बदलती छवि बदलता बिहार - मुंबई के बाद अब बिहार बनेगा भारत का नया सिनेमा हब

Jitendra Kumar Sinha
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एक समय था जब बिहार का नाम आते ही देश के दूसरे हिस्सों में गरीबी, पलायन और पिछड़ेपन की तस्वीर उभर आती थी। लेकिन अब वही बिहार अपनी एक नयी पहचान गढ़ रहा है, संभावनाओं, प्रतिभा और सृजनशीलता की भूमि के रूप में। जिस प्रदेश को कभी “श्रमिकों का राज्य” कहा जाता था, आज वही राज्य “सपनों के सिनेमा हब” की ओर बढ़ रहा है।

फिल्में किसी समाज का दर्पण होती हैं। वे न केवल मनोरंजन देती हैं, बल्कि पहचान भी गढ़ती हैं। बिहार ने अब यह समझ लिया है कि सिनेमा केवल कला नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था, रोजगार और वैश्विक छवि निर्माण का सशक्त माध्यम है। इसी सोच से जन्मी है बिहार फिल्म प्रोत्साहन नीति, जिसने राज्य को फिल्म निर्माताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना दिया है।

आज बिहार में 40 फिल्मों को शूटिंग की अनुमति दी जा चुकी है, जिनमें से 33 फिल्मों का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है। यह केवल आँकड़ा नहीं, बल्कि उस बदलाव का प्रमाण है, जिसमें बिहार खुद को एक “फिल्म फ्रेंडली स्टेट” के रूप में स्थापित कर रहा है।

बिहार का सिनेमा से रिश्ता नया नहीं है। मूक फिल्मों के दौर से लेकर आज तक बिहार की धरती ने कई कहानियों को जन्म दिया है। 1960 और 70 के दशक में बनी कुछ हिन्दी फिल्मों में गया, नालंदा और पटना की झलक दिखती थी। बाद में भोजपुरी सिनेमा ने बिहार को अपनी आत्मा बनाया।

भोजपुरी फिल्में लंबे समय तक बिहार की सांस्कृतिक पहचान का माध्यम बनी रहीं। हालांकि, संसाधनों की कमी, तकनीकी पिछड़ापन और अव्यवस्थित ढांचे के कारण यह उद्योग सीमित दायरे में ही सिमट गया। प्रतिभा थी, कहानियाँ थीं, लोकेशन थीं पर मंच नहीं था।

यही वह खालीपन था, जिसे भरने के लिए राज्य सरकार ने संगठित नीति के रूप में सिनेमा को अपनाने का निर्णय लिया है। यह सिर्फ फिल्मों को अनुमति देने का मामला नहीं था, बल्कि एक पूरे इकोसिस्टम को विकसित करने की सोच थी।

बिहार फिल्म प्रोत्साहन नीति ने राज्य को फिल्म निर्माताओं के लिए “रेड टेप” से मुक्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया। पहले जहां शूटिंग के लिए महीनों तक अनुमति का इंतजार करना पड़ता था, अब एक सिंगल विंडो सिस्टम के माध्यम से प्रक्रिया सरल कर दी गयी है।

इस नीति के अंतर्गत शूटिंग परमिट की प्रक्रिया तेज और पारदर्शी की गयी है। स्थानीय कलाकारों और तकनीशियनों को प्राथमिकता दी गई है। राज्य में शूटिंग करने पर आर्थिक प्रोत्साहन दिया जा रहा है। फिल्म टूरिज्म को बढ़ावा देने के लिए अतिरिक्त सब्सिडी दी जा रही है और स्थानीय युवाओं के प्रशिक्षण के लिए वर्कशॉप और मास्टर क्लास शुरू किया जा रहा है।  इस नीति ने फिल्म निर्माताओं को यह भरोसा दिया है कि बिहार अब “मुश्किल राज्य” नहीं है, बल्कि “सुविधाजनक और सहयोगी राज्य” है।

