भारत रत्न की राजनीति और बिहार

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार की राजनीति में इन दिनों एक अजीब-सी गरमी है। यह गरमी किसी चुनावी सभा की नहीं है, किसी आंदोलन की भी नहीं है, यह गरमी है “सम्मान” के नाम पर सुलगते उस हवन कुंड की, जिसमें आहुतियाँ राजनीतिक स्वार्थ, वैचारिक टकराव और व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं की दी जा रही हैं। “भारत रत्न” देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान, आज बिहार की राजनीति में बहस का केंद्र बन चुका है। प्रश्न किसी एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उस पर टिकी राजनीति का है।

जदयू के भीतर दो धड़े, बाहर एनडीए और विपक्ष में राजद, हर कोई इस मुद्दे पर अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अलाप रहा है। एक पक्ष मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नाम पर “भारत रत्न” की माँग को उनके राजनीतिक जीवन की स्वाभाविक परिणति बता रहा है। उनका तर्क है कि बिहार को दशकों तक अराजकता, पिछड़ेपन और अपराध के अंधेरे से निकालकर विकास की राह पर लाने वाले नेता को देश का सर्वोच्च सम्मान मिलना चाहिए। यह पक्ष नीतीश कुमार को “सुशासन बाबू” की उस छवि में देखता है, जिसने बिहार की राजनीति की भाषा बदली, शासन का व्याकरण सुधारा और सामाजिक संतुलन को एक नया आयाम दिया।

दूसरा पक्ष इसे राजनीतिक अवसान की स्वीकृति मानता है। उनके अनुसार, भारत रत्न की माँग एक प्रकार से यह स्वीकार करना है कि अब नीतीश कुमार की राजनीति अपने शिखर से उतर चुकी है। यह माँग सम्मान की नहीं, बल्कि विदाई की भूमिका है। एक ऐसा प्रयास, जिसमें वर्तमान से अधिक अतीत की महिमा गाई जा रही है। यही कारण है कि विरोधी खेमे में इस माँग को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखी जा रही है। उनके लिए यह मुद्दा सम्मान का नहीं है, बल्कि सत्ता-संतुलन का है।

यह पूरा विवाद एक साधारण-सी पत्र से शुरू हुआ, प्रधानमंत्री को लिखी गई एक माँग-पत्र। बिहार की राजनीति में साधारण कुछ भी नहीं होता है। यहाँ हर शब्द के पीछे अर्थ की कई परतें होती हैं और हर पहल के पीछे कई संभावनाएँ छिपी रहती हैं। इस पत्र ने जदयू के भीतर दबे तनाव को सतह पर ला दिया है। जो मतभेद अब तक भीतर-अंदर सुलग रहा था, वह खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के एक धड़े ने इसे ऐतिहासिक पहल बताया है, तो दूसरे धड़े ने इसे समय से बाहर की गई राजनीतिक चाल करार दिया है।

बिहार की राजनीति की एक विशेषता रही है, यहाँ भावनाएँ तर्क से तेज दौड़ती हैं। सम्मान, स्वाभिमान और अस्मिता यहाँ केवल शब्द नहीं है, बल्कि चुनावी औजार हैं। भारत रत्न की माँग को भी इन्हीं चश्मों से देखा जा रहा है। समर्थकों के लिए यह बिहार की अस्मिता का प्रश्न है, “जब देश के अन्य नेताओं को यह सम्मान मिल सकता है, तो बिहार के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले मुख्यमंत्री को क्यों नहीं?” विरोधियों के लिए यह सत्ता के समीकरणों को साधने की एक नई कोशिश है, एक ऐसा दाँव, जिससे सहानुभूति भी बटोरी जा सके और भविष्य की राजनीति का रास्ता भी तैयार किया जा सके।

यह विवाद केवल जदयू तक सीमित नहीं है। एनडीए का एक बड़ा हिस्सा इस माँग के साथ खड़ा दिखाई देता है, तो राजद और विपक्षी खेमा इसके विरुद्ध मोर्चा खोले हुए है। यह टकराव वैचारिक कम और राजनीतिक अधिक है। नीतीश कुमार का व्यक्तित्व यहाँ बहाने के रूप में है, असल संघर्ष बिहार की राजनीति में नेतृत्व के भविष्य को लेकर है।

एक ओर वे लोग हैं जो नीतीश कुमार को “आधुनिक बिहार का शिल्पकार” कहते हैं। उनके लिए नीतीश कुमार वह नेता हैं जिन्होंने सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनाया। जिन्होंने अपराध और जंगलराज की छवि से बिहार को बाहर निकालने की कोशिश की। जिन्होंने महिला सशक्तिकरण, शराबबंदी और पंचायतों में आरक्षण जैसे कदमों से सामाजिक संरचना में हस्तक्षेप किया।

