दुनिया भर में सड़कों पर ट्रैफिक लाइट का पारंपरिक स्वरूप तीन रंगों लाल, पीला और हरा, पर आधारित रहा है। लेकिन अब अमेरिका के शहरों, खासकर न्यूयॉर्क और अन्य तकनीकी रूप से उन्नत क्षेत्रों में, ट्रैफिक सिग्नल में चौथे रंग के रूप में सफेद लाइट जोड़ने की तैयारी की जा रही है। यह कदम तेजी से बढ़ रही सेल्फ-ड्राइविंग गाड़ियों (Autonomous Vehicles) की संख्या को ध्यान में रखते हुए उठाया जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका में सेल्फ-ड्राइविंग गाड़ियों का प्रयोग तेजी से बढ़ा है। टेस्ला, वेमो और अन्य कंपनियां ऐसी कारें विकसित कर रही हैं जो बिना ड्राइवर के सड़कों पर चल सकती हैं। इन गाड़ियों में अत्याधुनिक सेंसर, कैमरे और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिस्टम लगे होते हैं।
सड़कों पर जब पारंपरिक गाड़ियों और स्वचालित गाड़ियों का मिश्रण होता है, तो ट्रैफिक प्रबंधन अधिक जटिल हो जाता है। ऐसे में सफेद लाइट एक संकेत के रूप में काम करेगी कि उस चौराहे पर ट्रैफिक का नियंत्रण मुख्य रूप से सेल्फ-ड्राइविंग सिस्टम द्वारा किया जा रहा है।
नई प्रणाली में जब ट्रैफिक सिग्नल पर सफेद लाइट जलेगी, तो इसका मतलब होगा कि उस समय चौराहे का नियंत्रण स्वचालित गाड़ियों के नेटवर्क के हाथ में है। यानि सेल्फ-ड्राइविंग वाहन आपस में संवाद कर ट्रैफिक के प्रवाह को नियंत्रित करेंगे।
मानव चालकों के लिए इसका अर्थ सरल होगा कि उन्हें अपने सामने चल रही गाड़ियों का अनुसरण करना है। सफेद लाइट यह संकेत देगी कि “सिस्टम पर भरोसा करें और ट्रैफिक के प्रवाह के अनुसार चलें।” इससे ट्रैफिक जाम कम होगा, सिग्नल पर प्रतीक्षा समय घटेगा और दुर्घटनाओं की संभावना भी कम होगी।
यह पहल केवल एक नया रंग जोड़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह स्मार्ट सिटी और स्मार्ट ट्रांसपोर्ट सिस्टम की दिशा में बड़ा बदलाव है। भविष्य में ट्रैफिक सिग्नल केवल लाइट तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि वे डेटा आधारित निर्णय लेंगे।
सफेद लाइट का प्रयोग यह दर्शाता है कि शहरों की यातायात व्यवस्था अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT) से जुड़ती जा रही है। इससे ईंधन की बचत, प्रदूषण में कमी और समय की बचत जैसे कई लाभ मिल सकते हैं।
सामान्य वाहन चालकों के लिए शुरुआत में यह बदलाव थोड़ा नया और भ्रमित करने वाला हो सकता है। लेकिन प्रशासन का मानना है कि जागरूकता अभियान और स्पष्ट दिशा-निर्देशों के माध्यम से लोग जल्द ही इसे समझ लेंगे।
जैसे कभी लाल, पीले और हरे रंग को समझने में समय लगा था, वैसे ही सफेद लाइट भी कुछ समय में सामान्य हो जाएगी। स्कूलों, ड्राइविंग लाइसेंस प्रशिक्षण केंद्रों और मीडिया के माध्यम से इसकी जानकारी दी जाएगी।
यदि अमेरिका में यह प्रयोग सफल होता है, तो संभव है कि यूरोप, जापान और चीन जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देश भी इसे अपनाएं। भारत जैसे देशों में जहां ट्रैफिक पहले से ही चुनौतीपूर्ण है, वहां इस तरह की तकनीक भविष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके लिए बुनियादी ढांचे में बड़े बदलाव और व्यापक तकनीकी निवेश की आवश्यकता होगी।
ट्रैफिक सिग्नल में सफेद रंग का जुड़ना केवल एक तकनीकी प्रयोग नहीं है, बल्कि आने वाले समय की झलक है। जैसे-जैसे सेल्फ-ड्राइविंग गाड़ियां आम होगी, वैसे-वैसे ट्रैफिक प्रबंधन के तरीके भी बदलेंगे। संभव है कि आने वाले वर्षों में सिग्नल की जगह पूरी तरह डिजिटल और नेटवर्क आधारित सिस्टम ले लें, जहां वाहन खुद तय करेंगे कि कब रुकना है और कब चलना है।
ट्रैफिक लाइट में चौथे रंग, सफेद, का जुड़ना आधुनिक परिवहन प्रणाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह बदलाव केवल तकनीक का विस्तार नहीं है, बल्कि सुरक्षित, तेज और स्मार्ट यातायात व्यवस्था की ओर बढ़ता कदम है। शुरुआत में यह नया प्रयोग लगे, लेकिन आने वाले समय में यह सड़कों की सामान्य तस्वीर बन सकता है। दुनिया बदल रही है और अब ट्रैफिक सिग्नल भी उस बदलाव का हिस्सा बनने जा रहा है।
