भारत महत्वपूर्ण खनिजों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक और निर्णायक कदम उठाने जा रहा है। कोयला एवं खान मंत्री जी. किशन रेड्डी ने घोषणा की है कि वर्ष 2026 के दौरान देश में दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबकों (Rare Earth Permanent Magnets) का उत्पादन शुरू हो जाएगा। यह पहल न केवल इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे उभरते क्षेत्रों के लिए अहम है, बल्कि भारत की औद्योगिक, सामरिक और तकनीकी मजबूती को भी नई दिशा देगी।
दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबक विशेष प्रकार के उच्च-शक्ति वाले चुंबक होते हैं, जिनमें नेओडिमियम, प्रसीओडिमियम, डिस्प्रोसियम और टर्बियम जैसे तत्वों का उपयोग किया जाता है। ये चुंबक छोटे आकार में भी अत्यधिक शक्ति प्रदान करते हैं। इसी कारण इनका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहनों के मोटर्स, पवन चक्कियों के जनरेटर, स्मार्टफोन, कंप्यूटर हार्डवेयर, चिकित्सा उपकरणों, वैमानिकी और रक्षा प्रणालियों में व्यापक रूप से होता है।
वर्तमान में वैश्विक स्तर पर दुर्लभ पृथ्वी चुंबकों की आपूर्ति कुछ ही देशों तक सीमित है। भारत जैसे तेजी से विकसित होते देश के लिए यह निर्भरता रणनीतिक जोखिम पैदा करती है। इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और हरित ऊर्जा की ओर बढ़ते कदमों के बीच, इन चुंबकों की स्थिर आपूर्ति बेहद जरूरी है। घरेलू उत्पादन शुरू होने से आयात पर निर्भरता घटेगी, लागत में कमी आएगी और आपूर्ति शृंखला अधिक सुरक्षित बनेगी।
नई दिल्ली में आयोजित उद्योग मंडल फिक्की और खान मंत्रालय के संयुक्त सम्मेलन में मंत्री ने बताया कि इस दिशा में केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर काम कर रही हैं। गुजरात सरकार ने दुर्लभ पृथ्वी चुंबक उत्पादन से जुड़ी परियोजनाओं पर सक्रिय रूप से काम शुरू कर दिया है, जबकि आंध्र प्रदेश भी आवश्यक ढांचा और निवेश आकर्षित करने के लिए तैयार है। यह सहयोगी मॉडल केंद्र-राज्य समन्वय का अच्छा उदाहरण है।
गुजरात में औद्योगिक बुनियादी ढांचे, बंदरगाहों और लॉजिस्टिक्स की मजबूत व्यवस्था पहले से मौजूद है, जो खनिज आधारित उद्योगों के लिए अनुकूल वातावरण प्रदान करती है। वहीं आंध्र प्रदेश के पास खनिज संसाधनों की उपलब्धता और निवेश के लिए अनुकूल नीतियां हैं। दोनों राज्यों की सक्रियता से यह स्पष्ट है कि दुर्लभ पृथ्वी चुंबक उत्पादन को क्षेत्रीय औद्योगिक विकास से जोड़ा जा रहा है।
भारत सरकार ने इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा को भविष्य की प्राथमिकता के रूप में चिन्हित किया है। ईवी मोटर्स और पवन चक्कियों में प्रयुक्त चुंबकों की मांग आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ने वाली है। घरेलू उत्पादन से न केवल इन क्षेत्रों की लागत कम होगी, बल्कि “मेक इन इंडिया” और “ग्रीन एनर्जी ट्रांजिशन” को भी मजबूती मिलेगी।
दुर्लभ पृथ्वी चुंबक रक्षा उपकरणों, मिसाइल प्रणालियों, रडार और आधुनिक वैमानिकी तकनीकों में भी अहम भूमिका निभाते हैं। स्वदेशी उत्पादन से भारत की रक्षा तैयारियों में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी और संवेदनशील तकनीकों में विदेशी निर्भरता घटेगी। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।
इस उद्योग के शुरू होने से खनन, प्रसंस्करण, अनुसंधान और विनिर्माण क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर सृजित होंगे। साथ ही, उच्च तकनीक आधारित कौशल विकास को भी बढ़ावा मिलेगा। विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग से भारत दुर्लभ पृथ्वी प्रौद्योगिकी में वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो सकेगा।
दुर्लभ पृथ्वी स्थायी चुंबकों का घरेलू उत्पादन भारत के लिए केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक निवेश है। इससे ऊर्जा, परिवहन, रक्षा और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे अहम क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता बढ़ेगी। गुजरात और आंध्र प्रदेश की सक्रिय भागीदारी के साथ यह पहल भारत को वैश्विक आपूर्ति शृंखला में एक मजबूत और भरोसेमंद खिलाड़ी बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकती है।