जब कहा जाता है कि बिहार में अब तक 40 फिल्मों को शूटिंग की अनुमति दी जा चुकी है, तो यह सिर्फ संख्या नहीं है। इसके पीछे विश्वास, सुविधा और बदलती मानसिकता की कहानी छिपी है। इन फिल्मों में भोजपुरी के साथ-साथ हिन्दी और अंग्रेजी प्रोजेक्ट, वेब सीरीज और डॉक्यूमेंट्री, सामाजिक विषयों पर आधारित फीचर फिल्में, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाली कथाएँ।  

33 फिल्मों का निर्माण पूरा हो जाना यह दिखाता है कि नीति केवल कागजों तक सीमित नहीं रही है। शूटिंग हुई, स्थानीय लोग जुड़े, होटल भरे, टैक्सी चली, कैटरिंग कंपनियाँ सक्रिय हुईं। एक फिल्म यूनिट जब किसी शहर में आती है, तो वह अपने साथ पूरा बाजार लेकर आती है।

आज बिहार के कई शहर फिल्म निर्माताओं के पसंदीदा बनते जा रहा है। आधुनिक और ऐतिहासिक संगम
है पटना। पहाड़, प्रकृति और बौद्ध विरासत है राजगीर।  विरासत धरोहर है नालंदा, आध्यात्मिक वातावरण है गया, गंगा किनारे की सांस्कृतिक धारा है भागलपुर और गांधी की स्मृतियों से जुड़ा शहर है मोतिहारी। इन स्थानों की खूबसूरती अब कैमरे की आँख से दुनिया तक पहुँच रही है। बिहार केवल पृष्ठभूमि नहीं बन रहा है, बल्कि कहानी का पात्र बनता जा रहा है।

अब तक बिहार को सिनेमा की दुनिया में मुख्यतः भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के संदर्भ में ही जाना जाता था। भोजपुरी सिनेमा ने अपनी एक अलग पहचान बनाई, लेकिन उसकी सीमाएँ भी स्पष्ट थी कम बजट, सीमित तकनीक, सीमित दर्शक वर्ग। नई फिल्म नीति के बाद बिहार का दायरा बदल गया है। अब यहाँ केवल भोजपुरी ही नहीं, बल्कि हिन्दी, अंग्रेजी और अंतरराष्ट्रीय स्तर की परियोजनाएँ भी आ रही हैं। वेब सीरीज़, शॉर्ट फिल्म्स और डॉक्यूमेंट्री के लिए बिहार एक नया कैनवस बन गया है।

आज के फिल्म निर्माता “नई लोकेशन, नई कहानियाँ और नई संस्कृति” की तलाश में रहते हैं। बिहार उन्हें यह तीनों देता है, गंगा के घाट, प्राचीन विश्वविद्यालय नालंदा, राजगीर की पहाड़ियाँ, गांवों की सादगी, शहरों की बदलती आधुनिकता। इन सबके बीच बिहार की सामाजिक विविधता कहानीकारों को असंख्य कथानक देती है। यही कारण है कि अब बिहार “बैकड्रॉप” नहीं, बल्कि “कहानी का केंद्र” बन रहा है।

जब किसी शहर में फिल्म की शूटिंग होती है, तो उसका प्रभाव केवल कैमरे तक सीमित नहीं रहता है बल्कि पूरी स्थानीय अर्थव्यवस्था उसमें शामिल हो जाती है। एक फिल्म यूनिट में शामिल होता है- निर्देशक और कलाकार, कैमरा और लाइटिंग टीम, मेकअप आर्टिस्ट,सेट डिजाइनर, ड्राइवर, कुक और कैटरिंग स्टाफ, होटल और गेस्ट हाउस। इन सभी को ठहरने, खाने, घूमने और परिवहन की आवश्यकता होती है। इसका सीधा लाभ स्थानीय व्यापारियों को मिलता है।

पटना, गया और राजगीर जैसे शहरों में शूटिंग के दौरान होटलों की बुकिंग बढ़ी, टैक्सी और ऑटो चालकों की आमदनी बढ़ी, लोकल मार्केट में खरीदारी बढ़ी, कैटरिंग और इवेंट कंपनियों को नया काम मिला। इस तरह सिनेमा एक मल्टी-लेयर इकोनॉमिक इंजन बन गया है। फिल्में केवल बनती नहीं है बल्कि वे रास्ते भी बनाती हैं पर्यटन के रास्ते। जब कोई फिल्म किसी स्थान को सुंदर ढंग से दिखाती है, तो दर्शकों के मन में उस जगह को देखने की इच्छा जागती है। यही है फिल्म टूरिज्म।

