इतिहास गवाह है कि समय जब थपेड़े मारता है, तब राष्ट्र दो ही रास्ता चुनता है, या तो वे रोते हैं, शिकायत करते हैं, दुनिया को दोष देते हैं या फिर उन्हीं थपेड़ों को हथौड़ा बनाकर अपने लिए नई राह गढ़ते हैं। वर्तमान भारत ने दूसरा रास्ता चुना है। आज का भारत वह देश नहीं है जो वैश्विक मंच पर असहाय होकर किसी महाशक्ति की ओर देखे, न ही वह भारत है जो आर्थिक प्रतिबंधों, टैरिफ युद्धों और व्यापारिक धमकियों से डर जाए। आज का भारत रणनीति बनाता है, धैर्य रखता है और सही समय पर निर्णायक वार करता है।
कुछ समय पूर्व अमेरिका की सत्ता में बैठे नेतृत्व ने, आर्थिक समझदारी से अधिक व्यक्तिगत सनक और राजनीतिक कुंठा के आधार पर दुनिया पर टैरिफ युद्ध थोप दिया। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। भारतीय स्टील, एल्युमिनियम, टेक्सटाइल, फार्मा और आईटी सेवाएँ, सब पर प्रत्यक्ष या परोक्ष दबाव डाला गया है। यह वह क्षण था जब कोई भी देश WTO में रो सकता था। बयानबाजी कर सकता था या घरेलू राजनीति के लिए शोर मचा सकता था। लेकिन भारत ने शोर नहीं मचाया। भारत ने काम किया।
भारत जानता था कि अमेरिका कोई स्थायी मित्र नहीं है और न ही कोई स्थायी शत्रु। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी केवल हित होता है। यहीं से भारत की असली रणनीति शुरू होती है। भारत ने खुद से एक सवाल पूछा है “क्या हम अपनी अर्थव्यवस्था को किसी एक देश की दया पर छोड़ सकते हैं?” उत्तर स्पष्ट था नहीं। और इसी “नहीं” से जन्म हुआ एक ऐसे निर्णय का, जो आज दुनिया की भू-राजनीति और भू-अर्थव्यवस्था की दिशा बदलने जा रहा है।
भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) की बातचीत करीब 20 वर्षों से फाइलों में दबी पड़ी थी। कभी पर्यावरण मानकों का विवाद, कभी बौद्धिक संपदा अधिकार, कभी कृषि सब्सिडी और कभी डेटा सुरक्षा, हर बार कोई न कोई अड़चन। लेकिन आज वही फाइल इतिहास का दस्तावेज बनने जा रही है। इसे यूँ ही “Mother of All Deals” नहीं कहा जा रहा है। इस समझौते की व्यापकता 27 यूरोपीय देश, दुनिया की लगभग 25% GDP, 200 करोड़ से अधिक उपभोक्ताओं का बाजार और 51 अरब डॉलर से अधिक का प्रारंभिक व्यापार विस्तार है। यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक और सबसे बड़ा नियम-आधारित व्यापारिक ब्लॉक बनने जा रहा है।
यह FTA किसी साधारण टैक्स कटौती का नाम नहीं है। यह भारतीय उत्पादों के लिए यूरोप के दरवाजा खोल देगा। भारतीय स्टार्टअप्स को वैश्विक उड़ान देगा। MSME सेक्टर को ऑक्सीजन देगा। कृषि और प्रोसेस्ड फूड को नई पहचान देगा। अब भारतीय निर्यात टैरिफ के जंगल में नहीं भटकेगा, बल्कि टोल फ्री हाईवे पर दौड़ेगा।
यहाँ बात केवल व्यापार की नहीं है। यह एक राजनीतिक संदेश भी है। अमेरिका ने यह मान लिया था कि भारत मजबूर है, भारत विकल्पहीन है और भारत अंततः झुक जाएगा। लेकिन भारत ने झुकने के बजा विकल्प बना लिया। यह समझौता अमेरिकी आर्थिक दादागिरी के मुंह पर एक शांत, शालीन लेकिन बेहद जोरदार थप्पड़ है।
यह एकतरफा कहानी नहीं है। यूरोप भी आज चीन पर निर्भरता घटाना चाहता है। सप्लाई चेन को सुरक्षित करना चाहता है। लोकतांत्रिक साझेदार ढूंढ रहा है और भारत विशाल बाजार, युवा जनसंख्या, तकनीकी क्षमता और राजनीतिक स्थिरता के साथ यूरोप के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरा है।