दूसरी ओर वे लोग हैं जो कहते हैं कि नीतीश कुमार की राजनीति अब दिशाहीन हो चुकी है। बार-बार गठबंधन बदलना, वैचारिक अस्पष्टता और सत्ता के लिए किसी भी छोर तक जाने की प्रवृत्ति, यह सब उन्हें एक “थके हुए नेता” की श्रेणी में खड़ा करता है। उनके अनुसार, भारत रत्न की माँग एक प्रकार से यह स्वीकार करना है कि अब नीतीश कुमार वर्तमान के नहीं, बल्कि अतीत के नेता हैं।

यही द्वंद्व बिहार की राजनीति को इस समय आंदोलित कर रहा है। यह केवल सम्मान की बहस नहीं है, बल्कि यह प्रश्न है कि बिहार का भविष्य किस दिशा में जाएगा। क्या यह राज्य एक ऐसे नेता की विरासत को राष्ट्रीय सम्मान दिलाने के लिए एकजुट होगा, या फिर यह मुद्दा एक और राजनीतिक युद्ध का मैदान बनकर रह जाएगा?

इतिहास गवाह है कि भारत रत्न कभी केवल सम्मान नहीं रहा। यह अक्सर राजनीति से जुड़ा रहा है, कभी किसी युग के समापन का प्रतीक बना, तो कभी किसी विचारधारा की स्वीकृति का। बिहार में उठी यह माँग भी उसी परंपरा की अगली कड़ी प्रतीत होती है। फर्क केवल इतना है कि यहाँ सम्मान से अधिक, सत्ता की परछाइयाँ दिखाई दे रही हैं।

इस हवन कुंड में आहुतियाँ केवल शब्दों की नहीं पड़ रही हैं। इसमें दलों की एकता, नेताओं की छवि और भविष्य की रणनीतियाँ झोंकी जा रही हैं। कौन इस आग से तपकर निखरेगा और कौन राख हो जाएगा, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बिहार की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ हर निर्णय केवल वर्तमान को नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की दिशा को भी तय करेगा।

प्रधानमंत्री को लिखी गई वह पत्र क्या रंग लाएगी, यह प्रश्न अभी काल के गर्भ में है। लेकिन उससे पहले ही बिहार में राजनीतिक उथल-पुथल शुरू हो चुकी है। जदयू के भीतर दरारें स्पष्ट हो रही हैं, गठबंधनों के स्वर बदल रहे हैं और मीडिया में बहस तेज हो गई है। यह पूरा घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि भारत रत्न की यह माँग केवल एक सम्मान का प्रश्न नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति का नया अध्याय है। यह अध्याय कैसे लिखा जाएगा, सम्मान की स्याही से या संघर्ष की आग से, यही आने वाले समय की सबसे बड़ी कहानी बनने जा रही है।

“भारत रत्न” केवल एक पदक नहीं है, बल्कि भारत के गणराज्य द्वारा किसी व्यक्ति को दी जाने वाली सर्वोच्च नागरिक मान्यता है। इसकी स्थापना 1954 में हुई थी और इसका मूल उद्देश्य उन व्यक्तित्वों को सम्मानित करना था, जिन्होंने राष्ट्र के निर्माण, संस्कृति, विज्ञान, कला, समाजसेवा या सार्वजनिक जीवन में असाधारण योगदान दिया हो। लेकिन समय के साथ यह सम्मान केवल “योगदान” तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह राजनीति, विचारधारा और सत्ता-संतुलन की परछाइयों से भी जुड़ता चला गया।

“भारत रत्न” का इतिहास बताता है कि यह पुरस्कार अक्सर किसी युग के समापन, किसी विचारधारा की स्वीकृति या किसी राजनीतिक संदेश का माध्यम बना है। जवाहरलाल नेहरू, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, सरदार पटेल, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, यह नाम केवल व्यक्तियों के नहीं है, बल्कि राष्ट्र-निर्माण के प्रतीक हैं। इनके चयन में व्यापक राष्ट्रीय सहमति और ऐतिहासिक दृष्टि दिखाई देती है।

लेकिन जैसे-जैसे लोकतंत्र परिपक्व होता गया, वैसे-वैसे इस सम्मान के साथ राजनीति की उपस्थिति भी गहराती गई। इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, एपीजे अब्दुल कलाम, अटल बिहारी वाजपेयी, इन नामों के साथ एक युग की राजनीति, विचारधारा और जनभावना जुड़ी हुई है। कई बार यह सम्मान किसी नेता के जीवन-पर्यंत योगदान की स्वीकृति बना, तो कई बार यह राजनीतिक विरासत को राष्ट्रीय मान्यता देने का माध्यम।

यही कारण है कि जब भी किसी जीवित राजनेता के लिए भारत रत्न की माँग उठती है, तो उसके पीछे केवल “सम्मान” की भावना नहीं होती है। उसके भीतर कई परतें छिपी रहती हैं कि क्या वह नेता अब अपने राजनीतिक शिखर को पार कर चुका है? क्या यह सम्मान उसके युग के औपचारिक समापन का संकेत है? क्या इसके माध्यम से किसी विचारधारा को ऐतिहासिक वैधता दी जा रही है? या फिर यह भविष्य की राजनीति के लिए एक भावनात्मक आधार तैयार करने की रणनीति है?