बिहार सरकार ने इसे रणनीति के रूप में अपनाया है। जो फिल्में बिहार की लोकेशन को प्रमुखता से दिखाती हैं, उन्हें अतिरिक्त प्रोत्साहन दिया जा रहा है। कल्पना किया जाए कि किसी फिल्म में राजगीर की पहाड़ियाँ, किसी वेब सीरीज में गंगा घाट, किसी डॉक्यूमेंट्री में नालंदा विश्वविद्यालय, इन दृश्यों को देखने के बाद देश-विदेश के लोग इन जगहों तक पहुँचेंगे। इससे होटल उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, गाइड और ट्रैवल एजेंसी विकसित होगी, स्थानीय हस्तशिल्प और बाजार को ग्राहक मिलेंगे, ग्रामीण पर्यटन को गति मिलेगी, सिनेमा, इस तरह, बिहार के पर्यटन का सबसे सशक्त प्रचारक बन सकता है।

अब तक बिहार के युवा सिनेमा को केवल “देखने” का माध्यम मानते थे। फिल्म उद्योग का हिस्सा बनना उनके लिए दूर का सपना था। लेकिन अब यह सपना यहीं, अपने राज्य में आकार ले रहा है। बिहार राज्य फिल्म विकास निगम द्वारा कैमरा ऑपरेशन, साउंड रिकॉर्डिंग, एडिटिंग, स्क्रीनप्ले राइटिंग, डायरेक्शन, प्रोडक्शन मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षण दिया जा रहा है। वर्कशॉप और मास्टर क्लास के ज़रिये युवाओं को व्यावहारिक ज्ञान मिल रहा है। इसका सबसे बड़ा लाभ यह है कि युवाओं को मुंबई या दिल्ली भागने की मजबूरी नहीं है, वे अपने राज्य में रहकर भी सिनेमा से जुड़ सकते हैं, स्थानीय प्रतिभा को स्थानीय मंच मिल रहा है और रोजगार सृजन हो रहा है। यह केवल करियर का सवाल नहीं है, बल्कि आत्मविश्वास की पुनर्स्थापना है कि बिहार का युवा भी वैश्विक सिनेमा का हिस्सा बन सकता है।

सिनेमा किसी भी समाज की आत्मा को अभिव्यक्त करता है। बिहार की कहानियाँ लंबे समय तक हाशिये पर रहीं, या तो उन्हें गलत ढंग से दिखाया गया, या बिल्कुल नहीं दिखाया गया। अब जब बिहार स्वयं अपने दरवाजे खोल रहा है, तो वह अपनी कहानी खुद कहने की स्थिति में है किसानों की जिजीविषा, प्रवासी मजदूरों की पीड़ा, गांवों की संस्कृति, शहरों का संघर्ष, शिक्षा और परिवर्तन की गाथा। यह सांस्कृतिक पुनर्जागरण का माध्यम बन सकता है। बिहार की पहचान अब केवल अतीत से नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य से भी बनेगी।

किसी भी बड़े बदलाव के पीछे एक स्पष्ट दृष्टि और राजनीतिक इच्छाशक्ति होती है। बिहार में सिनेमा को लेकर जो सकारात्मक माहौल बना है, उसके केंद्र में कला, संस्कृति एवं युवा विभाग के मंत्री अरुण शंकर प्रसाद की सक्रिय भूमिका दिखाई देती है। उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार किया है कि बिहार अब “उभरता हुआ फिल्म हब” है और इसे केवल एक नारा नहीं, बल्कि एक नीति-आधारित वास्तविकता बनाना है। उनका निर्देश है कि मार्च-अप्रैल में मुंबई में बड़े फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों के साथ विशेष बैठक आयोजित की जाए, इस बात का संकेत है कि बिहार अब स्वयं पहल करने की भूमिका में आ चुका है। यह बैठक केवल औपचारिक संवाद नहीं होगी, बल्कि बिहार की फिल्म नीति का प्रस्तुतीकरण, शूटिंग सुविधाओं की जानकारी, वित्तीय प्रोत्साहनों का विवरण, संभावित लोकेशनों का प्रदर्शन, स्थानीय टैलेंट और इंफ्रास्ट्रक्चर का परिचय, जैसे विषयों पर ठोस बातचीत का मंच बनेगी। यह एक तरह से बिहार का “रोड शो” होगा, जिसमें राज्य अपने दरवाजे बॉलीवुड और राष्ट्रीय सिनेमा के लिए औपचारिक रूप से खोलेगा।