यह डील केवल अमेरिका के लिए संदेश नहीं है, यह चीन के लिए भी चेतावनी है। दुनिया अब एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहती है बल्कि सस्ते माल की कीमत पर रणनीतिक जोखिम नहीं उठाना चाहती है और भारत इस नई वैश्विक व्यवस्था का केंद्र बनता जा रहा है।
भारत ने न जल्दबाजी की, न आक्रामक बयान दिए और न भावनात्मक प्रतिक्रिया दी। बल्कि धैर्य रखा, तैयारी की और सही समय पर निर्णायक चाल चली। यही धैर्य आज भारत को रोने वाले देशों की कतार से निकालकर राह दिखाने वाले राष्ट्रों की पंक्ति में खड़ा कर रहा है।
भारत-यूरोपीय यूनियन FTA को केवल “टैरिफ कम करने वाला समझौता” मान लेना सबसे बड़ी भूल होगी। यह समझौता दरअसल भारतीय अर्थव्यवस्था के हर सेक्टर को छूता है दशकों की व्यापारिक रुकावटों को तोड़ता है और भारत को “Low-cost supplier” से “Value-driven partner” में बदलता है। यह भारत को वैश्विक उत्पादन श्रृंखला में नीचे नहीं बल्कि केन्द्र में स्थापित करता है।
अब तक भारत की कृषि नीति आत्मनिर्भरता तक सीमित थी। निर्यात संभावनाएँ बिचौलियों में उलझी थी, लेकिन इस FTA के बाद भारतीय कृषि उत्पादों को यूरोप की सीधी पहुँच बासमती चावल, मसाले, चाय और कॉफी, ऑर्गेनिक फूड और डेयरी उत्पाद अब इन्हें उच्च टैरिफ दीवारों से नहीं जूझना पड़ेगा। किसानों की आय में संरचनात्मक बढ़ोतरी होगी। यह कोई MSP जैसी अस्थायी राहत नहीं होगी, बल्कि स्थायी अंतरराष्ट्रीय बाजार, बेहतर मूल्य, गुणवत्ता आधारित कमाई यानि अन्नदाता पहली बार वैश्विक व्यापारी बनेगा।
भारत की अर्थव्यवस्था की असली रीढ़ कोई कॉरपोरेट हाउस नहीं है बल्कि MSME सेक्टर है। अब तक इन्हें विदेशी बाजार तक पहुँच नहीं थी न ही नियमों की समझ और न ही लॉजिस्टिक्स का भरोसा लेकिन FTA इस तस्वीर को बदल देगा। MSME को मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ में यूरोपीय बाजार में ड्यूटी-फ्री एक्सेस, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, गुणवत्ता मानकों का स्पष्ट ढांचा और लंबी अवधि के कॉन्ट्रैक्ट, अब छोटे उद्योग स्थानीय नहीं बल्कि वैश्विक खिलाड़ी बनेंगे।
भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम पहले ही दुनिया में तीसरे नंबर पर है। FTA इसके लिए टर्बो बूस्टर साबित होगा। यूरोपीय निवेश, रिसर्च सहयोग, डेटा और डिजिटल सेवाओं की स्पष्ट नीति और फिनटेक, हेल्थटेक, क्लीन एनर्जी में साझेदारी, अब भारतीय स्टार्टअप केवल फंडिंग नहीं, बल्कि वैश्विक प्रभाव पैदा करेगा।
अमेरिका लंबे समय से भारतीय IT सेवाओं को वीजा और नियमों के जाल में उलझाता रहा है। यूरोप इस मामले में कहीं अधिक व्यवहारिक और भरोसेमंद भागीदार है। FTA के बाद भारतीय IT प्रोफेशनल्स को बेहतर अवसर, डिजिटल सेवाओं का निर्बाध प्रवाह और डेटा संरक्षण में संतुलन यानि भारत अब डिजिटल दुनिया का मजदूर नहीं बल्कि आर्किटेक्ट बनेगा।
इस डील का असर सिर्फ GDP ग्राफ तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि यह लाखों नए प्रत्यक्ष रोजगार, करोड़ों अप्रत्यक्ष अवसर, स्किल्ड और सेमी-स्किल्ड दोनों वर्गों को फायदा देगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि ये नौकरियाँ सरकारी नहीं बल्कि उत्पादक और टिकाऊ होंगी।
अमेरिका चाहता था भारत उसी पर निर्भर रहे। टैरिफ से दबाव बनाए और रणनीतिक आज्ञाकारिता सुनिश्चित करे, लेकिन भारत ने विकल्प खड़े कर दिए। चीन यूरोप का सबसे बड़ा सप्लायर रहा है लेकिन अब भरोसे की कमी, राजनीतिक जोखिम और सप्लाई चेन की असुरक्षा दिख रहा है। भारत चीन का विकल्प नहीं है, उत्तराधिकारी बनने की ओर बढ़ रहा है।
