उम्र अक्सर समाज में किसी व्यक्ति की क्षमताओं और निर्णय लेने की शक्ति को लेकर पूर्वाग्रह पैदा कर देती है। खासकर जब बात बहुत अधिक उम्र की हो, तो यह मान लिया जाता है कि व्यक्ति अपने जीवन के अहम फैसले खुद नहीं ले सकता है। लेकिन सिंगापुर से आई एक खबर ने इस सोच को झकझोर दिया है। यहां 97 वर्षीय एक बुजुर्ग ने अपने ही बेटे के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़कर शादी करने का अधिकार हासिल किया है। यह मामला न सिर्फ पारिवारिक रिश्तों की जटिलता को उजागर करता है, बल्कि बुजुर्गों की स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय के अधिकार पर भी नई बहस छेड़ता है।
सिंगापुर के 97 वर्षीय बुजुर्ग ने जीवन के इस पड़ाव पर शादी करने का फैसला लिया। यह फैसला उनके बेटे को नागवार गुज़रा। बेटे ने अदालत का दरवाज़ा खटखटाते हुए दावा किया कि उसके पिता भूलने की बीमारी (डिमेंशिया) से पीड़ित हैं और इस कारण वे शादी जैसा बड़ा निर्णय लेने में सक्षम नहीं हैं। बेटे की याचिका का उद्देश्य अदालत से यह प्रमाणित कराना था कि बुजुर्ग मानसिक रूप से अक्षम हैं और उनके फैसलों पर रोक लगाई जाए।
मामले की गंभीरता को देखते हुए सिंगापुर की अदालत ने भावनाओं के बजाय तथ्यों और मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर फैसला लेने का रास्ता चुना। अदालत के निर्देश पर बुजुर्ग की विस्तृत मेडिकल जांच कराई गई। विशेषज्ञ डॉक्टरों और मनोचिकित्सकों ने उनकी मानसिक स्थिति का आकलन किया। जांच में यह स्पष्ट हुआ कि बुजुर्ग पूरी तरह मानसिक रूप से स्वस्थ हैं, उन्हें अपने फैसलों की समझ है और वे शादी जैसे निर्णय के सामाजिक, भावनात्मक और कानूनी पहलुओं को भली-भांति जानते हैं।
मेडिकल रिपोर्ट और प्रस्तुत सबूतों के आधार पर अदालत ने बेटे की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल उम्र के आधार पर किसी व्यक्ति की निर्णय क्षमता पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि 97 वर्षीय बुजुर्ग अपने जीवन से जुड़े सभी फैसले लेने के लिए सक्षम हैं और उन्हें शादी करने का पूरा अधिकार है। इस फैसले के साथ ही बुजुर्ग को कानूनी रूप से विवाह की मंजूरी मिल गई।
यह मामला एक बड़े सामाजिक सवाल को जन्म देता है, परिवार की चिंता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? बेटे का तर्क भले ही पिता की भलाई से जुड़ा बताया गया हो, लेकिन अदालत ने यह साफ कर दिया है कि किसी की भलाई के नाम पर उसकी आजादी छीनी नहीं जा सकती है। जब तक कोई व्यक्ति मानसिक रूप से सक्षम है, तब तक उसके निजी फैसलों में हस्तक्षेप करना अनुचित है, चाहे वह हस्तक्षेप परिवार के सदस्य ही क्यों न कर रहे हों।
सिंगापुर की यह घटना दुनिया भर के बुजुर्गों के लिए एक मजबूत संदेश देती है। अक्सर बुजुर्गों को यह महसूस कराया जाता है कि वे समाज पर बोझ हैं या उन्हें अब फैसले लेने का अधिकार नहीं रहा। यह फैसला बताता है कि उम्र महज एक संख्या है, न कि किसी की समझदारी या अधिकारों का पैमाना। बुजुर्गों को भी वही सम्मान, स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिए, जो समाज के अन्य वर्गों को मिलता है।
97 वर्ष के बुजुर्ग की यह कानूनी जीत सिर्फ एक शादी की मंजूरी भर नहीं है, बल्कि यह इंसानी गरिमा, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की जीत है। सिंगापुर की अदालत ने यह साबित कर दिया है कि कानून का काम भावनात्मक दबाव या सामाजिक धारणाओं के आधार पर नहीं है, बल्कि तथ्यों और इंसाफ के आधार पर फैसला करना है। यह घटना यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपने समाज में बुजुर्गों को किस नजर से देखना चाहिए, कमजोर और आश्रित के रूप में या फिर अनुभव और अधिकारों से भरपूर एक स्वतंत्र नागरिक के रूप में।