मुंबई भारतीय सिनेमा का हृदय है। वहाँ जिन लोगों से बिहार संवाद करेगा, वे केवल निर्माता-निर्देशक नहीं होंगे, बल्कि वे ट्रेंड-सेटर हैं जो यह तय करते हैं कि अगली पीढ़ी की फिल्में कहाँ बनेगी, किन कहानियों पर काम होगा और किस भूगोल को पर्दे पर जगह मिलेगी। जब बिहार सीधे इन दिग्गजों से संवाद करेगा, तो वह खुद को “विकल्प” नहीं, बल्कि “अवसर” के रूप में प्रस्तुत करेगा। यह पहल कई स्तरों पर असर डालेगी। बड़े बैनर की फिल्मों का बिहार की ओर रुख, वेब प्लेटफॉर्म्स के लिए ओरिजिनल कंटेंट, अंतरराष्ट्रीय सह-निर्माण की संभावनाएँ और बिहार में स्थायी शूटिंग बेस की स्थापना। यदि यह बैठक सफल रही, तो बिहार केवल शूटिंग लोकेशन नहीं रहेगा, बल्कि क्रिएटिव पार्टनर बन सकता है।

यदि बिहार को सिनेमा हब बनना है, तो उसे अन्य राज्यों के अनुभवों से सीखना होगा। उत्तर प्रदेश ने हाल के वर्षों में आक्रामक फिल्म नीति अपनाई है। लखनऊ और नोएडा में फिल्म सिटी, भारी सब्सिडी और प्रशासनिक सहयोग। परिणामस्वरूप कई बड़ी फिल्मों और वेब सीरीज की शूटिंग वहाँ हुई। दक्षिण भारत (तेलंगाना, तमिलनाडु, केरल) ने मजबूत स्टूडियो सिस्टम, तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान, क्षेत्रीय भाषा सिनेमा का सशक्त बाजार तैयार किया, जिससे वे राष्ट्रीय ही नहीं, वैश्विक स्तर पर पहचान बना सके। बिहार के लिए यह सबक है कि नीति केवल घोषणा न रहे, इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास हो, तकनीकी संस्थान बनें और निजी निवेश को आकर्षित किया जाए, तभी बिहार इस दौड़ में स्थायी रूप से टिक पाएगा।

जब किसी राज्य को “सिनेमा हब” बनाने की बात होती है, तो केवल शूटिंग की अनुमति देना पर्याप्त नहीं होता है। इसके लिए एक संगठित फिल्म इकोसिस्टम चाहिए, जहाँ प्री-प्रोडक्शन से लेकर पोस्ट-प्रोडक्शन तक की सभी सुविधाएँ एक ही परिसर में उपलब्ध हो। बिहार में अब “फिल्म सिटी” की परिकल्पना इसी दिशा में उठाया गया कदम है। यह केवल एक स्टूडियो कॉम्प्लेक्स नहीं होगा, बल्कि शूटिंग फ्लोर, आउटडोर सेट, एडिटिंग और डबिंग स्टूडियो, वीएफएक्स लैब, ट्रेनिंग सेंटर, हॉस्टल और गेस्ट हाउस, ओपन थिएटर और स्क्रीनिंग हॉल जैसी सुविधाओं का समन्वित केंद्र बनेगा। फिल्म सिटी का अर्थ है कि बिहार केवल “लोकेशन” नहीं रहेगा, बल्कि पूर्ण निर्माण केंद्र बन सकेगा। इससे फिल्म निर्माताओं को बाहर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और राज्य में ही पूरी प्रोडक्शन चेन विकसित होगी।

