जप, भैरव साधना और तांत्रिक होम करते हैं।

दंतेवाड़ा आदिवासी परंपराएँ - यहाँ पूजा में ढोल-नगाड़े, परंपरागत गीत, प्राकृतिक शक्ति का आह्वान, शामिल है।

देवीधुरा पर्वतीय परंपरा- पहाड़ी पूजा-पद्धति, शंख-घंटे, ऊन और धतूरे का प्रयोग, महाभैरव का आह्वान के लिए यह क्षेत्र विशेष रूप से दिव्य माना जाता है।

वराही शक्तिपीठ का आध्यात्मिक संदेश है अडिग शक्ति- भय और अंधकार को जीतने की प्रेरणा। अंतर्ज्ञान- मन को निर्मल और जागृत करना। रक्षण- नकारात्मक शक्तियों से रक्षा और तप- साधना के माध्यम से आत्मशक्ति बढ़ाना। जो जीवन में संघर्ष से जूझ रहा हो। जो भीतर से कमजोर महसूस करता हो। जिसकी आध्यात्मिक साधना रुक गई हो। जिसे नकारात्मक ऊर्जा परेशान करती हो।

भक्त कहते हैं कि मन अचानक हल्का हो जाता है। भय समाप्त होने लगता है। आंतरिक शक्ति जागृत होती है और अदृश्य सुरक्षा कवच का अनुभव होता है। दंत को ऊर्जा-केन्द्र माना जाता था। माना जाता है कि दंत का टूटना जीवन की ऊर्जा में बदलाव दर्शाता है। विशेष दंतों का विशेष शक्ति से संबंध है यह अवधारणा आज भी आयुर्वेद में मिलता है।

सती के अंग-स्थानों को ऊर्जा-रेखाओं, भू-चुंबकीय बलों, भूमिगत जलधाराओं के मिलन बिंदुओं पर चुना गया था। वराही शक्तिपीठ इसका प्रमुख उदाहरण माना जाता है।

तांत्रिक परंपरा में अत्यंत गुप्त रखा जाना, स्थान बदलते रहे साधना-केंद्र, प्राचीन ग्रंथों में अस्पष्ट वर्णन, आगम–निगम में विरोधाभास, गुरु-शिष्य परंपरा में मौखिक जानकारी। इसलिए यह पीठ आज भी “रहस्य का पीठ” कहलाता है।

आधुनिक तांत्रिक और साधक कहते हैं कि यह पीठ केवल शरीर नहीं है, बल्कि चेतना को प्रभावित करता है। वराही धैर्य और शक्ति की देवी हैं। इनके दर्शन व्यक्ति को जीवन-युद्ध जीतने की क्षमता देता है।

मान्यता है कि वराही रात में नगर की रक्षा करती हैं। वे साधक को निराशा से बाहर निकालती हैं। वे दुष्ट-शक्ति, भ्रम, मानसिक विकार नष्ट करती हैं और महारुद्र भैरव उनके गुप्त रक्षक हैं। 

वराही संकटमोचक है क्योंकि वे छाया, संदेह, असुरक्षा दूर करती हैं। भय, अनिद्रा, अवसाद पर विजय देती हैं। कठिन परीक्षा का सामना करवाती हैं। ऊर्जा और आत्मविश्वास बढ़ाती हैं। 

वराही पूजा के लिए प्रतिदिन दीप जलाना चाहिए। भैरव का ध्यान करना चाहिए। मन शांत रखना चाहिए। किसी पवित्र स्थान में जप करना चाहिए लेकिन गुरु मार्गदर्शन अनिवार्य रूप से लेना चाहिए।

कई विद्वान मानते हैं कि वराही की शक्ति व्यापक है, इसलिए उसके तीन स्थान हो सकते हैं और तीनों मिलकर "पंचसागर तंत्र" बनाते हैं। यह विचार आज नई बहस को जन्म दे रहा है।

वराही शक्तिपीठ यूरोप के किसी रहस्यमयी स्थान जैसा, परंतु उससे कहीं अधिक दिव्य और प्राचीन है। यहाँ शक्ति है, रक्षक हैं, तंत्र है, तप है और वह अनोखी दिव्य ऊर्जा है जो भक्त के जीवन को बदलने की क्षमता रखती है। भले ही इसका सटीक स्थान विवादित हो, परंतु इसकी शक्ति निर्विवाद है।



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