भारत का संविधान सामाजिक न्याय की अवधारणा पर टिका है। सदियों तक जातिगत भेदभाव, छुआछूत और सामाजिक बहिष्कार का शिकार रहे अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) समुदायों को गरिमा और सुरक्षा देने के लिए कई संवैधानिक और वैधानिक उपाय किए गए। इन्हीं में से एक है अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, जिसे आम तौर पर एससी-एसटी एक्ट कहा जाता है।
समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि इस कानून का प्रयोग सुरक्षा के लिए हो रहा है या दुरुपयोग के लिए। सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला इसी बहस के केंद्र में आ खड़ा हुआ है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि “सिर्फ अपशब्द कह देना, या पीड़ित की जाति की जानकारी होना, अपने-आप में एससी-एसटी कानून के तहत अपराध नहीं है, जब तक कि अपमान जानबूझकर और जाति के आधार पर न किया गया हो।” यह फैसला न केवल एक विशेष मामले का निपटारा करता है, बल्कि भविष्य में एससी-एसटी कानून की व्याख्या और उसके प्रयोग की दिशा भी तय करता है।
यह मामला एक आपराधिक अपील के रूप में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आया। निचली अदालत और बाद में हाईकोर्ट ने आरोपी के खिलाफ एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई को सही ठहराया था। आरोप यह था कि आरोपी ने पीड़ित को अपशब्द कहे और पीड़ित अनुसूचित जाति/जनजाति से संबंधित था। एफआईआर और चार्जशीट में कहीं यह स्पष्ट नहीं था कि अपशब्द जातिगत नाम लेकर कहे गए या पीड़ित को उसकी जाति के कारण अपमानित करने की मंशा थी।
हाईकोर्ट ने यह मान लिया कि चूंकि पीड़ित एससी/एसटी वर्ग से है और आरोपी को उसकी जाति की जानकारी थी, इसलिए एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध बनता है। यहीं से विवाद की जड़ पैदा हुई।
इस मामले की सुनवाई जस्टिस जे.बी. परदीवाला और जस्टिस आलोक आराधे की पीठ ने की। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को उलट दिया, निचली अदालत की कार्यवाही को भी त्रुटिपूर्ण बताया और कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई के लिए आवश्यक तत्वों की अनदेखी की गई।
न्यायालय ने दो टूक कहा कि “एससी-एसटी एक्ट का उद्देश्य अनुसूचित जाति और जनजाति के सदस्यों को उनके सामाजिक दर्जे के कारण अपमान और अत्याचार से बचाना है, न कि हर आपराधिक या व्यक्तिगत विवाद को इस कानून के दायरे में लाना।” यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह कानून की आत्मा (Spirit of Law) को रेखांकित करती है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले में एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध बनने के लिए दो अनिवार्य कसौटियाँ स्पष्ट की है। पहली कसौटी- परिवादी (शिकायतकर्ता) का अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से होना आवश्यक है। यह एक मौलिक शर्त है।दूसरी कसौटी- आरोपी ने सार्वजनिक स्थान पर, जानबूझकर, जातिगत नाम का प्रयोग करते हुए, पीड़ित को अपमानित या नीचा दिखाने की मंशा से शब्द कहे हों।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि सामान्य गाली-गलौज, व्यक्तिगत झगड़ा या आवेश में बोले गए अपशब्द, जब तक जातिगत पहचान को हथियार की तरह इस्तेमाल न करें, तब तक एससी-एसटी एक्ट स्वतः लागू नहीं होगा।
भारतीय आपराधिक कानून में मंशा (Mens Rea) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी का उद्देश्य केवल अपमान करना था, लेकिन जातिगत पहचान को निशाना नहीं बनाया गया, तो एससी-एसटी एक्ट की कठोर धाराएं लागू नहीं की जा सकती।
