शब्द, समय और संदर्भ जब राजनीति का बोझ बन जाए

Jitendra Kumar Sinha
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राजनीति में पराजय को प्रायः सत्ता के खोने से जोड़कर देखा जाता है। चुनाव हारना, बहुमत न मिलना या संसद में अल्पमत में रह जाना, इन्हीं को पराजय का पर्याय मान लिया जाता है। लेकिन यह दृष्टि अधूरी है। वास्तविकता सत्ता का नहीं, चेतना का होता है। जब कोई व्यक्ति, दल या विचारधारा अपने ही कथनों, आचरण और अहंकार के जाल में उलझकर सत्य से दूर होती चली जाती है, तब उसकी पराजय प्रारंभ हो जाती है। चाहे वह औपचारिक रूप से सत्ता में हो या न हो। किसी भी व्यक्ति या समूह के पतन का मूल कारण बाहरी शक्तियाँ नहीं होतीं है, बल्कि उसका अहम होता है। वही अहंकार जो स्वयं को अचूक मानने लगता है, जो आत्ममंथन को कमजोरी और विनम्रता को अपमान समझता है। राजनीति में यह अहंकार और भी घातक हो जाता है, क्योंकि यहाँ शब्द केवल निजी अभिव्यक्ति नहीं होता है, वह सार्वजनिक चेतना को प्रभावित करता है।

जब अहंकार सत्य से दूरी बना लेता है, तब व्यक्ति शब्दों के चयन में असावधान हो जाता है। वह न तो समय देखता है, न स्थान और न ही परिस्थिति। परिणामस्वरूप, उसके कथन स्वयं उसके व्यक्तित्व को अनृतवादी अर्थात असत्य का वाहक बना देता है। यह प्रक्रिया अक्सर अनजाने में होती है, लेकिन इसका प्रभाव स्थायी होता है। जनता स्मृति रखती है और लोकतंत्र में स्मृति ही निर्णय का आधार बनती है। अहम और सत्य का संबंध हमेशा से संघर्षपूर्ण रहा है। अहंकार को सत्य असुविधाजनक लगता है, क्योंकि सत्य प्रश्न पूछता है, सीमाएँ तय करता है और आत्मनिरीक्षण की माँग करता है। इसके विपरीत अहंकार चाहता है कि प्रश्न केवल दूसरों से पूछे जाएँ, स्वयं से नहीं।

राजनीति में जब कोई नेता या दल यह मान लेता है कि वह ही सत्य का एकमात्र स्रोत है, तब वही क्षण उसके पतन का बीज बो देता है। सत्य बहुविध होता है, संदर्भ-सापेक्ष होता है और विवेक की माँग करता है। लेकिन अहंकार सरल समाधान चाहता है या तो मैं सही हूँ या शेष सब गलत। यहीं से अनृत की यात्रा शुरू होती है। अनृत केवल झूठ बोलना नहीं है, बल्कि अनृत वह स्थिति है जहाँ आधा सत्य, संदर्भविहीन तथ्य और भावनात्मक अतिरंजना को पूर्ण सत्य की तरह प्रस्तुत किया जाता है। यह राजनीति में सबसे सुविधाजनक हथियार है, क्योंकि यह तात्कालिक तालियाँ तो दिला सकता है, पर दीर्घकाल में विश्वास नष्ट कर देता है।

भारतीय परंपरा में वाणी को तपस्या के समकक्ष माना गया है। “वाक्-संयम” केवल नैतिक उपदेश नहीं है, बल्कि सामाजिक संतुलन का आधार है। राजनीति में यह और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ बोला गया हर शब्द रिकॉर्ड बन जाता है इतिहास का, मीडिया का और जनता की स्मृति का। जब कोई नेता समय, स्थान और परिस्थिति को नजरअंदाज कर बोलता है, तो वह केवल अपना विचार नहीं रखता है, बल्कि अपने पूरे व्यक्तित्व को दांव पर लगा देता है। संसद में बोला गया वाक्य, विदेश में दिया गया वक्तव्य या संकट के समय की गई टिप्पणी, सबका अर्थ और प्रभाव अलग-अलग होता है। अहंकार इस सूक्ष्मता को नष्ट कर देता है। तब शब्द विचार से नहीं, प्रतिक्रिया से निकलते हैं। ऐसे में व्यक्ति स्वयं यह नहीं समझ पाता है कि वह तर्क दे रहा है या स्वयं का उपहास करवा रहा है। राजनीति में यही वह क्षण होता है जब नेता जनता की नजरों में गंभीरता से हास्यास्पद बनना शुरू कर देता है।

