संविधान की आत्मा और गणतंत्र उत्सव

Jitendra Kumar Sinha
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भारत का संविधान केवल शासन-प्रणाली चलाने का दस्तावेज़ नहीं है। यह किसी विधि-ग्रंथ की तरह शुष्क धाराओं का संग्रह भी नहीं है, बल्कि यह उस चेतना का लिखित स्वरूप है, जिसने सहस्राब्दियों से इस भूमि को धर्म, करुणा, समन्वय और लोकमंगल की दिशा में प्रवाहित किया है। यह संविधान भारत की आत्मा का आधुनिक उच्चारण है, जहाँ प्राचीन जीवन-दर्शन और आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक बनकर उपस्थित होते हैं। जब हम कहते हैं कि “हमारा संविधान सर्वश्रेष्ठ और लोक-कल्याणकारी है”, तो यह केवल आत्मगौरव की उद्घोषणा नहीं होती है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक अनुभव का निष्कर्ष होता है, जिसने राजतंत्र, उपनिवेशवाद, दमन, विभाजन और संघर्ष के बीच से गुजरते हुए मानव गरिमा, समानता और न्याय को अपने केंद्र में स्थापित किया है। भारतीय गणतंत्र की विशेषता यह है कि उसने शक्ति को सत्ता के सिंहासन से उतारकर जन-चेतना के हाथों में सौंपा। यहाँ संविधान शासक को नियंत्रित करता है, जनता को नहीं और यही इसे लोकमंगलकारी बनाता है।

भारत को यदि केवल नक़्शे पर खींची गई रेखाओं से परिभाषित किया जाए, तो यह इस सभ्यता के साथ अन्याय होगा। यह भूमि केवल मिट्टी, पर्वत, नदियों और समुद्रों का विस्तार नहीं है बल्कि यह आत्मचेतना का परमोत्सव है। यहीं वेदों की ऋचाएँ गूँजीं, यहीं उपनिषदों ने “अहं ब्रह्मास्मि” का उद्घोष किया, यहीं बुद्ध ने करुणा को मार्ग बनाया, यहीं महावीर ने अहिंसा को जीवन-सूत्र कहा और यहीं संतों ने प्रेम को ईश्वर से बड़ा ठहराया। भारत की भूमि ने कभी एक ही मार्ग को अंतिम सत्य नहीं माना है, बल्कि विविधता में एकता को जीवन का स्वभाव बनाया है। यही कारण है कि भारतीय संविधान धर्मनिरपेक्ष होते हुए भी धर्म-विरोधी नहीं है। वह आस्था का सम्मान करता है, लेकिन उसे सत्ता का औज़ार बनने से रोकता है। वह स्वतंत्रता देता है, लेकिन अराजकता की अनुमति नहीं देता है। वह अधिकार देता है, लेकिन कर्तव्य की स्मृति भी कराता है। यह संतुलन ही भारत की आत्मा है।

भारतीय संदर्भ में धर्म किसी संप्रदाय का नाम नहीं है। धर्म वह व्यवस्था है जो जीवन को अनुशासित, समाज को संतुलित और सत्ता को मर्यादित करती है। धर्म का धवल प्रकाश राजा को न्यायप्रिय बनाता है, प्रजा को कर्तव्यशील, समाज को करुणामय और राष्ट्र को स्थायी। इसी धर्म-बोध से लोकमंगल की अवधारणा जन्म लेती है। लोकमंगल का अर्थ है व्यक्ति के सुख से आगे जाकर समष्टि के कल्याण की चिंता। भारतीय संविधान इसी लोकमंगल की आधुनिक अभिव्यक्ति है। इसमें राज्य को कल्याणकारी बनाया गया, केवल प्रशासनिक नहीं। शिक्षा, स्वास्थ्य, समान अवसर, सामाजिक न्याय, यह सभी उसी शाश्वत लोकमंगल-संकल्प की धाराएँ हैं।

भारतीय गणतंत्र का मूल मंत्र है “सबके लिए न्याय, सबके लिए सम्मान।” यहाँ समानता का अर्थ एकरूपता नहीं है, बल्कि अवसरों की समान उपलब्धता है। यहाँ न्याय का अर्थ केवल अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक संरचना में व्याप्त असमानताओं को मिटाने का प्रयास है। यहाँ सद्भाव केवल सहनशीलता नहीं है, बल्कि सह-अस्तित्व की स्वीकृति है। भारत का गणतंत्र इस अर्थ में अनूठा है कि उसने बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की राजनीति के बजाय मानव गरिमा को केंद्र में रखा है। यह संविधान किसी जाति, वर्ग, भाषा या धर्म का नहीं। यह भारत के नागरिक का संविधान है।

