पटना शहर में आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जिससे आम लोगों में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। विशेष रूप से रेबीज जैसी घातक बीमारी का खतरा इस समस्या को और गंभीर बना देता है। इसी को ध्यान में रखते हुए पटना नगर निगम ने आवारा कुत्तों के लिए “टीकाकरण एवं नसबंदी अभियान” को तेज कर दिया है। यह अभियान न केवल मानव सुरक्षा से जुड़ा है, बल्कि पशु कल्याण के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इस अभियान के तहत पकड़े गए कुत्तों के “बाएं कान का छोटा सा हिस्सा काटा जा रहा है”। यह प्रक्रिया चिकित्सा भाषा में ईयर-नॉचिंग कहलाती है। इसका उद्देश्य किसी भी कुत्ते को देखकर तुरंत यह पहचान करना है कि उसका टीकाकरण और नसबंदी हो चुका है या नहीं। इससे एक ही कुत्ते को दोबारा पकड़ने, टीका लगाने या सर्जरी कराने की जरूरत नहीं पड़ती और संसाधनों की बचत होती है।
नगर निगम के अनुसार, जिन कुत्तों को पकड़ा जाता है, उनका पहले “रेबीज का टीकाकरण” और फिर “नसबंदी” की जाती है। पूरी प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन कुत्तों को उसी इलाके में वापस छोड़ दिया जाता है, जहां से उन्हें पकड़ा गया था। इससे क्षेत्रीय संतुलन बना रहता है और नए, बिना टीकाकरण वाले कुत्तों का बाहरी प्रवेश भी रोका जा सकता है।
इस पूरे अभियान को प्रभावी ढंग से चलाने के लिए पटना नगर निगम एक निजी एजेंसी की मदद ले रहा है। नगर निगम के अनुसार, प्रति कुत्ता औसतन 1050 रुपये का खर्च आ रहा है, जिसमें पकड़ने, टीकाकरण, नसबंदी, दवा, देखभाल और पुनः छोड़ने की लागत शामिल है। यह खर्च नगर निगम के पशु कल्याण और सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट से किया जा रहा है।
नगर निगम ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी कार्रवाई “एनिमल वेलफेयर बोर्ड ऑफ इंडिया” के दिशा-निर्देशों के अनुरूप किया जा रहा है। कान काटने की प्रक्रिया बेहद सीमित और सुरक्षित होती है, जिससे कुत्तों को गंभीर दर्द या दीर्घकालिक नुकसान नहीं होता है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनाई जाने वाली एक मानक पहचान विधि मानी जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के संगठित अभियान से न केवल रेबीज के मामलों में कमी आएगी, बल्कि आवारा कुत्तों की आबादी भी नियंत्रित होगी। साथ ही, यह मॉडल मानव सुरक्षा और पशु अधिकार, दोनों के बीच संतुलन बनाने की एक व्यावहारिक कोशिश है।
पटना नगर निगम का यह अभियान शहर को रेबीज मुक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि इसे निरंतरता और पारदर्शिता के साथ चलाया गया, तो आने वाले वर्षों में आवारा कुत्तों से जुड़ी समस्याओं में उल्लेखनीय कमी देखी जा सकती है।