सरकार नीति और आधार तैयार कर सकती है, लेकिन उद्योग का विस्तार निजी क्षेत्र की भागीदारी से ही संभव है। बिहार में अब इक्विपमेंट रेंटल स्टार्टअप, एडिटिंग और डिज़ाइन स्टूडियो, लोकल कास्टिंग एजेंसी, लोकेशन स्काउटिंग फर्म, फिल्म लॉजिस्टिक्स कंपनियाँ जैसे नए उद्यम जन्म ले सकता है। यह वही मॉडल है जिसने हैदराबाद, चेन्नई और कोच्चि को सिनेमा हब बनाया। जब स्थानीय पूंजी और स्थानीय प्रतिभा मिलकर काम करती है, तब एक स्थायी उद्योग जन्म लेता है। बिहार के युवा उद्यमियों के लिए यह क्षेत्र एक नया स्टार्टअप स्पेस बन सकता है, जहाँ तकनीक, कला और व्यापार का संगम होगा।

बिहार का असली सौंदर्य उसके गांवों में बसता है। खेत, नदियाँ, मिट्टी के घर, मेले, लोकगीत। यह सब वह दृश्य-संपदा हैं, जो अब तक सिनेमा में बहुत कम दिखाई दी हैं। ग्रामीण बिहार यथार्थवादी सिनेमा के लिए आदर्श है। सामाजिक फिल्मों का प्राकृतिक मंच है। वेब सीरीज के लिए नई दुनिया खोलता है और अंतरराष्ट्रीय फिल्मकारों के लिए “अनदेखा भारत” प्रस्तुत करता है। यदि पंचायत और जिला स्तर पर शूटिंग को सहयोग देने की व्यवस्था बने, तो गांव स्वयं नेचुरल स्टूडियो बन सकता है। इससे ग्रामीण युवाओं को रोजगार मिलेगा। गांवों की पहचान बनेगी। पलायन कम होगा और स्थानीय संस्कृति संरक्षित होगी। यह विकास का ऐसा मॉडल होगा, जिसमें कैमरा और खेत साथ-साथ आगे बढ़ेंगे।

अब समय आ गया है कि बिहार अपनी कहानियाँ स्वयं कहे, अपने नायकों के माध्यम से। शिक्षक जो गांव में शिक्षा की लौ जलाता है, किसान जो हर आपदा से लड़ता है, प्रवासी मजदूर जो शहर में अपनी पहचान खोजता है, छात्र जो सीमित संसाधनों में बड़ा सपना देखता है और महिला जो परंपरा की दीवार तोड़कर आगे बढ़ती है, यह सभी बिहार के नायक हैं। जब यह कहानियाँ बिहार की धरती पर, बिहार के लोगों के साथ फिल्माई जाएँगी, तब सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक दस्तावेज बन जाएगा।

यदि वर्तमान गति बनी रही, तो 2030 तक बिहार पूर्वी भारत का सबसे बड़ा शूटिंग हब बन सकता है। हर वर्ष दर्जनों फिल्मों और वेब प्रोजेक्ट्स की मेजबानी कर सकता है। हजारों युवाओं को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार दे सकता है। फिल्म टूरिज्म का नया केंद्र बन सकता है और अपनी वैश्विक पहचान सृजित कर सकता है। तब “पटना बनाम मुंबई” की तुलना मजाक नहीं, बल्कि एक नई वास्तविकता होगी, जहाँ पटना विकल्प नहीं, बल्कि समकक्ष मंच के रूप में देखा जाएगा।

बिहार का यह सिनेमा-सफर केवल उद्योग का विस्तार नहीं है, बल्कि आत्मछवि का पुनर्निर्माण है। यह उस राज्य की कहानी है, जो वर्षों तक गलत ढंग से देखा गया, और अब स्वयं को नए फ्रेम में प्रस्तुत कर रहा है। सिनेमा बिहार को नई पहचान देगा, नया आत्मविश्वास देगा, नए अवसर देगा और सबसे बढ़कर, अपनी कहानी खुद कहने का अधिकार देगा।



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