नासा के ‘जूनो’ मिशन से बदली सौर मंडल की सबसे बड़ी ग्रह की परिभाषा - गोल नहीं, थोड़ा छोटा और चपटा है - “बृहस्पति ग्रह”

Jitendra Kumar Sinha
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सौर मंडल का सबसे विशाल ग्रह बृहस्पति (Jupiter) हमेशा से खगोल विज्ञान में शक्ति, आकार और रहस्य का प्रतीक रहा है। दशकों तक वैज्ञानिक पुस्तकों और शैक्षणिक सामग्री में इसे लगभग पूर्ण गोलाकार ग्रह के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है। लेकिन अब नासा के अंतरिक्ष यान ‘जूनो’ से प्राप्त नवीनतम आंकड़ों ने इस धारणा को बदल दिया है। वैज्ञानिकों के अनुसार बृहस्पति न केवल पहले की तुलना में थोड़ा छोटा है, बल्कि वह ध्रुवों से अधिक चपटा भी है।


नासा का ‘जूनो’ अंतरिक्ष यान वर्ष 2016 में बृहस्पति की कक्षा में पहुंचा था। इसका मुख्य उद्देश्य बृहस्पति की आंतरिक संरचना, गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र, चुंबकीय क्षेत्र और वायुमंडल का गहराई से अध्ययन करना है। पिछले कई वर्षों में जूनो ने ग्रह के बेहद करीब से उड़ान भरते हुए ऐसे आंकड़े जुटाए हैं, जिनकी सटीकता पहले संभव नहीं थी। इन्हीं आंकड़ों के विश्लेषण से वैज्ञानिकों को बृहस्पति के वास्तविक आकार और संरचना को नए सिरे से समझने का अवसर मिला है।


अब तक बृहस्पति के आकार का अनुमान मुख्य रूप से रेडियो माप, दूरबीनों और पुराने अंतरिक्ष अभियानों पर आधारित था। इन तरीकों में कुछ सीमाएं थीं, खासकर ग्रह के ध्रुवीय क्षेत्रों को लेकर। ‘जूनो’ ने बृहस्पति के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र को अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर मापा है। इससे यह स्पष्ट हुआ है कि बृहस्पति का त्रिज्या (रेडियस) पहले माने गए आंकड़ों से कुछ कम है और उसका ध्रुवीय क्षेत्र अपेक्षा से अधिक दबा हुआ है।


बृहस्पति के चपटे होने का सबसे बड़ा कारण उसकी अत्यधिक तीव्र घूर्णन गति है। यह ग्रह लगभग 10 घंटे में एक पूरा चक्कर पूरा कर लेता है, जो किसी भी ग्रह के लिए बेहद तेज है। इस तेज घूर्णन के कारण भूमध्य रेखा (equator) पर पदार्थ बाहर की ओर उभर जाता है और ध्रुवों पर ग्रह दब जाता है। यह प्रभाव पहले से ज्ञात था, लेकिन जूनो के आंकड़ों से पता चला है कि यह चपटा पन पहले अनुमान से अधिक है।


वैज्ञानिकों के अनुसार, बृहस्पति का कुल व्यास भले ही बहुत अधिक न बदला हो, लेकिन उसका आंतरिक द्रव्यमान वितरण पहले की तुलना में अलग है। इसका अर्थ यह है कि ग्रह के भीतर गैस, द्रव और संभावित ठोस कोर की संरचना को लेकर पुराने मॉडल अधूरे थे। अब वैज्ञानिकों को बृहस्पति के कोर, गुरुत्वीय परतों और वायुमंडलीय दबाव को लेकर नई गणनाएँ करनी होगी।


बृहस्पति को सौर मंडल का “रक्षक ग्रह” भी कहा जाता है, क्योंकि उसका विशाल गुरुत्वाकर्षण कई क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं को पृथ्वी तक पहुंचने से पहले ही अपनी ओर खींच लेता है। यदि बृहस्पति के आकार और आंतरिक संरचना की समझ बदलती है, तो इसका असर ग्रहों के निर्माण के सिद्धांत, सौर मंडल के प्रारंभिक इतिहास और गैस दानव ग्रहों की उत्पत्ति पर भी पड़ेगा।


यह खोज इस बात का प्रमाण है कि विज्ञान स्थिर नहीं होता है। नई तकनीक और नए मिशन पुराने तथ्यों को चुनौती देते रहते हैं। 50 वर्षों से पढ़ाया जा रहा बृहस्पति का स्वरूप गलत नहीं था, बल्कि उपलब्ध जानकारी की सीमा तक सही था। जूनो मिशन ने उस सीमा को आगे बढ़ा दिया है।


बृहस्पति अब भी सौर मंडल का सबसे विशाल ग्रह है, लेकिन अब जानते हैं कि वह उतना “पूर्ण गोल” नहीं है जितना सोचते थे। नासा के ‘जूनो’ मिशन ने न केवल बृहस्पति की तस्वीर बदली है, बल्कि यह भी दिखाया है कि ब्रह्मांड को समझने की यात्रा अभी खत्म नहीं हुई है। आने वाले वर्षों में जूनो और अन्य मिशनों से मिलने वाली जानकारियाँ शायद और भी चौंकाने वाले तथ्य बताएं।



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