बारपेटा में दिए गए एक बयान में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक बार फिर जनसंख्या संतुलन को लेकर बहस छेड़ दी है। उन्होंने हिन्दू समाज से अपील की है कि राज्य में मुस्लिमों की तुलना में घटती हिन्दू आबादी को रोकने के लिए कम से कम तीन बच्चे पैदा करें। मुख्यमंत्री का कहना था कि यदि हिन्दू परिवारों में जन्मदर लगातार कम होती रही, तो आने वाले समय में घरों की देखभाल करने और सामाजिक ढांचे को संभालने वाले लोग भी कम पड़ जाएंगे।
मुख्यमंत्री सरमा का यह बयान ऐसे समय आया है, जब देशभर में जनसंख्या, जनसांख्यिकी परिवर्तन और सामाजिक संतुलन पर बहस तेज है। असम जैसे सीमावर्ती राज्य में जनसंख्या संरचना लंबे समय से एक संवेदनशील राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रही है। अवैध घुसपैठ, सीमावर्ती इलाकों में जनसंख्या वृद्धि और संसाधनों पर दबाव जैसे विषयों को लेकर सरकार पहले भी मुखर रही है।
मुख्यमंत्री ने अपने बयान में यह संकेत देने की कोशिश की है कि हिन्दू समाज में घटती जन्मदर केवल धार्मिक या सांस्कृतिक मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भविष्य से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है। उनका तर्क है कि परिवार छोटे होते जाने से पारंपरिक पारिवारिक ढांचे पर असर पड़ रहा है, जहां बुजुर्गों की देखभाल, सामाजिक जिम्मेदारियां और सामुदायिक सहयोग कमजोर हो सकता है।
इस बयान पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज रही हैं। विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों ने इसे विभाजनकारी और एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने वाला करार दिया है। उनका कहना है कि जनसंख्या का मुद्दा धर्म से नहीं है, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और महिला सशक्तिकरण से जुड़ा होता है। आलोचकों का यह भी तर्क है कि किसी समुदाय को अधिक बच्चे पैदा करने की सलाह देना आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्यों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के खिलाफ है।
दूसरी ओर, मुख्यमंत्री के समर्थकों का कहना है कि यह बयान किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि हिन्दू समाज को अपने भविष्य को लेकर सचेत करने की अपील है। उनका मानना है कि यदि जनसंख्या संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया, तो सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पहचान पर असर पड़ सकता है। वे इसे एक चेतावनी के रूप में देखते हैं, न कि किसी पर थोपे गए आदेश के रूप में।
वास्तविकता यह है कि असम सहित पूरे भारत में जनसंख्या के सवाल को केवल धार्मिक चश्मे से देखने के बजाय व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है। शिक्षा का स्तर, महिलाओं की भागीदारी, स्वास्थ्य सुविधाएं और आर्थिक सुरक्षा, यह सभी जन्मदर को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक हैं। किसी भी समाज का संतुलित विकास तभी संभव है, जब नीतियां समावेशी हों और बयानबाजी के बजाय ठोस समाधान पर जोर दिया जाए।
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का यह बयान निश्चित रूप से चर्चा के केंद्र में है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह बहस आगे सामाजिक जागरूकता की दिशा में जाती है या राजनीतिक ध्रुवीकरण को और गहरा करती है।