हर व्यक्ति के पास तर्क होते हैं, हर राजनीतिक दल के पास अपना नैरेटिव होता है। यह स्वाभाविक है। समस्या तब शुरू होती है जब स्वयं को सिद्ध करने की बेताबी इतनी तीव्र हो जाती है कि विवेक पीछे छूट जाता है। राजनीति में बार-बार यह देखा गया है कि नेता अपने तर्क को अंतिम सत्य सिद्ध करने के प्रयास में अपने ही व्यक्तित्व को शूली पर चढ़ा देते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि जनता अदालत नहीं है जहाँ हर बार फैसला तुरंत सुनाया जाएगा। जनता देखती है, सुनती है, तुलना करती है और फिर चुपचाप निर्णय लेती है। जब कोई नेता हर मुद्दे पर प्रतिक्रिया देने को मजबूर महसूस करता है, जब मौन उसे हार और संयम उसे कमजोरी लगने लगता है, तब उसकी राजनीतिक यात्रा ढलान पर आ जाती है। यह वह स्थिति है जहाँ अहंकार नेतृत्व को निगल जाता है।

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। स्वस्थ आलोचना सत्ता को संतुलित रखती है। लेकिन जब आलोचना आत्मालोचना में बदलने से इनकार कर देती है, तब वही विपक्ष धीरे-धीरे अप्रासंगिक होने लगता है। जो दल या नेता अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर पाते, वे हर हार के बाद किसी बाहरी कारक को दोष देते हैं। कभी संस्थाओं को, कभी मीडिया को, कभी जनता को। लेकिन कभी स्वयं को नहीं। यही मानसिकता पराजय को स्थायी बना देती है। राजनीति में जनता सबसे अधिक उसी से जुड़ती है जो अपनी सीमाओं को पहचानता है। अहंकार यह स्वीकार करने से रोकता है और यहीं से पतन की प्रक्रिया अपरिवर्तनीय हो जाती है। यह स्पष्ट है कि किसी भी राजनीतिक पराजय की शुरुआत चुनाव परिणाम से नहीं होती है। वह बहुत पहले शुरू हो जाती है विचारों में, शब्दों में और दृष्टिकोण में। अहंकार सत्य से दूरी बनाता है और यही दूरी नेता को जनता से काट देती है। जो व्यक्ति या दल यह नहीं समझ पाता है कि राजनीति केवल विरोध नहीं है, बल्कि उत्तरदायित्व है, वह धीरे-धीरे स्वयं को ही हास्य और अविश्वास के घेरे में धकेल देता है।

राजनीति में शब्द साधारण नहीं होता है। वह केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि उत्तरदायित्व का सार्वजनिक दस्तावेज होता है। एक कवि कविता में अतिशयोक्ति कर सकता है, एक लेखक कल्पना की उड़ान भर सकता है, लेकिन एक नेता का प्रत्येक शब्द वास्तविकता से बंधा होता है, क्योंकि वह राष्ट्र की चेतना को प्रभावित करता है। यही कारण है कि राजनीति में कही गई बात वर्षों तक पीछा करती है। समय बदल जाता है, सरकारें बदल जाती हैं, लेकिन शब्द रिकॉर्ड में रह जाता हैं। वीडियो क्लिप, संसद की कार्यवाही, न्यायालयों की टिप्पणियाँ और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दिए गए वक्तव्य। यह सब लोकतंत्र की स्मृति बन जाता है। जो नेता यह मान लेता है कि “आज की बात कल भूल जाएगी”, वह लोकतंत्र की प्रकृति को नहीं समझता है। जनता भूलती नहीं है, वह केवल निर्णय लेने तक प्रतीक्षा करती है।

भारतीय दर्शन में कर्म का मूल्यांकन देश, काल और परिस्थिति के आधार पर किया जाता है। राजनीति में भी यही नियम लागू होता है। एक ही वाक्य सही समय पर कहा जाए तो राष्ट्रहित बन जाता है, और गलत समय पर कहा जाए तो राजनीतिक आत्मघात। उदाहरण के लिए युद्धकाल में कही गई असावधान टिप्पणी सैनिकों के मनोबल को प्रभावित कर सकती है। न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दिया गया बयान अदालत की अवमानना बन सकता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर कही गई घरेलू राजनीति की बात राष्ट्र की छवि को क्षति पहुँचा सकती है। लेकिन अहंकार इन सूक्ष्म सीमाओं को नहीं मानता। वह मान लेता है कि हर मंच उसका निजी मंच है और हर समय उसका पक्ष रखने के लिए उपयुक्त है। यही भ्रम धीरे-धीरे नेता को गंभीरता से बाहर कर देता है।

