भारत विविधताओं का देश है। यहाँ भाषाएँ केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि संस्कृति, परंपरा, ज्ञान और पहचान की वाहक हैं। ऐसे में उच्च शिक्षा में भाषाओं को लेकर एक बड़ा और ऐतिहासिक निर्णय सामने आया है। वर्ष 2026 से देश के सभी विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में छात्रों को मातृभाषा के अलावा एक अन्य भारतीय भाषा का अध्ययन करना अनिवार्य होगा।
यह दिशा-निर्देश विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जारी किया गया है और यह नियम स्नातक, परास्नातक (PG) और पीएचडी, तीनों स्तरों पर लागू होगा। यह निर्णय केवल शैक्षणिक सुधार नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक समरसता और ‘विकसित भारत 2047’ के विज़न से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।
यूजीसी ने सभी राज्यों और विश्वविद्यालयों को पत्र जारी कर यह स्पष्ट कर दिया है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 से यह व्यवस्था लागू होगी। इस नीति के अंतर्गत हर छात्र को मातृभाषा के अतिरिक्त कम-से-कम एक अन्य भारतीय भाषा सीखनी होगी। यह अध्ययन अनिवार्य लेकिन लचीला (Flexible) होगा। छात्रों को प्रवेश (Entry) और निकास (Exit) के बहुविकल्पी अवसर मिलेंगे। यह व्यवस्था नये क्रेडिट फ्रेमवर्क के तहत लागू की जाएगी।
यह पूरी पहल राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुरूप है। NEP 2020 के प्रमुख भाषा-संबंधी उद्देश्य बहुभाषिकता को बढ़ावा देना। मातृभाषा में शिक्षा को सशक्त करना। भारतीय भाषाओं को उच्च शिक्षा और शोध से जोड़ना। भाषा को रोजगार और कौशल विकास से जोड़ना। नई नीति NEP 2020 के इन सभी लक्ष्यों को व्यवहारिक रूप देने का प्रयास है।
यह भाषा कार्यक्रम तीनों उच्च शैक्षणिक स्तरों पर लागू होगा: स्नातक (UG) स्तर पर भाषा को एबिलिटी एन्हांसमेंट कोर्स (AEC) के रूप में शामिल किया जा सकता है और यह मेजर या माइनर कोर्स का हिस्सा बन सकता है। परास्नातक (PG) स्तर पर विषयगत अध्ययन के साथ भाषा कौशल का विकास, शोध और अकादमिक लेखन में सहायता। पीएचडी स्तर पर अंतर-राज्यीय शोध में सहूलियत, क्षेत्रीय साहित्य और स्रोतों तक सीधी पहुँच।
यूजीसी ने भाषा शिक्षण को तीन स्पष्ट चरणों में विभाजित किया है। पहला बेसिक (Basic Level), जिसमें दैनिक संवाद, सामान्य शब्दावली और परिचयात्मक व्याकरण। दूसरा इंटरमीडिएट (Intermediate Level) जिसमें अकादमिक लेखन, सांस्कृतिक समझ और सामान्य साहित्य का अध्ययन। तीसरा एडवांस (Advanced Level) जिसमें साहित्यिक और दार्शनिक ग्रंथ, अनुवाद और व्याख्या और शोध एवं आलोचना। छात्र अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार, किसी भी स्तर से शुरुआत कर सकता है।
नई भाषा नीति की एक बड़ी विशेषता है मल्टीपल एंट्री और एग्जिट। छात्र एक सेमेस्टर के बाद कोर्स छोड़ सकता है। तीन सेमेस्टर पूरे करने पर माइनर डिग्री और आवश्यकता अनुसार, दोबारा प्रवेश का विकल्प। यह व्यवस्था वर्किंग प्रोफेशनल्स और ओपन लर्निंग के छात्रों के लिए भी उपयोगी होगी।
यूजीसी ने निर्देश दिया है कि संस्थानों को छात्रों के लिए आठवीं अनुसूची में शामिल 22 भारतीय भाषाओं में से विकल्प देना होगा। इनमें प्रमुख हैं हिन्दी, बंगला, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, उड़िया, असमिया, पंजाबी, उर्दू, संस्कृत, नेपाली, कश्मीरी, मैथिली, संथाली, डोगरी, बोडो, कोंकणी, सिंधी और मणिपुरी। इससे छात्रों को अपने राज्य से बाहर की भाषा सीखने के लिए प्रेरित किया जाएगा।
भाषा केवल शब्दों का ज्ञान नहीं है, बल्कि संस्कृति की आत्मा होती है। इस पहल से राज्यों के बीच सांस्कृतिक दूरी कम होगी। एक-दूसरे की परंपराओं को समझने का अवसर मिलेगा और “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की भावना मजबूत होगी।
डिजिटल शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय स्तर का भाषा शिक्षण एप, ऑनलाइन पोर्टल विकसित किया जाएगा जिससे देश-विदेश से छात्र जुड़ सकेंगे। भाषा विशेषज्ञ मेंटर्स की भूमिका निभाएंगे और लाइव सेशन, रिकॉर्डेड लेक्चर, संवाद अभ्यास चलेगा।
यूजीसी ने यह स्पष्ट किया है कि विश्वविद्यालय स्वयं पाठ्यक्रम डिजाइन कर सकते हैं। स्थानीय आवश्यकता के अनुसार सामग्री तैयार की जा सकती है और क्रेडिट कोर्स, ऑडिट कोर्स या स्किल कोर्स, तीनों विकल्प खुले हैं। इस भाषा कार्यक्रम में 12वीं पास कोई भी व्यक्ति, 16 वर्ष से अधिक आयु का छात्र, नियमित, ओपन या डिस्टेंस मोड, सभी पात्र होंगे।
आज के समय में बहुभाषी व्यक्ति को अधिक अवसर, पर्यटन, मीडिया, प्रशासन, अनुवाद, शिक्षण में मांग, स्टार्टअप और अंतर-राज्यीय व्यापार में लाभ, यह नीति भाषा को रोजगारपरक कौशल के रूप में स्थापित करती है। यह पहल ऐतिहासिक है, लेकिन कुछ चुनौतियाँ भी सामने आएंगी। योग्य भाषा शिक्षकों की उपलब्धता। छोटे कॉलेजों में संसाधनों की कमी और छात्रों पर अतिरिक्त अकादमिक दबाव। समाधान के तौर पर ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का अधिक उपयोग, साझा फैकल्टी मॉडल और भाषा को रोचक एवं व्यावहारिक बनाना।
कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में मातृभाषा के साथ एक अन्य भारतीय भाषा का अध्ययन अनिवार्य करना केवल शैक्षणिक सुधार नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में बड़ा कदम है। यह नीति भारत की भाषाई विरासत को सशक्त करेगी। युवाओं को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध बनाएगी और विकसित भारत 2047 के सपने को मजबूत आधार देगी। भाषा जब शिक्षा से जुड़ती है, तो वह केवल शब्द नहीं सिखाती है बल्कि वह संवेदना, समझ और समरसता का निर्माण करती है। यही इस नई नीति की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
