सत्ता के गलियारों से सेवा तीर्थ - “कर्तव्य भवन”

Jitendra Kumar Sinha
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इतिहास को देखना केवल घटनाओं का साक्षात्कार करना नहीं होता है, बल्कि उन कृतियों, निर्णयों और संकल्पों को समझना होता है जो राष्ट्र की आत्मा को आकार देता है। कुछ स्थान केवल इमारतें नहीं होते हैं बल्कि वे समय की धड़कन होते हैं। वे गवाह होते हैं उन क्षणों के जब वर्तमान कांपता है, भविष्य मुस्कुराता है और पीढ़ियाँ मौन खड़ी होकर परिवर्तन का साक्षात्कार करती हैं। भारत के राजनीतिक इतिहास में एक ऐसा ही स्थान रहा है, प्रधानमंत्री का कार्यालय, जिसे पीएमओ के नाम से जानते हैं। यह केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं है, बल्कि राष्ट्र की दिशा तय करने वाला केंद्र रहा है। आज जब सत्ता का यह सर्वोच्च कार्यालय साउथ ब्लॉक से आगे बढ़कर नए युग की ओर अग्रसर हो रहा है, तब यह केवल भवन परिवर्तन नहीं है, बल्कि प्रतीकात्मक रूप से सत्ता से सेवा की ओर, परंपरा से नवाचार की ओर, और इतिहास से भविष्य की ओर जाता है।

नई दिल्ली के रायसीना हिल पर स्थित साउथ ब्लॉक दशकों तक भारत की राजनीतिक चेतना का केंद्र रहा है। ब्रिटिश वास्तुकार एडविन लुटियंस की परिकल्पना में बना यह भवन औपनिवेशिक शासन का प्रतीक था, लेकिन स्वतंत्रता के बाद यह भारतीय संप्रभुता का केंद्र बन गया। यहीं से स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्रियों ने देश की दिशा निर्धारित की। यहीं से युद्ध और शांति के निर्णय हुए, आर्थिक नीतियों की नींव रखी गई, सामाजिक सुधारों की घोषणाएँ हुईं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज को स्वर मिला।

साउथ ब्लॉक की दीवारें उन ऐतिहासिक क्षणों की साक्षी हैं। 1962, 1965 और 1971 के युद्धकालीन निर्णय। हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की योजनाएँ। 1991 के आर्थिक उदारीकरण का ऐतिहासिक मोड़। परमाणु परीक्षणों का साहसिक संकल्प। डिजिटलीकरण और आत्मनिर्भरता की नई पहल। यह भवन केवल फाइलों का संग्रहालय नहीं था, यह भविष्य की रूपरेखा तैयार करने वाली प्रयोगशाला था।




प्रधानमंत्री कार्यालय का कार्य केवल प्रशासनिक समन्वय नहीं है। यह वह स्थान है जहाँ राष्ट्रीय सुरक्षा की रणनीति बनती है। आर्थिक नीति की दिशा तय होती है। सामाजिक न्याय के कार्यक्रमों की रूपरेखा बनती है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों की कूटनीति आकार लेती है। यहाँ होने वाला हर हस्ताक्षर केवल एक सरकारी आदेश नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करने वाला निर्णय होता है। भारत के हर प्रधानमंत्री ने अपने समय की चुनौतियों के अनुसार, यहाँ से राष्ट्र को नई दिशा दी। कभी आत्मनिर्भरता का संकल्प, कभी वैश्वीकरण का मार्ग, कभी डिजिटल क्रांति का विस्तार, इन सबका केंद्र यही कार्यालय रहा है।

समय स्थिर नहीं रहता है। जैसे राष्ट्र बदलता है, वैसे ही उसकी प्रशासनिक संरचनाएँ भी बदलती हैं। 21वीं सदी का भारत 20वीं सदी के भारत से अलग है। जनसंख्या, तकनीक, वैश्विक संबंध और सुरक्षा चुनौतियाँ, सब कुछ बदल चुका है। ऐसे में यह स्वाभाविक था कि सत्ता का केंद्र भी आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित हो। इसी परिवर्तन की कड़ी में नए प्रशासनिक परिसर का निर्माण हुआ, जिसमें प्रधानमंत्री कार्यालय अब कर्तव्य भवन से संचालित हो रहा है।