आधुनिक राजनीति का सबसे बड़ा रोग है “तत्काल प्रतिक्रिया”। सोशल मीडिया, 24×7 न्यूज चैनल और ट्रेंडिंग हैशटैग ने राजनीति को विचारशीलता से हटाकर प्रतिक्रियात्मक बना दिया है। आज नेता यह नहीं पूछता है कि क्या बोलना चाहिए? बल्कि यह पूछता है कि अभी क्या बोलूँ ताकि खबर बन जाए? यहीं से वाणी का पतन शुरू होता है। प्रतिक्रिया में दिया गया वक्तव्य प्रायः अधूरा होता है, तथ्यहीन होता है या संदर्भ से कटा होता है। बाद में सफाई दी जाती है, लेकिन तब तक नुकसान हो चुका होता है। राजनीति में पहली बात ही सबसे अधिक मायने रखती है। सफाई हमेशा कमजोरी मानी जाती है। चाहे वह कितनी ही तार्किक क्यों न हो। ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ नेताओं के अपने ही शब्द उनके लिए सबसे बड़े शत्रु बन गए। वे अपने पुराने बयानों से घिर जाते हैं, और तब या तो चुप्पी साधते हैं या फिर और अधिक उलझ जाते हैं। यह स्थिति तब उत्पन्न होती है जब नेता तथ्यों से अधिक भावनाओं पर निर्भर करता है। इतिहास को वर्तमान की राजनीति में खींच लाता है या जटिल विषयों को सरलीकरण के नाम पर विकृत कर देता है। ऐसे में जनता यह नहीं देखती कि नेता क्या कहना चाहता था, बल्कि यह देखती है कि उसने क्या कह दिया। राजनीति में “भावना” क्षणिक समर्थन दिला सकती है, लेकिन “तथ्य” ही स्थायी विश्वास पैदा करता है।

राजनीति में स्मृति भी एक हथियार होती है। लेकिन यह हथियार तभी विश्वसनीय होता है जब उसका प्रयोग ईमानदारी से किया जाए। जब नेता इतिहास के कुछ हिस्से याद रखता है और कुछ को जानबूझकर भूल जाता है, तब उसकी नीयत पर प्रश्न उठता है। चयनात्मक स्मृति (Selective Memory) राजनीति में सबसे खतरनाक प्रवृत्ति है। यह जनता को यह संकेत देती है कि नेता सत्य की नहीं, अपने नैरेटिव की रक्षा कर रहा है। यही वह बिंदु है जहाँ राजनीति सत्य बनाम सुविधा की लड़ाई बन जाती है। और इतिहास गवाह है कि इस लड़ाई में सुविधा कभी नहीं जीतती।

लोकतंत्र केवल संविधान से नहीं चलता है, वह एक मौन नैतिक अनुबंध से चलता है, नेता और जनता के बीच। जनता यह अपेक्षा करती है कि जो बोलेगा, वह सोच-समझकर बोलेगा; जो आलोचना करेगा, वह जिम्मेदारी के साथ करेगा। जब यह अनुबंध टूटता है, तब जनता तत्काल प्रतिक्रिया नहीं देती है। वह नारे नहीं लगाती है, न ही बयान जारी करती है। वह केवल दूरी बना लेती है। और राजनीति में दूरी सबसे बड़ा दंड है। नेता को लगता है कि वह अब भी चर्चा में है, कैमरों में है, सोशल मीडिया पर है, लेकिन जनता मन ही मन उससे आगे बढ़ चुकी होती है। राजनीति में शब्द तब तक शक्ति होता है, जब तक वह विवेक से संचालित हों। जैसे ही वह अहंकार, आवेग और आत्मसंतोष के अधीन होता है, वह बोझ बन जाता है, नेता के लिए भी और दल के लिए भी। जो नेतृत्व यह नहीं समझ पाता है कि हर शब्द उसका मूल्यांकन करता है, वह स्वयं अपने पतन की पटकथा लिख देता है।