न्यायालय ने दोनों में अंतर किया कि जातिगत शब्द का प्रयोग- केवल किसी जाति का नाम लेना। जातिगत अपमान- किसी व्यक्ति को उसकी जाति के कारण नीचा दिखाने का प्रयास। दोनों एक जैसे नहीं हैं।
एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) में यह स्पष्ट है कि अपमान सार्वजनिक दृश्य (public view) में होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि यदि कथित अपमान निजी स्थान पर हुआ हो और वहां कोई तीसरा व्यक्ति मौजूद न हो, तो यह धारा लागू नहीं होती।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा कि न तो एफआईआर में और न ही आरोपपत्र में, जातिगत अपमान का स्पष्ट आरोप लगाया गया था। इसके बावजूद निचली अदालत और हाईकोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट के तहत कार्रवाई को सही ठहरा दिया, जो कि कानून की गलत व्याख्या है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर “दुरुपयोग” शब्द का प्रयोग नहीं किया, लेकिन फैसले की भाषा से यह स्पष्ट है कि अदालत कानून के अंधाधुंध प्रयोग से चिंतित है और चाहती है कि निर्दोष व्यक्तियों को कठोर कानूनों के तहत अनावश्यक रूप से फंसाया न जाए।
सुभाष काशीनाथ महाजन मामला (2018) - इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी से पहले प्रारंभिक जांच की बात कही थी, बाद में संसद ने संशोधन कर इसे आंशिक रूप से निष्प्रभावी कर दिया।
प्रवीण प्रकाश बनाम राज्य मामला- इसमें भी अदालत ने कहा था कि हर विवाद को एससी-एसटी एक्ट के तहत नहीं लाया जा सकता, जब तक जातिगत अत्याचार स्पष्ट न हो।
नया फैसला इन्हीं न्यायिक सिद्धांतों की निरंतरता है। यह फैसला एक बड़े संवैधानिक प्रश्न को छूता है कि पीड़ित को सुरक्षा बनाम आरोपी को निष्पक्ष न्याय। सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि सामाजिक न्याय का मतलब यह नहीं कि न्याय की प्रक्रिया ही अन्यायपूर्ण हो जाए।
कानूनविदों का एक वर्ग मानता है कि यह फैसला कानून की शुद्धता को बनाए रखने वाला है। इससे झूठे या अतिरंजित मामलों में कमी आएगी। आलोचना और आशंकाएं है कि कुछ सामाजिक संगठनों को डर है कि इससे पीड़ितों के लिए न्याय पाना और कठिन हो सकता है। उनका तर्क है कि मंशा साबित करना हमेशा आसान नहीं होता।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पुलिस, जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश है कि “एससी-एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज करते समय कानूनी तत्वों की गहराई से जांच करें।”
एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया के तहत अब पुलिस को यह सुनिश्चित करना होगा कि जातिगत अपमान का आरोप स्पष्ट और ठोस हो। अदालतों में प्रारंभिक स्तर पर ही कमजोर मामलों को खारिज किया जा सकेगा। पीड़ितों और समाज दोनों को यह समझना होगा कि एससी-एसटी एक्ट एक संरक्षण का औजार है,
बदले का नहीं।
अनुच्छेद 17 छुआछूत को समाप्त करता है, अनुच्छेद 21 गरिमा के साथ जीवन का अधिकार देता है और सुप्रीम कोर्ट इन दोनों के बीच संतुलन साधने की भूमिका निभाता है। यह फैसला उसी संतुलन की एक मिसाल है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय यह नहीं कहता है कि जातिगत अपमान कम गंभीर अपराध है। बल्कि यह कहता है कि कानून का प्रयोग सोच-समझकर हो, मंशा और परिस्थिति की जांच हो और न्याय दोनों पक्षों के लिए निष्पक्ष हो। अंतत एससी-एसटी कानून की ताकत उसी में है कि वह वास्तविक पीड़ित को सुरक्षा दे और साथ ही न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता बनाए रखे।