जहाँ पश्चिमी लोकतंत्र संघर्ष और टकराव के सिद्धांत पर खड़े दिखाई देते हैं, वहीं भारतीय गणतंत्र संवाद और समन्वय पर आधारित है। “वसुधैव कुटुम्बकम्” कोई काव्य-पंक्ति नहीं है, बल्कि भारतीय चेतना का सूत्र है।
इसी चेतना ने सिखाया है कि मतभेद विनाश का कारण नहीं है, बल्कि विमर्श का अवसर होता है। संविधान ने इसी दर्शन को संस्थागत रूप दिया है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आस्था की स्वतंत्रता और विचारों की बहुलता। लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि स्वतंत्रता उत्तरदायित्व से पृथक नहीं हो सकती है।

जब तिरंगा चारो ओर लहराता है, तो वह केवल ध्वज नहीं रहता है बल्कि वह राष्ट्रीय चेतना का घोष बन जाता है। त्याग और साहस का स्मरण कराता है केसरिया रंग, शांति, सत्य और विवेक का प्रतीक है श्वेत रंग, जीवन, उर्वरता और आशा का प्रतीक है हरा रंग और निरंतर गति और धर्म के शासन का प्रतीक है अशोक चक्र। तिरंगे की ओजस्विता बार-बार याद दिलाती है कि अनेक होते हुए भी एक हैं, विविध होते हुए भी एक लक्ष्य से बंधे हैं और स्वतंत्र होते हुए भी उत्तरदायी हैं।

आधुनिक लोकतंत्र का सबसे बड़ा आकर्षण अधिकार हैं। मत देने का अधिकार, बोलने का अधिकार, विरोध करने का अधिकार। यह सभी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा हैं। किन्तु जब अधिकार कर्तव्य से अलग होकर खड़े हो जाते हैं, तब लोकतंत्र शोर तो बनता है, संस्कार नहीं। भारतीय संविधान इस तथ्य को भली-भाँति समझता है। इसीलिए उसने नागरिकों को अधिकारों के साथ-साथ मौलिक कर्तव्यों की स्मृति भी कराई है। कर्तव्य कोई बोझ नहीं है, बल्कि राष्ट्र के प्रति आत्मिक उत्तरदायित्व है। कर्तव्य वह सेतु है, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाज की स्थिरता से जोड़ता है। यदि अधिकार बोध कराता हैं, तो कर्तव्य विवेक प्रदान करता है।

भारतीय जीवन-दर्शन में अधिकार कभी भी प्राथमिक नहीं रहा है। यहाँ पहले कर्तव्य आया है माता-पिता के प्रति, समाज के प्रति, प्रकृति के प्रति और राष्ट्र के प्रति। राजा का कर्तव्य प्रजा की रक्षा था, गृहस्थ का कर्तव्य समाज का पालन और साधक का कर्तव्य आत्मोद्धार। इसी परंपरा का विस्तार भारतीय संविधान में दिखाई देता है। यहाँ स्वतंत्रता स्वेच्छाचार नहीं है और समानता अराजक समता नहीं। यहाँ हर अधिकार के पीछे एक नैतिक अपेक्षा खड़ी है।

भारतीय संविधान के मौलिक कर्तव्य आदेश नहीं देता है,वह आह्वान करता है। वह कहता है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता की रक्षा करो। संविधान, ध्वज और राष्ट्रगान का सम्मान करो। वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवीयता विकसित करो। प्रकृति और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करो। स्त्रियों के सम्मान और सामाजिक समरसता को बढ़ाओ। यह कर्तव्य किसी दंड के भय से नहीं बल्कि नैतिक विवेक से निभाए जाने के लिए हैं। यही भारतीय गणतंत्र की विशिष्टता है यह नागरिक को नियंत्रित नहीं करता है बल्कि उसे संस्कृत करता है।

अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि अनुशासन स्वतंत्रता का शत्रु है। जबकि सत्य इसके ठीक विपरीत है। अनुशासन के बिना स्वतंत्रता उच्छृंखलता बन जाती है। संवाद टकराव में बदल जाता है और लोकतंत्र अराजकता में। भारतीय संविधान ने स्वतंत्रता को अनुशासन के साथ जोड़ा है। यही कारण है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी उचित प्रतिबंधों के अधीन है। यह कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक परिपक्वता का प्रमाण है।

गणतंत्र नागरिकों से बनता है, भीड़ से नहीं। नागरिक सोचता है, समझता है और उत्तरदायित्व निभाता है। भीड़ केवल प्रतिक्रिया देती है। जब कर्तव्य-बोध कमजोर होता है, तो नागरिक भीड़ में बदल जाता है और तब संविधान काग़ज बनकर रह जाता है। इसलिए गणतंत्र को बचाने का सबसे बड़ा उपाय है नागरिक चेतना का जागरण।

