भारत में यूजीसी को लेकर बढ़ता हंगामा: उच्च शिक्षा व्यवस्था की गहराती अव्यवस्था की कहानी

Jitendra Kumar Sinha
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भारत में यूजीसी यानी विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को लेकर जो लगातार अफरा-तफरी, भ्रम और गुस्सा देखने को मिल रहा है, उसकी जड़ें सिर्फ किसी एक नियम या हालिया फैसले में नहीं हैं, बल्कि यह समस्या दशकों से जमा होती चली आई व्यवस्थागत कमजोरियों, आधे-अधूरे सुधारों और ज़मीनी हकीकत से कटे निर्णयों का नतीजा है। यूजीसी का मूल उद्देश्य उच्च शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखना, विश्वविद्यालयों को दिशा देना और छात्रों-शिक्षकों के हितों की रक्षा करना था, लेकिन समय के साथ यह संस्था एक ऐसी नौकरशाही संरचना में बदलती चली गई जो न तो तेजी से बदलती शिक्षा व्यवस्था को समझ पा रही है और न ही ज़मीन पर मौजूद समस्याओं का समाधान कर पा रही है।


सबसे बड़ा कारण है नियमों में लगातार बदलाव और उनका अस्पष्ट संचार। कभी चार साल की डिग्री, कभी एक्ज़िट ऑप्शन, कभी क्रेडिट ट्रांसफर, कभी NET, कभी PhD नियम—हर कुछ महीनों में नया सर्कुलर, नई गाइडलाइन और नई शर्तें सामने आती हैं। छात्र, शिक्षक और विश्वविद्यालय प्रशासन सभी कन्फ्यूज़ रहते हैं कि आखिर फाइनल नियम क्या है और कल फिर क्या बदल जाएगा। एक तरफ सरकार “विश्वस्तरीय शिक्षा” की बात करती है, दूसरी तरफ ग्रामीण और छोटे शहरों के कॉलेज आज भी बुनियादी सुविधाओं, शिक्षकों की कमी और फंड के अभाव से जूझ रहे हैं। नतीजा यह होता है कि काग़ज़ पर बने नियम ज़मीन पर लागू ही नहीं हो पाते।


दूसरा बड़ा कारण है यूजीसी और विश्वविद्यालयों के बीच बढ़ती दूरी। फैसले अक्सर दिल्ली के दफ्तरों में बैठकर ले लिए जाते हैं, बिना यह समझे कि अलग-अलग राज्यों, विश्वविद्यालयों और विषयों की ज़रूरतें अलग होती हैं। एक ही नियम को IIT, केंद्रीय विश्वविद्यालय, राज्य विश्वविद्यालय और छोटे निजी कॉलेज—सब पर थोप दिया जाता है। इससे या तो नियमों का मज़ाक बनता है या फिर वे केवल काग़ज़ी बनकर रह जाते हैं। शिक्षक असमंजस में रहते हैं, छात्रों का भविष्य अधर में लटक जाता है और विश्वविद्यालय बस “कम्प्लायंस” मोड में आ जाते हैं।


तीसरा कारण है परीक्षा और पात्रता से जुड़ा असंतोष। NET, PhD प्रवेश, प्रोफेसर भर्ती—हर स्तर पर अनिश्चितता है। कभी उम्र सीमा बदलती है, कभी सिलेबस, कभी वैलिडिटी। छात्र सालों मेहनत करते हैं और फिर अचानक नियम बदल जाने से खुद को ठगा हुआ महसूस करते हैं। यही गुस्सा सोशल मीडिया से लेकर सड़कों तक दिखता है। लोग इसे सुधार नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में किए जा रहे एक्सपेरिमेंट की तरह देखते हैं, जिसमें प्रयोग तो होते हैं लेकिन ज़िम्मेदारी कोई नहीं लेता।


इसके अलावा राजनीति और शिक्षा का खतरनाक मिश्रण भी इस अराजकता को बढ़ाता है। हर नई सरकार अपनी “नई शिक्षा नीति” और “नया विज़न” लेकर आती है, लेकिन पुरानी समस्याओं का ईमानदार ऑडिट शायद ही कभी होता है। नतीजा यह कि सिस्टम पैचवर्क बन जाता है—ऊपर से चमकदार, अंदर से खोखला। यूजीसी पर यह आरोप भी लगते रहे हैं कि वह शिक्षकों और छात्रों की आवाज़ कम और सत्ता की भाषा ज़्यादा सुनती है, जिससे भरोसा लगातार टूटता जा रहा है।


असल में भारत में यूजीसी को लेकर जो हंगामा है, वह शिक्षा को लेकर हमारे राष्ट्रीय भ्रम का प्रतिबिंब है। हम दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी चाहते हैं, लेकिन शिक्षा को अभी भी खर्च समझते हैं, निवेश नहीं। हम वैश्विक रैंकिंग चाहते हैं, लेकिन ज़मीनी सुधारों के लिए धैर्य नहीं रखते। जब तक यूजीसी सिर्फ नियम बनाने वाली संस्था न रहकर एक सुनने-समझने और ज़मीनी हकीकत से जुड़ी मार्गदर्शक संस्था नहीं बनती, तब तक यह अराजकता कम नहीं होगी। शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए सबसे पहले यह मानना पड़ेगा कि शिक्षा कोई फाइल नहीं, बल्कि पीढ़ियों का भविष्य है—और भविष्य को बार-बार बदलते नोटिसों से नहीं, स्थिर और ईमानदार सोच से संवारा जाता है।

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