बिहार में लंबे समय से बंद पड़ी चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने और नई मिलों की स्थापना की दिशा में सरकार ने महत्वपूर्ण पहल शुरू कर दी है। विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह की अध्यक्षता में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में यह निर्णय लिया गया है कि मधुबनी के सकरी और दरभंगा के रैयाम में सहकारी मॉडल के तहत नई चीनी मिलों की स्थापना की प्रक्रिया को प्राथमिकता के आधार पर तेज किया जाएगा। इस निर्णय से मिथिलांचल के गन्ना किसानों में नई आशा जगी है।
बुधवार को आयोजित बैठक में राष्ट्रीय सहकारी शक्कर कारखाना संघ लिमिटेड (NFCSF) और इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) के प्रतिनिधियों के साथ गन्ना उद्योग विभाग एवं सहकारिता विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। बैठक में राज्य में बंद पड़ी चीनी मिलों को पुनः शुरू करने और नई मिलों की स्थापना के लिए सहकारी ढांचे पर विस्तृत चर्चा हुई।
विकास आयुक्त मिहिर कुमार सिंह ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि सकरी और रैयाम में प्रस्तावित चीनी मिलों की स्थापना की प्रक्रिया को प्राथमिकता देते हुए त्वरित गति से आगे बढ़ाया जाए। उन्होंने कहा कि यह पहल न केवल किसानों के हित में होगी, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती देगी।
सहकारी मॉडल का मूल उद्देश्य किसानों को सीधे उत्पादन और प्रबंधन प्रक्रिया से जोड़ना है। इस मॉडल में गन्ना किसान स्वयं मिल के सदस्य बनते हैं और लाभ-हानि में उनकी सीधी भागीदारी होती है। इससे पारदर्शिता बढ़ती है और किसानों को उनके उत्पाद का बेहतर मूल्य मिल पाता है।
बिहार जैसे राज्य में, जहां बड़ी संख्या में किसान गन्ना खेती पर निर्भर हैं, सहकारी मॉडल एक प्रभावी विकल्प साबित हो सकता है। इससे किसानों को बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और भुगतान में देरी जैसी समस्याओं में कमी आएगी।
मधुबनी का सकरी और दरभंगा का रैयाम कभी गन्ना उत्पादन और चीनी उद्योग के प्रमुख केंद्र माने जाते थे। वर्षों पहले यहां संचालित चीनी मिलें स्थानीय लोगों को रोजगार प्रदान करती थीं और आसपास के किसानों के लिए आय का मुख्य स्रोत थीं। समय के साथ आर्थिक चुनौतियों, प्रबंधन की समस्याओं और तकनीकी पिछड़ेपन के कारण ये मिलें बंद हो गईं।
अब सरकार की नई पहल से इन क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों के पुनर्जीवन की उम्मीद जगी है। स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी।
नई चीनी मिलों की स्थापना से गन्ना किसानों को अपनी फसल का सुनिश्चित बाजार मिलेगा। अक्सर किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए दूर-दराज की मिलों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे परिवहन लागत बढ़ जाती है और लाभ घट जाता है। सकरी और रैयाम में मिलों के खुलने से यह समस्या काफी हद तक दूर होगी।
इसके अतिरिक्त, स्थानीय उद्यमियों के लिए भी सहायक उद्योगों की संभावनाएं बढ़ेंगी, जैसे- गुड़ उत्पादन, एथेनॉल निर्माण, बायोगैस संयंत्र और अन्य कृषि आधारित उद्योग। इससे समग्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।
वर्तमान समय में केंद्र सरकार एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम को बढ़ावा दे रही है। नई चीनी मिलों के साथ एथेनॉल उत्पादन इकाइयों की स्थापना की संभावना भी प्रबल है। इससे किसानों की आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित होंगे और राज्य हरित ऊर्जा के क्षेत्र में आगे बढ़ेगा।
गन्ने से चीनी के साथ-साथ शीरा (मोलासेस) और बगास जैसे उप-उत्पाद भी प्राप्त होते हैं, जिसका उपयोग बिजली उत्पादन और अन्य औद्योगिक गतिविधियों में किया जा सकता है। इस प्रकार, चीनी मिलें केवल चीनी उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि बहुआयामी औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित हो सकती हैं।
विकास आयुक्त ने अधिकारियों को निर्देश दिया है कि भूमि, वित्तीय संरचना, तकनीकी साझेदारी और किसानों की सदस्यता से संबंधित प्रक्रियाओं को शीघ्र पूरा किया जाए। सरकार की मंशा है कि परियोजनाओं को जल्द से जल्द धरातल पर उतारा जाए, ताकि आने वाले गन्ना सीजन तक ठोस प्रगति दिखाई दे।
यदि यह पहल सफल होती है तो यह मॉडल राज्य के अन्य बंद पड़े चीनी मिल क्षेत्रों में भी लागू किया जा सकता है। इससे बिहार में चीनी उद्योग के पुनरुत्थान का मार्ग प्रशस्त होगा।
सकरी और रैयाम में सहकारी मॉडल पर चीनी मिलों की स्थापना का निर्णय बिहार के गन्ना किसानों के लिए नई उम्मीद लेकर आया है। यह कदम न केवल कृषि आधारित उद्योग को पुनर्जीवित करेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाते हुए रोजगार और आय के नए अवसर भी सृजित करेगा। अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार और संबंधित विभाग इस महत्वाकांक्षी योजना को कितनी तेजी और प्रभावशीलता से अमल में लाते हैं।
