हंसी, उलझन और अराजकता का नया अध्याय है - ‘मस्ती 4’

Jitendra Kumar Sinha
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बॉलीवुड की लोकप्रिय कॉमेडी फ्रेंचाइजी ‘मस्ती’ एक बार फिर दर्शकों को गुदगुदाने के लिए लौट आई है। ‘मस्ती’, ‘ग्रैंड मस्ती’ और ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ के बाद यह चौथी कड़ी ‘मस्ती 4’ नवंबर 2025 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी और अब यह ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी उपलब्ध है। इस बार भी फिल्म उसी परिचित अंदाज में वयस्क हास्य, गलतफहमियों और अराजक परिस्थितियों से भरी हुई है, जिसने इस फ्रेंचाइजी को पहचान दी है।


फिल्म की कहानी अमर, मीट और प्रेम नाम के तीन दोस्तों के इर्द-गिर्द घूमती है। तीनों अपनी-अपनी शादियों से ऊब चुके हैं। रोजमर्रा की जिम्मेदारियों और घरेलू जीवन की नीरसता से परेशान होकर वे कुछ दिनों की आजादी की तलाश में यूके की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। उन्हें लगता है कि यह सफर उन्हें फिर से “पुरानी मस्ती” में लौटा देगा।


लेकिन यूके पहुंचते ही उनकी योजनाएं उलझनों में बदल जाती हैं। गलत पहचान, अजीब संयोग, संदिग्ध लोग और अप्रत्याशित घटनाएं उन्हें ऐसी परिस्थितियों में फंसा देती हैं, जहां से निकलना और भी मुश्किल हो जाता है। यहीं से शुरू होता है हास्य का वह सिलसिला, जिसमें हर कदम पर भ्रम, डर और हंसी साथ-साथ चलता है।


रितेश देशमुख, आफताब शिवदासानी और विवेक ओबेरॉय की तिकड़ी एक बार फिर अपने परिचित अंदाज़ में लौटती है। रितेश की मासूमियत, आफताब का चालाक अंदाज़ और विवेक की घबराई हुई कॉमिक टाइमिंग फिल्म को संतुलन देती है।


इस बार अरशद वारसी की एंट्री फिल्म को नया रंग देती है। उनका चुटीला अंदाज़ और संवाद अदायगी कई दृश्यों को यादगार बना देती है। नरगिस फाखरी और अन्य सहायक कलाकार कहानी को आगे बढ़ाने में प्रभावी भूमिका निभाते हैं।


निर्देशक मिलाप जावेरी ने ‘मस्ती’ की आत्मा को बरकरार रखते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय लोकेशन और नए ट्विस्ट के साथ पेश किया है। यूके की पृष्ठभूमि फिल्म को दृश्यात्मक भव्यता देती है। तेज़ रफ्तार पटकथा, लगातार बदलती परिस्थितियां और हल्के-फुल्के संवाद दर्शकों को बांधे रखता है।


फिल्म में वही परिचित वयस्क हास्य मौजूद है, जो हर किसी के लिए नहीं है, लेकिन फ्रेंचाइजी के प्रशंसकों के लिए यह एक जाना-पहचाना स्वाद है।


बिना ज्यादा दिमाग लगाए सिर्फ हंसना चाहने वालो के लिए हैं, ‘मस्ती 4’ । यह फिल्म गंभीरता से दूर, केवल मनोरंजन के उद्देश्य से बनाई गई है। पुराने किरदारों की वापसी, नई लोकेशन और हास्यास्पद परिस्थितियां इसे एक हल्की-फुल्की वीकेंड एंटरटेनर बनाती हैं।


‘मस्ती 4’ यह साबित करती है कि कभी-कभी जिन्दगी की उलझनों से बचने के लिए बस थोड़ी सी मस्ती ही काफी होती है।



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