पूर्वी चंपारण की झीलें - प्रवासी पक्षियों का पसंदीदा ठिकाना

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार का पूर्वी चंपारण जिला अपनी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ जैव-विविधता के लिए भी जाना जाता है। जिले की झीलें और नदियाँ हर वर्ष दूर-दराज देशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों को आकर्षित करती हैं। वर्ष 2024 में कराए गए सर्वेक्षण के अनुसार, यहाँ 112 प्रकार के प्रवासी पक्षी दर्ज किए गए हैं। यह तथ्य विधान परिषद में पूछे गए एक तारांकित प्रश्न के उत्तर में सामने आया है, जिसने इन आर्द्रभूमियों के संरक्षण और पर्यटन संभावनाओं पर नई बहस छेड़ दी है।

2024 में हुए सर्वे में यह स्पष्ट हुआ था कि पूर्वी चंपारण की झीलें और नदियाँ पक्षियों के लिए सुरक्षित भोजन, जल और विश्राम स्थल प्रदान करती हैं। सर्वे के मुताबिक यहाँ सर्दियों के मौसम में यूरोप, मध्य एशिया और साइबेरिया तक से पक्षी आते हैं। इनमें बतखों की विभिन्न प्रजातियाँ, जलकाग, बगुले, टर्न, ग्रीब्स और दुर्लभ शिकारी पक्षी भी शामिल हैं। स्थानीय पक्षी-प्रेमियों और शोधकर्ताओं के लिए यह एक उत्साहजनक संकेत है कि जैव-विविधता अभी भी जीवित है।

विधान परिषद में एमएलसी महेश्वर सिंह द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में मंत्री लखेंद्र कुमार ने बताया कि पूर्वी चंपारण की कोई भी झील फिलहाल वन क्षेत्र के रूप में अधिसूचित नहीं है। इसी कारण इन्हें औपचारिक रूप से पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित नहीं किया जा सकता है। हालांकि, यह जवाब प्रशासनिक सीमाओं की ओर इशारा करता है, लेकिन साथ ही यह प्रश्न भी उठाता है कि संरक्षण और विकास के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

एमएलसी महेश्वर सिंह ने जिन जल-निकायों का उल्लेख किया है, वे प्रवासी पक्षियों के लिए खास अनुकूल माना जाता है। इनमें गंडक नदी, सरोतर झील, सोनबरसा झील, बूढ़ी गंडक और चिलरावं मन शामिल हैं। इन स्थानों पर जल की उपलब्धता, मछलियों और जलीय वनस्पतियों की प्रचुरता तथा अपेक्षाकृत शांत वातावरण पक्षियों को आकर्षित करता है। एमएलसी महेश्वर सिंह के अनुसार, यहाँ डेढ़ सौ तक दुर्लभ प्रजातियों की मौजूदगी दर्ज की गई है, जो इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी महत्व को रेखांकित करती है।

हालाँकि झीलों को पर्यटन केंद्र घोषित न किए जाने की बात कही गई है, फिर भी संरक्षण-आधारित पर्यटन (इको-टूरिज्म) की संभावनाएँ बनी हुई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पक्षियों के आवास को नुकसान पहुँचाए बिना नियंत्रित और स्थानीय सहभागिता-आधारित पर्यटन विकसित किया जाए, तो इससे रोजगार भी सृजित होंगे और संरक्षण को बल मिलेगा। इसके लिए वैज्ञानिक अध्ययन, नियमित मॉनिटरिंग और स्थानीय समुदायों की भागीदारी आवश्यक है।

इन झीलों के आसपास रहने वाले ग्रामीण समुदायों की भूमिका बेहद अहम है। पारंपरिक ज्ञान, मछली पालन और जल-संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग से ही यह जैव-विविधता बनी रही है। स्कूलों, कॉलेजों और पंचायत स्तर पर पक्षी गणना, प्रकृति-शिक्षा और स्वच्छता अभियानों से जागरूकता बढ़ाई जा सकती है। इससे अवैध शिकार, प्रदूषण और अतिक्रमण पर अंकुश लगेगा।

पूर्वी चंपारण की झीलें केवल प्राकृतिक धरोहर नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक अध्ययन और सतत विकास का अवसर भी हैं। आवश्यकता है कि इन्हें आर्द्रभूमि संरक्षण की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहलों से जोड़ा जाए। वन क्षेत्र के रूप में अधिसूचना, या कम से कम संरक्षित आर्द्रभूमि का दर्जा, दीर्घकालिक समाधान हो सकता है। इससे प्रवासी पक्षियों का सुरक्षित ठिकाना बना रहेगा और आने वाली पीढ़ियाँ भी इस प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद ले सकेगी।

112 प्रकार के प्रवासी पक्षियों की मौजूदगी यह साबित करती है कि पूर्वी चंपारण की झीलें पारिस्थितिकी दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। संरक्षण, वैज्ञानिक प्रबंधन और स्थानीय सहभागिता के साथ यदि नीतिगत फैसले लिए जाएँ, तो यह क्षेत्र बिहार में जैव-विविधता संरक्षण का मॉडल बन सकता है।



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