राजनीति में तर्क एक आवश्यक उपकरण है। लेकिन जब तर्क सत्य का स्थान ले लेता है, तब वह उपकरण नहीं, आवरण बन जाता है। तर्क का उद्देश्य सत्य को स्पष्ट करना होना चाहिए, न कि उसे ढकना। दुर्भाग्यवश, आधुनिक विपक्षी राजनीति में तर्क का प्रयोग सत्य को उजागर करने के लिए नहीं, बल्कि पहले से तय निष्कर्ष को सही ठहराने के लिए किया जाने लगा है। यहीं से राजनीति का बौद्धिक पतन शुरू होता है। नेता तर्क देता है, उदाहरण देता है, उपमाएँ गढ़ता है, लेकिन यह सब सत्य की खोज के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को सही साबित करने के लिए होता है। जनता इस अंतर को बहुत जल्दी समझ लेती है। वह तर्क से प्रभावित हो सकती है, लेकिन अंततः वह सत्य के साथ खड़ी होती है। सत्य का स्वभाव स्थिर होता है, जबकि तर्क परिस्थिति के अनुसार बदला जा सकता है। यही कारण है कि तर्क आधारित राजनीति क्षणिक होती है, और सत्य आधारित राजनीति दीर्घकालिक।

नेतृत्व का अर्थ यह नहीं कि हर प्रश्न का उत्तर तुरंत दिया जाए। नेतृत्व का अर्थ यह है कि कब उत्तर देना है और कब मौन रखना है, इसका विवेक हो। लेकिन जब कोई नेता स्वयं को हर समय, हर मंच पर, हर मुद्दे पर सिद्ध करने की हड़बड़ी में रहता है, तब वह अनजाने में अपने ही नेतृत्व को कमज़ोर कर देता है। यह हड़बड़ी अक्सर अहंकार से जन्म लेती है। नेता यह मान लेता है कि यदि वह चुप रहा, तो उसे पराजित मान लिया जाएगा। जबकि वास्तविकता यह है कि कई बार मौन ही सबसे सशक्त उत्तर होता है। राजनीति में अनेक उदाहरण हैं जहाँ नेताओं ने अनावश्यक स्पष्टीकरण देकर, बार-बार प्रतिक्रिया देकर और हर आलोचना को व्यक्तिगत चुनौती मानकर स्वयं को हास्यास्पद बना लिया। जनता ऐसे नेताओं को गंभीरता से लेना बंद कर देती है।

यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि समस्या किसी एक व्यक्ति की नहीं है। राहुल गांधी का संदर्भ एक प्रतीकात्मक उदाहरण है कि एक व्यापक राजनीतिक प्रवृत्ति का, जो विपक्ष की राजनीति में गहराई से पैठ बना चुकी है। यह प्रवृत्ति है जटिल राष्ट्रीय सुरक्षा मुद्दों का सरलीकरण। ऐतिहासिक और सामरिक संदर्भों को मिलाकर प्रस्तुत करना और हर विषय को सरकार-विरोध के चश्मे से देखना। जब नेता इस प्रवृत्ति का शिकार होता है, तब वह अनजाने में राष्ट्रहित और दलगत राजनीति के बीच की रेखा मिटा देता है।

डोकलाम और गलवान, यह दोनों घटनाएँ भारत–चीन संबंधों में महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उनका भू-राजनीतिक, सामरिक और कूटनीतिक संदर्भ पूरी तरह अलग है। डोकलाम (2017) त्रिजंक्शन क्षेत्र है। भूटान की सुरक्षा से जुड़ा मामला है। बिना गोली चले तनाव का समाधान है। कूटनीतिक और सामरिक संतुलन का उदाहरण है। उसी तरह गलवान (2020) वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) है। हिंसक झड़प, सैनिकों का बलिदान, बदलती चीनी रणनीति का संकेत, सैन्य और राजनीतिक प्रतिक्रिया की नई परिभाषा है। इन दोनों घटनाओं को एक ही तराजू पर तौलना न केवल तथ्यात्मक त्रुटि है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर बौद्धिक असावधानी भी है।

