भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की पुनर्प्राप्ति की दिशा में एक और बड़ी सफलता हाथ लगी है। अमरीका का प्रतिष्ठित स्मिथसोनियन नेशनल म्यूजियम ऑफ एशियन आर्ट तमिलनाडु के मंदिरों से अवैध रूप से तस्करी कर लाई गई तीन बहुमूल्य प्राचीन कांस्य प्रतिमाएं भारत को लौटाने जा रहा है। यह कदम न केवल ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने की पहल है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को लेकर बढ़ती संवेदनशीलता का भी प्रमाण है।
भारत को लौटाई जाने वाली इन तीनों प्रतिमाओं का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व अत्यंत विशिष्ट है- 10वीं सदी की चोलकालीन ‘शिव नटराज’ – नृत्य की मुद्रा में भगवान शिव की यह प्रतिमा चोल कला की पराकाष्ठा मानी जाती है। 12वीं सदी की ‘सोमास्कंद’ प्रतिमा – जिसमें शिव, पार्वती और बालक स्कंद एक साथ विराजमान हैं। 16वीं सदी की विजयनगर कालीन ‘संत सुंदरर विद परवई’ – यह प्रतिमा तमिल भक्ति परंपरा के महान नयनार संत सुंदरर से जुड़ी हुई है।
जांच में यह स्पष्ट हुआ कि ये प्रतिमाएं तमिलनाडु के प्राचीन मंदिरों से अवैध रूप से निकाली गई थीं और विभिन्न माध्यमों से अंतरराष्ट्रीय कला बाजार में पहुंच गईं। बाद में इन्हें संग्रहालयों में प्रदर्शित किया गया। भारतीय एजेंसियों, इतिहासकारों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए इनके वास्तविक स्रोत की पहचान संभव हो सकी।
हालांकि तीनों प्रतिमाएं भारत की संपत्ति हैं, लेकिन 10वीं सदी की ‘शिव नटराज’ प्रतिमा को भारत की सहमति से दीर्घकालिक ऋण समझौते के तहत फिलहाल स्मिथसोनियन म्यूजियम में ही प्रदर्शित रखा जाएगा। इसका उद्देश्य वैश्विक दर्शकों को भारतीय कला की महान परंपरा से परिचित कराना है, साथ ही भारत का स्वामित्व भी स्पष्ट रूप से मान्य रहेगा।
भारतीय दूतावास और संग्रहालय प्रशासन इस प्रक्रिया की अंतिम औपचारिकताओं में जुटे हैं। यह घटनाक्रम भारत-अमरीका के बीच सांस्कृतिक सहयोग और विश्वास को और मजबूत करता है। हाल के वर्षों में कई देशों द्वारा भारत की चोरी हुई मूर्तियों को लौटाना इसी सकारात्मक बदलाव का संकेत है।
इन प्रतिमाओं की वापसी केवल धातु की मूर्तियों की नहीं, बल्कि भारत की आत्मा, आस्था और इतिहास की वापसी है। यह संदेश भी स्पष्ट है कि सांस्कृतिक धरोहर की चोरी चाहे जितनी पुरानी क्यों न हो, सत्य और न्याय का रास्ता अंततः उसे उसके मूल स्थान तक जरूर पहुंचाता है।