कर्तव्य, यह शब्द भारतीय संस्कृति में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह अधिकार से पहले दायित्व की बात करता है। कर्तव्य भवन केवल एक नया कार्यालय नहीं है, बल्कि एक विचार है। यह उस मानसिकता का प्रतीक है जिसमें सत्ता सेवा का माध्यम है, पद जिम्मेदारी है और प्रशासन राष्ट्र-निर्माण का साधन। यह भवन आधुनिक तकनीक, सुरक्षा व्यवस्था और पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप तैयार किया गया है। डिजिटल युग की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए यहाँ अत्याधुनिक संचार प्रणाली, डेटा सुरक्षा और समन्वय तंत्र स्थापित किए गए हैं। इस परिवर्तन के पीछे केवल भौतिक विस्तार नहीं है, बल्कि कार्यकुशलता और पारदर्शिता का लक्ष्य है।

यह परिवर्तन व्यापक पुनर्रचना योजना का हिस्सा है, जिसे सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास परियोजना के अंतर्गत विकसित किया गया है। इस परियोजना का उद्देश्य था प्रशासनिक कार्यालयों का केंद्रीकरण। आधुनिक कार्यक्षमता का विकास। सुरक्षा और संरचनात्मक मजबूती। भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप स्थान का विस्तार। इस योजना के तहत संसद भवन, मंत्रालयों और अन्य सरकारी कार्यालयों को आधुनिक रूप दिया गया है।

साउथ ब्लॉक औपनिवेशिक वास्तुकला का प्रतिनिधित्व करता था, जबकि कर्तव्य भवन आत्मनिर्भर और आधुनिक भारत का प्रतीक है। यह परिवर्तन केवल भवन का नहीं है, बल्कि मानसिकता का भी है। पहले सत्ता केंद्रित व्यवस्था थी, अब सेवा उन्मुख प्रशासन का लक्ष्य है। पहले फाइलों का ढेर था, अब डिजिटल शासन की ओर कदम है। पहले सीमित संसाधन था, अब वैश्विक स्तर की आकांक्षाएँ हैं। यह उस भारत का संकेत है जो अपने अतीत का सम्मान करते हुए भविष्य की ओर बढ़ रहा है।

यह नहीं कहा जा सकता है कि साउथ ब्लॉक का इतिहास समाप्त हो गया है। इतिहास कभी समाप्त नहीं होता है, वह केवल रूप बदलता है। साउथ ब्लॉक भारत की स्मृति का हिस्सा रहेगा। वहाँ लिए गए निर्णय राष्ट्र की आत्मा में अंकित हैं। कर्तव्य भवन उस परंपरा को आगे बढ़ाएगा। वह नई नीतियों, नए विचारों और नए संकल्पों का केंद्र बनेगा।

प्रधानमंत्री कार्यालय का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि वह सर्वोच्च कार्यकारी पद का कार्यालय है, बल्कि इसलिए भी है कि वह जनता के विश्वास का केंद्र है। लोकतंत्र में सत्ता का अर्थ है जनता की सेवा। कर्तव्य भवन से संचालित प्रशासन यदि पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और संवेदनशीलता के साथ कार्य करता है, तो यह परिवर्तन सार्थक होगा।

जब इतिहास बनते देखते हैं, तो भावनाएँ स्वाभाविक रूप से जुड़ जाती हैं। साउथ ब्लॉक की सीढ़ियाँ, उसके गलियारे, उसकी खिड़कियों से दिखाई देने वाला राजपथ, ये सब स्मृतियों का हिस्सा हैं। लेकिन राष्ट्र केवल स्मृतियों में नहीं जी सकता है। उसे आगे बढ़ना होता है। कर्तव्य भवन उसी आगे बढ़ने का प्रतीक है।

इतिहास बनते देखना केवल दृश्य नहीं है, बल्कि कृतियों से साक्षात्कार करना है। आज जब प्रधानमंत्री कार्यालय कर्तव्य भवन से संचालित हो रहा है, तब यह केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि एक युग परिवर्तन है। यह उस भारत का प्रतीक है जो अपने अतीत का सम्मान करता है। वर्तमान की चुनौतियों को स्वीकार करता है और भविष्य की संभावनाओं को गले लगाता है। साउथ ब्लॉक की दीवारें इतिहास की गाथा कहती रहेगी। कर्तव्य भवन नई कहानियाँ लिखेगा। और मौन साक्षी बन, इस परिवर्तन को देखेंगे, समझेंगे और आने वाली पीढ़ियों को बताएँगे कि कैसे एक राष्ट्र ने अपनी सत्ता को सेवा का स्वरूप दिया।



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