जनवरी 1976 का दौर भारतीय सिनेमा के लिए स्वर्णिम काल था। अमिताभ बच्चन का सितारा बॉक्स ऑफिस पर पूरे शबाब पर था। यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म ‘दीवार’ उस समय कई सिनेमाघरों में गोल्डन जुबली की ओर बढ़ रही थी, जबकि ‘शोले’ जैसी मेगा हिट फिल्म सिल्वर जुबली मना रही थी। यह वह समय था जब अमिताभ बच्चन की एक साथ कई फिल्में परदे पर चल रही थीं और वे “एंग्री यंग मैन” की छवि के पर्याय बन चुके थे।
‘दीवार’ की कहानी दो भाइयों, विजय और रवि, के इर्द-गिर्द घूमती है। बचपन में पिता की बेइज्जती और परिवार की बदहाली विजय के भीतर विद्रोह की आग भर देती है। वह हालात से लड़ते हुए अपराध की दुनिया में कदम रखता है, जबकि छोटा भाई रवि कानून की राह चुनकर पुलिस अफसर बनता है। यह द्वंद्व केवल दो व्यक्तियों का नहीं है, बल्कि व्यवस्था से टकराते आदमी और व्यवस्था के रक्षक के बीच का संघर्ष है। मां (निर्मला देवी) दोनों के बीच नैतिक सेतु हैं, पर हालात इतने जटिल हो जाता है कि अंततः भाइयों का आमना-सामना अपरिहार्य हो जाता है। यही टकराव ‘दीवार’ को भावनात्मक ऊंचाई देता है।
विजय वर्मा के रूप में अमिताभ बच्चन ने एक ऐसी छवि गढ़ी, जो भारतीय समाज के दबे-कुचले तबके की आवाज बन गई। उनके संवाद आज भी जनमानस में जीवित हैं “आज मेरे पास बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है… तुम्हारे पास क्या है?” इसका जवाब था “मेरे पास मां है।” सिनेमा के इतिहास में भावनात्मक शिखर बन गया। यह संवाद केवल शब्द नहीं, बल्कि उस दौर की सामाजिक विडंबना और नैतिक प्रश्नों का प्रतीक है।
यश चोपड़ा का निर्देशन सधा हुआ और प्रभावशाली है। मुंबई की झुग्गियों से लेकर अंडरवर्ल्ड की चमक-दमक तक, हर फ्रेम यथार्थ के करीब लगता है। गुलजार के लिखे संवाद और गीत फिल्म को साहित्यिक गरिमा देता है। आर.डी. बर्मन का संगीत जैसे “कह दूं तुम्हें” आज भी ताजा लगता है और कहानी के प्रवाह को बाधित नहीं करता है।
‘दीवार’ केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि एक युग की पहचान है। इसने मुख्यधारा सिनेमा को सामाजिक यथार्थ से जोड़ा और नायक की परिभाषा बदली। विजय का विद्रोह लाखों युवाओं की हताशा और सपनों का आईना बना। आज, लगभग पाँच दशक बाद भी ‘दीवार’ के दृश्य, संवाद और भावनाएं उतनी ही प्रासंगिक हैं। यह फिल्म याद दिलाती है कि सिनेमा जब समाज की नब्ज पकड़ ले, तो वह समय से परे हो जाता है।
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