एक ऐसा दिन जो इतिहास में दर्ज हो गया - जब राष्ट्र, राजनीति और नैतिकता आमने-सामने खड़े थे

Jitendra Kumar Sinha
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संसद के लिए बुधवार का दिन सामान्य नहीं था। यह दिन केवल समाचारों का हिस्सा नहीं बना, बल्कि देश की चेतना पर एक गहरी लकीर खींच गया। ऐसा दिन, जिसकी कल्पना तक करना कठिन था और जो घटित हो गया। हालात की तीव्रता और गंभीरता का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि देश के प्रधानमंत्री को अपने कार्यक्रम रोकने पड़े। 

यह कोई साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं था, बल्कि यह संकेत था कि परिस्थिति राष्ट्र की सुरक्षा, स्थिरता और संवेदनशीलता के उस स्तर तक पहुँच चुकी है जहाँ राजनीति से ऊपर राष्ट्र को रखना अनिवार्य हो जाता है। लेकिन दुर्भाग्य यह रहा कि जिस क्षण राष्ट्र एकजुटता की अपेक्षा कर रहा था, उसी क्षण कुछ राजनीतिक शक्तियाँ इसे राजनीतिक अवसर में बदलने की होड़ में लग गईं।

किसी भी लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। वह सत्ता से प्रश्न पूछता है, जवाबदेही तय करता है और जनहित की रक्षा करता है। लेकिन एक बुनियादी रेखा होती है राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना उस रेखा के उस पार हैं, जहाँ राजनीति का प्रवेश राष्ट्रघात के समान हो जाता है।

दुर्भाग्य से, नेता प्रतिपक्ष और उनके सहयोगी दलों ने इसी रेखा को लांघने का दुस्साहस किया है। सेना, खुफिया तंत्र और राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीतिक हथियार के रूप में प्रयोग करना न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि यह उस न्यूनतम नैतिक स्तर को भी तोड़ देता है, जिस पर लोकतंत्र खड़ा रहता है।

बुधवार को जो कुछ कहा गया, वह किसी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया भर नहीं था। निशिकांत दुबे के शब्दों ने राजनीति को एक आईना दिखाया है भले ही वह आईना कुछ लोगों को असहज कर गया हो। उनके बयान को चाहे जितना विवादास्पद कहा जाए, पर यह नकारा नहीं जा सकता है कि उसने उस गिरावट की ओर इशारा किया है, जहाँ राजनीति राष्ट्रहित नहीं, स्वार्थहित की गुलाम बनती जा रही है। 

यदि इस प्रवृत्ति पर अभी अंकुश नहीं लगाया गया, तो राजनीति अपने उस स्तर को छू लेगी, जहाँ से वापस लौटना लगभग असंभव होगा।

प्रश्न यह नहीं है कि बुधवार को क्या हुआ। प्रश्न यह है कि क्या यह शुरुआत है? जब राष्ट्रीय सुरक्षा पर सवाल उठाकर सुर्खियाँ बटोरी जाएँ। जब सेना के शौर्य को राजनीतिक बहस का विषय बनाया जाए। जब संकट के समय सरकार को कमजोर दिखाने का प्रयास हो। तो यह लोकतंत्र की मजबूती नहीं, बल्कि उसकी जड़ों में कुल्हाड़ी है। राजनीति यदि आत्मसंयम खो दे, तो वह स्वयं को ही नष्ट कर देती है।

सबसे अधिक चिंताजनक पहलू यह रहा है कि विपक्ष ने नारी शक्ति को भी इस राजनीतिक संघर्ष का मोहरा बना दिया। भारत में नारी शक्ति केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि संस्कृति है। सम्मान है और संघर्ष की प्रतीक है। 

लेकिन जब स्त्री को राजनीतिक सहानुभूति बटोरने का उपकरण बना दिया जाता है, तब यह नारी सशक्तिकरण नहीं रहती है बल्कि नारी का दुरुपयोग बन जाता है। बुधवार को जो हुआ, वह महिला सम्मान की लड़ाई नहीं थी बल्कि वह राजनीतिक लाभ की रणनीति थी।

इतिहास गवाह है कि जो राजनीति तात्कालिक लाभ के लिए नैतिक सीमाएँ तोड़ती है, वही राजनीति भविष्य में सबसे भारी कीमत चुकाती है। आज जो नारी शक्ति के नाम पर खेल खेला गया है, संभव है वही कल उन्हीं के लिए राजनीतिक बोझ बन जाए। जनता मूर्ख नहीं है। वह देखती है, समझती है और समय आने पर जवाब भी देती है।

सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि आज कौन जीता या हारा। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आने वाली पीढ़ियों को कैसी राजनीति सौंप कर जा रहे हैं? यदि आज का आचरण झूठ पर आधारित होगा, भावनाओं के शोषण पर टिका होगा, राष्ट्रहित की उपेक्षा करेगा, तो आने वाली नस्लें न केवल शर्मिंदा होगी, बल्कि आज के कृत्यों पर पश्चाताप भी करेगी।

असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन अराजकता उसका अंत। विपक्ष का धर्म है प्रश्न करना, लेकिन उसका कर्तव्य भी है कि वह सीमाएँ पहचाने। संवेदनशील विषयों पर संयम रखे और संकट के समय राष्ट्र के साथ खड़ा हो। जब यह संतुलन टूटता है, तब लोकतंत्र नहीं बल्कि राजनीतिक एक तमाशा बनता है।

बुधवार तो गुजर गया, लेकिन आने वाला आज अधिक कठिन है। यह तय होना है कि क्या सबक लेंगे? या उसी रास्ते पर आगे बढ़ेंगे? विपक्ष यदि आत्ममंथन नहीं करता है, तो जो बोया गया है, वही काटना पड़ेगा।

गणतंत्र केवल चुनाव से नहीं चलता है। वह चलता है नैतिकता से, संयम से और राष्ट्रनिष्ठा से। यदि इन मूल्यों को खो देंगे, तो गणतंत्र केवल एक शब्द बनकर रह जाएगा।



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