15 जनवरी को मनायी जायेगी “मकर संक्रांति”

Jitendra Kumar Sinha
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हिंदू पंचांग के अनुसार इस वर्ष सूर्य का मकर राशि में प्रवेश बुधवार, 14 जनवरी को रात्रि 9 बजकर 19 मिनट पर होगा। इसी क्षण से सूर्य उत्तरायण हो जाएंगे और देवताओं के दिन का आरंभ माना जाएगा। यद्यपि सूर्य का प्रवेश रात्रि में हो रहा है, परंतु उदयातिथि के आधार पर मकर संक्रांति का पर्व गुरुवार, 15 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन पुण्यकाल दोपहर 1 बजकर 19 मिनट तक रहेगा, जिसमें स्नान, दान और व्रत का विशेष महत्व है।


मकर संक्रांति केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि खगोलीय और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसे सूर्य के उत्तरायण होने का संकेत माना जाता है। उत्तरायण को शुभ काल माना गया है, जब देवताओं की सक्रियता बढ़ती है और शुभ कार्यों का आरंभ किया जा सकता है।


इसी दिन से खरमास की समाप्ति होती है। खरमास के दौरान विवाह, गृहप्रवेश, मुंडन जैसे मांगलिक कार्य वर्जित रहता है। संक्रांति के बाद पुनः शुभ कार्य आरंभ हो जाता है, इसलिए समाज में इसे नई शुरुआत के रूप में देखा जाता है।


15 जनवरी को मकर संक्रांति का पुण्यकाल प्रातःकाल से लेकर दोपहर 1 बजकर 19 मिनट तक रहेगा। इस अवधि में गंगा, यमुना या किसी पवित्र नदी में स्नान करने का विशेष महत्व है। जिनके लिए नदी स्नान संभव न हो, वे घर पर ही स्नान कर सूर्य को अर्घ्य देकर पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।


इस दिन तिल, गुड़, चावल, कंबल, वस्त्र और अन्न का दान अत्यंत फलदायी माना गया है। मान्यता है कि इस दिन किया गया दान अनेक गुना फल देता है और जीवन में सुख-समृद्धि लाता है।


मकर संक्रांति भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनायी जाती है। उत्तर भारत में इसे खिचड़ी पर्व कहा जाता है, जहां तिल-गुड़ और खिचड़ी का विशेष महत्व होता है। महाराष्ट्र में लोग “तिलगुल घ्या, गोड गोड बोला” कहकर मिठास बांटते हैं। पंजाब में लोहड़ी, तमिलनाडु में पोंगल और असम में बिहू के रूप में यह पर्व मनाया जाता है।


पतंग उड़ाने की परंपरा भी इसी दिन से जुड़ी है, जो आकाश में उमंग और उल्लास का रंग भर देती है। यह पर्व केवल धार्मिक नहीं है, बल्कि सामाजिक समरसता और भाईचारे का प्रतीक भी है।


मकर संक्रांति प्रकृति के साथ तालमेल बैठाने का संदेश देती है। सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही दिन बड़े होने लगता हैं, ठंड कम होने लगता है और जीवन में नई ऊर्जा का संचार होता है। यह पर्व आलस्य छोड़कर कर्म, सेवा और दान के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।


इस प्रकार 15 जनवरी को मनायी जाने वाली मकर संक्रांति केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि जीवन में प्रकाश, आशा और सकारात्मक परिवर्तन का प्रतीक है।



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