बिहार में नीतीश कुमार के लिए उठी यह माँग भी इन्हीं प्रश्नों को जन्म देती है। भारत रत्न की परंपरा यह रही है कि अक्सर यह सम्मान या तो जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुँचे व्यक्तित्व को दिया गया है, या फिर किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसकी भूमिका इतिहास में स्थायी रूप से दर्ज हो चुकी हो। ऐसे में किसी सक्रिय मुख्यमंत्री के लिए यह माँग अपने आप में असामान्य है।

समर्थक इसे “बिहार के आत्मसम्मान” से जोड़ते हैं। उनका तर्क है कि भारत के कई राज्यों के नेताओं को यह सम्मान मिला है, लेकिन बिहार को आज तक ऐसा राष्ट्रीय गौरव प्राप्त नहीं हुआ है, जो राज्य के आधुनिक पुनर्निर्माण से जुड़ा हो। उनके अनुसार, नीतीश कुमार ने बिहार को जिस तरह प्रशासनिक अराजकता से निकालकर विकास की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया है, वह उन्हें इस सम्मान के लिए योग्य बनाता है।

विरोधी इसे राजनीति का उपकरण मानते हैं। उनके अनुसार, “भारत रत्न” की माँग किसी जीवित और सक्रिय नेता के लिए उठाना, उसे इतिहास के पन्नों में “पूर्ण” घोषित करने जैसा है। यह एक प्रकार से कहना है कि अब उसके पास देने को कुछ नया नहीं बचा। इसलिए वे इसे सम्मान से अधिक “राजनीतिक विदाई-पत्र” के रूप में देखते हैं।

यह बहस नई नहीं है। जब-जब किसी जीवित राजनेता के लिए इस सम्मान की चर्चा हुई है, तब-तब यही सवाल उठे हैं। अटल बिहारी वाजपेयी को यह सम्मान तब मिला, जब वे सक्रिय राजनीति से लगभग बाहर हो चुके थे। उस समय भी इसे एक युग के समापन के रूप में देखा गया था। उनके साथ लालकृष्ण आडवाणी जैसे समकालीन नेता थे, पर भारत रत्न केवल वाजपेयी को मिला, क्योंकि वे न केवल एक राजनेता थे, बल्कि एक युग की नैतिक और वैचारिक पहचान बन चुके थे।

भारत रत्न की प्रकृति ही ऐसी है कि वह केवल “काम” को नहीं, बल्कि “काल” को सम्मानित करता है। वह किसी व्यक्ति को नहीं, बल्कि उस दौर को स्मरणीय बनाता है, जिसमें वह व्यक्ति राष्ट्र की चेतना का प्रतिनिधि रहा हो। इसीलिए यह सम्मान अक्सर विवादों के बीच आता है, क्योंकि हर युग की अपनी राजनीति होती है और हर राजनीति अपने नायकों को गढ़ना चाहती है।

बिहार की राजनीति में इस सम्मान की चर्चा इसलिए भी गहरी हो जाती है, क्योंकि यहाँ अस्मिता का प्रश्न हमेशा केंद्र में रहा है। बिहार लंबे समय तक देश की राजनीति में “पिछड़ेपन” और “अराजकता” के प्रतीक के रूप में देखा गया है। ऐसे में किसी बिहारी नेता को भारत रत्न दिलाने की माँग, केवल एक व्यक्ति के सम्मान की बात नहीं रह जाती है, वह पूरे राज्य के आत्मसम्मान का प्रतीक बन जाती है।

यही भावनात्मकता राजनीति का सबसे बड़ा हथियार भी होती है। भारत रत्न की माँग एक ऐसा मुद्दा है, जो समर्थकों को गौरव की अनुभूति देता है और विरोधियों को रणनीतिक असहजता में डाल देता है। यह एक ऐसा विमर्श रचता है, जिसमें तर्क से अधिक भावना काम करती है। इसीलिए जदयू के भीतर उठा यह विवाद केवल संगठनात्मक मतभेद नहीं है। यह इस प्रश्न का उत्तर खोजने की कोशिश है कि नीतीश कुमार की राजनीति को किस कालखंड में रखा जाए। क्या वे अब भी वर्तमान के नेता हैं, जिनसे बिहार की दिशा तय होगी? या फिर वे अतीत के शिल्पकार हैं, जिनकी विरासत को सम्मानित कर अगली पीढ़ी को आगे बढ़ना है?

भारत रत्न की माँग इन दोनों दृष्टियों को आमने-सामने खड़ा कर देती है। एक पक्ष कहता है “सम्मान अभी मिलना चाहिए, जब योगदान जीवित है।” दूसरा कहता है “सम्मान तब मिलता है, जब भूमिका पूर्ण हो चुकी हो।” यही द्वंद्व बिहार की राजनीति को भीतर से मथ रहा है। यह केवल नीतीश कुमार का प्रश्न नहीं है। यह उस पूरी राजनीतिक संस्कृति का प्रश्न है, जिसमें सम्मान, सत्ता और विरासत एक-दूसरे में घुल-मिल जाते हैं।



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