राजनीति में तुलना एक सामान्य प्रक्रिया है। लेकिन जब तुलना का उद्देश्य समझाना नहीं, बल्कि आरोप लगाना बन जाए, तब वह राष्ट्रहित के विरुद्ध चली जाती है। डोकलाम और गलवान को एक ही फ्रेम में रखकर प्रस्तुत करना यह संकेत देता है कि वक्ता या तो विषय की गहराई नहीं समझता है या फिर जानबूझकर भ्रम पैदा करना चाहता है। दोनों ही स्थितियाँ नेतृत्व के लिए घातक हैं। यहीं पर जनता का भरोसा डगमगाता है। क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा पर राजनीति करना जनता को अस्वीकार्य लगता है, भले ही वह सत्ता-विरोधी क्यों न हो।

जब सर्वोच्च न्यायालय किसी मुद्दे पर टिप्पणी करता है, तो वह केवल कानूनी नहीं, बल्कि नैतिक मार्गदर्शन भी होता है। ऐसे में उस टिप्पणी को नजरअंदाज करना या उसे राजनीतिक सुविधानुसार भुला देना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है। राजनीति में जब न्यायपालिका की बात केवल तब याद आती है जब वह अनुकूल हो, और प्रतिकूल होने पर भुला दी जाती है, तब नेता की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग जाता है। जनता यह देखती है कि कौन संस्थाओं का सम्मान करता है और कौन उन्हें अपने तर्क के अनुसार उपयोग करता है।

यह सबसे विडंबनापूर्ण स्थिति होती है जब कोई नेता स्वयं को गंभीर, जिम्मेदार और वैचारिक रूप से प्रखर मानता है, लेकिन जनता उसे उपहास की दृष्टि से देखने लगती है। यह तगमा कोई विरोधी नहीं देता है। यह स्वतः धारण हो जाता है, शब्दों की असावधानी, संदर्भ की अनदेखी और तर्क की अति के कारण। राजनीति में उपहास सबसे घातक स्थिति है, क्योंकि इसके बाद नेता न तो गंभीर आलोचक रह जाता है, न ही विश्वसनीय विकल्प।

तर्क सत्य को स्पष्ट करने का माध्यम हो सकता है, लेकिन वह कभी उसका स्थान नहीं ले सकता है। जो राजनीति इस मूलभूत सत्य को भूल जाती है, वह धीरे-धीरे स्वयं को अप्रासंगिक बना लेती है। डोकलाम–गलवान जैसे प्रसंग यह स्पष्ट करता है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर शब्दों की असावधानी केवल राजनीतिक क्षति नहीं है, बल्कि नैतिक पतन का भी संकेत होती है।

लोकतंत्र में हार कोई असामान्य घटना नहीं है। पराजय किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मविश्लेषण का अवसर होती है। यह देखने का कि कहाँ चूक हुई, जनता की अपेक्षाएँ क्या थीं और भविष्य में किस प्रकार स्वयं को प्रासंगिक बनाया जा सकता है। किंतु जब हार के बाद आत्ममंथन के स्थान पर बहानों की खोज शुरू हो जाए, तब वही हार स्थायी रूप लेने लगती है। पिछले एक दशक में भारतीय विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही है कि उसने हर चुनावी पराजय को किसी न किसी बाहरी कारक से जोड़ दिया। कभी ईवीएम दोषी ठहराई गई, कभी मीडिया, कभी संस्थाएँ और कभी स्वयं जनता को “भ्रमित” बताया गया। लेकिन शायद ही कभी यह स्वीकार किया गया कि समस्या स्वयं विपक्ष की सोच, भाषा और दृष्टिकोण में भी हो सकती है। यह प्रवृत्ति राजनीतिक परिपक्वता के अभाव को दर्शाती है। जनता उन नेताओं पर भरोसा करती है जो अपनी भूल स्वीकार करने का साहस रखते हैं, न कि उन पर जो हर बार हार का दोष दूसरों पर डाल देते हैं।

आत्मालोचना का अर्थ स्वयं को कमजोर करना नहीं होता है, बल्कि स्वयं को सशक्त बनाना होता है। लेकिन अहंकार इसे स्वीकार नहीं करता है। अहंकार को लगता है कि गलती मान लेना नेतृत्व की हार है, जबकि वास्तव में यही नेतृत्व की पहली शर्त है। विपक्ष की राजनीति में यह भय स्पष्ट दिखाई देता है। नेतृत्व स्तर पर यह स्वीकार करने की इच्छा नहीं दिखती कि जनता की प्राथमिकताएँ बदल चुकी हैं। राष्ट्रवाद की परिभाषा केवल नारे नहीं, नीतियाँ भी हैं और विकास बनाम पहचान की राजनीति में जनता का झुकाव स्पष्ट हो चुका है। जब नेतृत्व इन परिवर्तनों को समझने से इनकार करता है, तब वह अतीत में जीता रहता है और वर्तमान उससे आगे निकल जाता है।

