विवेकवान क्रांति की दहलीज पर मानवता - जब क्रांति औजार नहीं, चेतना बन जाए

Jitendra Kumar Sinha
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मानव सभ्यता का इतिहास क्रांतियों का इतिहास है। पत्थर के औजारों से लेकर अग्नि की खोज, कृषि क्रांति से औद्योगिक क्रांति और फिर सूचना क्रांति तक, हर चरण में मनुष्य ने प्रकृति को समझा, साधा और अपने अस्तित्व को सुरक्षित किया। इन सभी क्रांतियों में एक बात समान रही रही है वह है कि मनुष्य निर्णायक था और तकनीक साधन। 

लेकिन पिछले दो दशकों में जिस क्रांति ने आकार लेना शुरू किया है, वह इस ऐतिहासिक प्रवृत्ति से भिन्न है। यह केवल औजार नहीं है, यह विवेकवान, निर्णयक्षम और आत्म-अध्ययनशील है। यह न केवल मानव की सहायता कर रही है, बल्कि मानव निर्णय प्रक्रिया में हस्तक्षेप भी कर रही है। यही वह बिंदु है जहाँ आशा और भय एक-दूसरे में विलीन हो जाता है।

प्रारंभिक मानव ने जब पत्थर को धार दी, तब उसने प्रकृति पर पहला सचेत हस्तक्षेप किया। यह क्रांति शारीरिक क्षमता का विस्तार थी, न कि बौद्धिक प्रतिस्थापन। कृषि क्रांति ने मानव को खानाबदोश से नागरिक बनाया। समाज, संस्कृति, परंपरा, सबका जन्म यहीं से हुआ। लेकिन निर्णय फिर भी मानव मस्तिष्क के अधीन था। भाप, मशीन और कारखानों ने उत्पादन बढ़ाया, लेकिन मशीनें निर्देशों का पालन करती थीं, निर्णय नहीं लेती थीं। कंप्यूटर और इंटरनेट ने सूचना को लोकतांत्रिक बनाया, परंतु अब भी कंप्यूटर निर्जीव गणनाकार ही था।

यह पहली बार है जब मानव ने ऐसी प्रणाली बनाई है जो स्वयं सीख सकती है। पैटर्न पहचान सकती है। भविष्य का अनुमान लगा सकती है और विकल्पों में से निर्णय सुझा सकती है, यहीं से यह क्रांति अप्रत्याशित बन जाती है।

आज एल्गोरिद्म यह बता सकता है कि क्या खरीदेंगे। किस विचारधारा की ओर झुकेंगे। किससे प्रेम करेंगे और किससे भयभीत होंगे,  यह केवल डेटा नहीं पढ़ता है बल्कि मानवीय व्यवहार पढ़ते हैं।

जब कोई प्रणाली भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को समझने लगे, तब वह केवल तकनीक नहीं रहती है बल्कि वह मनोवैज्ञानिक शक्ति बन जाती है।

आज न्यायालयों में सजा की अवधि तय करने से लेकर युद्ध में लक्ष्य चयन तक, एल्गोरिद्म सुझाव दे रहे हैं। प्रश्न यह नहीं कि वे सही हैं या गलत। प्रश्न यह है कि अंतिम निर्णय कौन ले रहा है? यदि मनुष्य केवल “स्वीकृति बटन” बन जाए, तो क्या वह अभी भी निर्णयकर्ता है?

मानव इतिहास गवाह है कि शक्ति जब भी केंद्रीकृत हुई है, उसका दुरुपयोग हुआ है। यदि विवेकवान प्रणाली सत्ता का संरक्षण करने लगे। असहमति को जोखिम माने और नैतिकता को बाधा समझे, तो परिणाम केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सभ्यतागत होंगे।

मानव की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदना है। परंतु कोई भी कृत्रिम विवेक दर्द नहीं महसूस करताहै वह केवल उसका विश्लेषण करता है। फिर भी मनुष्य होना निराश होना नहीं सिखाता है। इतिहास यह भी बताता है कि हर नई शक्ति के साथ नई जिम्मेदारी आई है। हर संकट के साथ नया विवेक विकसित हुआ है। यह क्रांति भी विनाश नहीं, रूपांतरण का अवसर हो सकती है।

यह क्रांति केवल तेज उत्पादन, अधिक सूचना तक सीमित नहीं है। यह शिक्षा को वैयक्तिक। चिकित्सा को सटीक और संसाधनों को न्यायपूर्ण बना सकती है।

मानव संस्कृति स्थिर नहीं रही है। भाषा, कला, नैतिकता, सब समय के साथ बदले हैं। अब पहली बार परिवर्तन का प्रेरक मानव के बाहर से आ रहा है। यदि संतुलन साधा गया, तो यह प्रकृति संरक्षण, संसाधन संतुलन और वैश्विक सहयोग का माध्यम बन सकता है।

सबसे बड़ा भय यह नहीं है कि तकनीक शक्तिशाली हो जाएगी। सबसे बड़ा भय यह है कि मनुष्य आलसी, आश्रित और वैचारिक रूप से निष्क्रिय हो जाएगा। जिस दिन मानव ने प्रश्न पूछना छोड़ दिया। असहमति से डरने लगा और निर्णय टालने लगा, उस दिन विकल्प बनने की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी।

समाधान तकनीक को रोकना नहीं है। समाधान है नैतिक सीमाएँ, मानवीय निगरानी और उत्तरदायित्व आधारित विकास, इसलिए तकनीक को सहचर बनाया जाए, स्वामी नहीं।

यह क्रांति द्वार पर नहीं, भीतर प्रवेश कर रही है। यह सोचने, चुनने और मूल्यांकन करने के तरीके को बदल रही है। यदि विवेक को जीवित रखें। करुणा को प्राथमिकता दें और उत्तरदायित्व से पीछे न हटें, तो यह क्रांति मानवता की सबसे महान उपलब्धि बन सकती है। अन्यथा इतिहास में पहली बार मनुष्य स्वयं अपने द्वारा निर्मित व्यवस्था में अप्रासंगिक हो सकता है।



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