60 से अधिक देशों के साथ भारत ने गठन किया “संसदीय मैत्री समूह”

Jitendra Kumar Sinha
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भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी कूटनीतिक और संसदीय सक्रियता को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। दुनिया के 60 से अधिक देशों के साथ “संसदीय मैत्री समूहों” (Parliamentary Friendship Groups) का गठन किया गया है। यह पहल न केवल सरकार-से-सरकार (G2G) संवाद को मजबूती देती है, बल्कि संसद-से-संसद (P2P) स्तर पर भरोसे, सहयोग और आपसी समझ को भी गहरा करती है।

संसदीय मैत्री समूह विभिन्न देशों की संसदों के सदस्यों के बीच संवाद और सहयोग का मंच होते हैं। इन समूहों के माध्यम से विधायी अनुभवों का आदान-प्रदान, लोकतांत्रिक संस्थाओं को सशक्त करना, व्यापार, तकनीक, शिक्षा और संस्कृति में सहयोग, वैश्विक मुद्दों पर समन्वय जैसे उद्देश्य पूरे किए जाते हैं। यह “सॉफ्ट पावर” कूटनीति का प्रभावी उपकरण माना जाता है।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के नेतृत्व में गठित इन समूहों को भारत की संसदीय परंपरा और लोकतांत्रिक मूल्यों के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने जानकारी दी है कि इस पहल का प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हालिया रणनीतिक सफलता के बाद रखा था। सरकार का मानना है कि यह कदम भारत की वैश्विक साख और संवाद क्षमता को और मजबूत करेगा।

हालिया सुरक्षा-सफलताओं के बाद भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह स्पष्ट संदेश दिया है कि वह जिम्मेदार, सक्षम और संवाद-उन्मुख लोकतंत्र है। संसदीय मैत्री समूहों के जरिए भारत अपने दृष्टिकोण, चिंताओं और प्राथमिकताओं को सीधे विदेशी सांसदों तक पहुंचा सकेगा, जिससे गलतफहमियों की गुंजाइश कम होगी और सहयोग के नए रास्ते खुलेंगे।

इन समूहों से बहुआयामी लाभ की अपेक्षा की जा रही है। कूटनीतिक समन्वय- वैश्विक मंचों पर भारत के रुख को समर्थन। आर्थिक सहयोग- व्यापार, निवेश और स्टार्टअप इकोसिस्टम में साझेदारी। तकनीक और नवाचार- डिजिटल गवर्नेंस, एआई और साइबर सुरक्षा पर संवाद। शिक्षा और संस्कृति- शैक्षणिक आदान-प्रदान और सांस्कृतिक कूटनीति और संसदीय क्षमता निर्माण- विधायी प्रक्रियाओं और सर्वोत्तम प्रथाओं का साझा अनुभव।

भारत पहले से ही अंतर-संसदीय संघ (IPU) जैसे मंचों पर सक्रिय रहा है। नए मैत्री समूह इस परंपरा का विस्तार हैं, जहां द्विपक्षीय और क्षेत्रीय स्तर पर अधिक लक्षित संवाद संभव होगा। इससे भारत की “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना को ठोस संस्थागत रूप मिलता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह पहल दलगत राजनीति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देती है। विशेषज्ञों के अनुसार, जब सांसद सीधे विदेशी समकक्षों से संवाद करते हैं, तो नीतिगत समझ बढ़ती है और संकट के समय अनौपचारिक चैनल भी प्रभावी साबित होते हैं।

इस पहल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि समूह कितने नियमित और उद्देश्यपूर्ण ढंग से सक्रिय रहता है,  संवाद को ठोस नीतिगत परिणामों में कैसे बदला जाता है और विभिन्न दलों के सांसदों की समावेशी भागीदारी कैसे सुनिश्चित होती है। यदि इन बिंदुओं पर ध्यान दिया गया, तो यह पहल भारत की वैश्विक भूमिका को दीर्घकालिक मजबूती दे सकती है।

60 से अधिक देशों के साथ संसदीय मैत्री समूहों का गठन भारत की सक्रिय और बहुस्तरीय कूटनीति का स्पष्ट संकेत है। यह कदम न केवल वैश्विक सहयोग को बढ़ाएगा, बल्कि भारत की लोकतांत्रिक आवाज को दुनिया भर में और प्रभावशाली बनाएगा। आने वाले समय में यह पहल भारत के रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हितों को नई गति देने में निर्णायक साबित हो सकती है।



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