विपक्ष की राजनीति का सबसे बड़ा संकट यह रहा है कि उसने स्वयं को किसी वैकल्पिक विचारधारा के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय, अपनी पूरी पहचान एक व्यक्ति-विरोध तक सीमित कर ली है। “हम बनाम मोदी” का नैरेटिव सुनने में भले ही आकर्षक लगे, लेकिन यह दीर्घकाल में आत्मघाती सिद्ध हुआ। इसका कारण यह है कि यह नैरेटिव सकारात्मक एजेंडा नहीं देता है। यह जनता को यह नहीं बताता कि विकल्प क्या है और यह राष्ट्र को व्यक्ति तक सीमित कर देता है। जनता यह पूछती है कि यदि मोदी नहीं, तो कौन? और यदि भाजपा नहीं, तो क्या? इस प्रश्न का ठोस उत्तर देने में विपक्ष बार-बार विफल रहा है।

जब किसी नेता या दल की आलोचना इस सीमा तक पहुँच जाए कि वह राष्ट्र की उपलब्धियों को भी संदेह की दृष्टि से देखने लगे, तब जनता उसे राष्ट्र-विरोधी नहीं, लेकिन राष्ट्र-विमुख अवश्य मानने लगती है। यहाँ समस्या आलोचना की नहीं है, बल्कि दृष्टिकोण की है। यदि हर सरकारी सफलता को प्रचार कहकर खारिज कर दिया जाए, हर अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा को संयोग बताया जाए और हर उपलब्धि पर प्रश्नचिह्न लगाया जाए, तो जनता यह निष्कर्ष निकालती है कि विपक्ष को भारत की प्रगति से अधिक अपनी राजनीति की चिंता है। यहीं पर मोदी और भारत को एक समझने की भूल सामने आती है। विपक्ष यह मान लेता है कि मोदी की सफलता का अर्थ उसकी पराजय है, जबकि जनता इसे भारत की सफलता के रूप में देखती है।

भारत की राजनीति में 2014 के बाद एक बड़ा परिवर्तन आया है “जनमानस का परिवर्तन”। यह परिवर्तन केवल नेतृत्व में नहीं है, बल्कि अपेक्षाओं में है। जनता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होती है, वह परिणाम देखना चाहती है। विपक्ष का दुर्भाग्य यह रहा है कि उसने इस परिवर्तन को या तो नकार दिया है या उसे अस्थायी मान लिया है। वह आज भी उसी शब्दावली, उसी भावनात्मक अपील और उसी वर्गीय राजनीति में उलझा हुआ दिखाई देता है, जो दशकों पहले प्रभावी थी। राजनीति में जो बदलते समय के साथ स्वयं को नहीं बदलता, वह इतिहास बन जाता है।

बौद्धिक जड़ता का अर्थ है विचारों का ठहर जाना। विपक्ष की राजनीति में यह जड़ता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। नए विषयों, नई चुनौतियों और नई वैश्विक वास्तविकताओं पर उसका दृष्टिकोण या तो अस्पष्ट होता है या पूरी तरह नकारात्मक। चाहे वह राष्ट्रीय सुरक्षा हो। विदेश नीति हो। आर्थिक सुधार हों या भारत की वैश्विक भूमिका। हर विषय पर प्रतिक्रिया समान रहती है संदेह, विरोध और अस्वीकार। यह एकरूपता ही जनता को सबसे अधिक खटकती है।

विपक्ष की समस्या यह नहीं है कि वह सत्ता में नहीं है। उसकी समस्या यह है कि वह समय के साथ चलने से इनकार कर रहा है। आत्मालोचना के स्थान पर आत्ममुग्धता, वैचारिक नवाचार के स्थान पर जड़ता और सकारात्मक राजनीति के स्थान पर व्यक्ति-विरोध। यही उसकी निरंतर पराजय के मूल कारण हैं। जब तक विपक्ष यह नहीं समझेगा कि राजनीति केवल विरोध नहीं है, बल्कि विकल्प प्रस्तुत करने की कला है, तब तक उसकी हार गूलर के फूल की तरह दुर्लभ नहीं है, बल्कि नियमित होती रहेगी।



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