“एक भारत - श्रेष्ठ भारत” कोई नारा नहीं है, यह एक जीवन-प्रणाली है। इसका अर्थ है भाषा के भेद में संवाद, आस्था के भेद में सम्मान और परंपरा के भेद में समन्वय। श्रेष्ठ भारत वह नहीं जहाँ मतभेद न हों, श्रेष्ठ भारत वह है जहाँ मतभेद संघर्ष में न बदलें। यह तभी संभव है जब अधिकार के साथ-साथ कर्तव्य को भी उतनी ही गंभीरता से लिया जाए। 

भारत में राष्ट्र की अवधारणा केवल सत्ता-तंत्र नहीं है। यहाँ राष्ट्र पूज्य है, क्योंकि यह सांस्कृतिक स्मृति, वर्तमान संघर्ष और भविष्य की आशा, तीनों का समन्वय है। राष्ट्र-आराधना का अर्थ आँख मूँदकर समर्थन नहीं है बल्कि सजग सहभागिता है। प्रश्न के साथ प्रतिबद्धता है और आलोचना के साथ समाधान, यही सच्चा गणतांत्रिक भाव है।

जब धर्मनिरपेक्षता शब्द का उच्चारण करते हैं, तो प्रायः उसे पश्चिमी संदर्भों में समझने की भूल कर बैठते हैं। पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है धर्म और राज्य के बीच स्पष्ट दूरी। लेकिन भारत में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी धर्मों के प्रति समान आदर। भारतीय संविधान ने धर्म को न तो नकारा है, न ही उसे सत्ता का उपकरण बनने दिया। यहाँ राज्य किसी धर्म का प्रचारक नहीं है और न ही धर्म राज्य का संचालक। यह संतुलन भारतीय चेतना की देन है, जहाँ धर्म को जीवन-मूल्य माना गया है, सत्ता-संरचना नहीं।

भारतीय परंपरा में धर्म केवल पूजा-पद्धति नहीं है। धर्म वह व्यवस्था है, जो व्यक्ति को आत्मसंयम सिखाती है समाज को समरसता और सत्ता को मर्यादा। इसीलिए भारतीय गणतंत्र धर्मनिरपेक्ष होते हुए भी धर्म-शून्य नहीं है। यह धर्म की आत्मा को स्वीकार करता है न कि उसके बाह्य आडंबर को। संविधान ने यही किया है कि आस्था की स्वतंत्रता दी, लेकिन किसी भी आस्था को दूसरे पर थोपने की अनुमति नहीं दी।

भारतीय गणतंत्र की आत्मा को यदि किसी एक दार्शनिक सूत्र में बाँधा जाए, तो वह है अद्वैत। अद्वैत का अर्थ यह नहीं कि सब एक जैसे हों, बल्कि यह कि भिन्नताओं के पार मूल एकता को देखा जाए। जाति, भाषा, पंथ, क्षेत्र, यह सब बाह्य पहचानें हैं। अद्वैत सिखाता है कि इन सबके भीतर मानव मात्र एक है। यही अद्वैत संविधान के अनुच्छेदों में सांस लेता है समानता का अधिकार, धर्म की स्वतंत्रता और विधि के समक्ष समानता। यह कोई कानूनी विवशता नहीं, बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि का लोकतांत्रिक रूपांतरण है।

भारत कभी एकरूप नहीं रहा। यहाँ विविधता कोई समस्या नहीं, बल्कि पहचान है। भाषाएँ बदलीं, पर संवाद बना रहा। परंपराएँ बदलीं, पर सह-अस्तित्व बना रहा। विचार टकराए, पर समाज टूटा नहीं। भारतीय संविधान ने इसी बहुलता को संरक्षित किया है। यहाँ विविधता को सहन नहीं किया गया बल्कि उसे संवैधानिक संरक्षण दिया गया। यही कारण है कि भारत में गणतंत्र केवल राजनीतिक व्यवस्था नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समन्वय का मंच है।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता का सबसे बड़ा संकट तब उत्पन्न होता है, जब उसे तुष्टीकरण से भ्रमित कर दिया जाता है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी के साथ न्याय। तुष्टीकरण का अर्थ है कुछ के साथ पक्षपात। संविधान ने कभी तुष्टीकरण का समर्थन नहीं किया। उसका उद्देश्य था ऐतिहासिक अन्याय को दूर करना, न कि नए असंतुलन पैदा करना। सच्ची धर्मनिरपेक्षता वही है जो बहुसंख्यक को संयम सिखाए और अल्पसंख्यक को सुरक्षा दे बिना किसी के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाए।

भारत केवल सहिष्णु नहीं रहा है बल्कि भारत सह-अस्तित्ववादी रहा है। सहिष्णुता में एक प्रकार की श्रेष्ठता का भाव छिपा होता है, जैसे कोई किसी और को “सहन” कर रहा हो। जबकि सह-अस्तित्व में बराबरी होती है। भारतीय गणतंत्र ने सह-अस्तित्व को अपनाया है जहाँ हर विचार को स्थान है, पर किसी को वर्चस्व का अधिकार नहीं है।



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