टीआरई-4 - डोमिसाइल नीति के बाद शिक्षक बहाली की नई दिशा

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार में शिक्षक भर्ती परीक्षा (टीआरई-4) राज्य की शिक्षा व्यवस्था और रोजगार नीति, दोनों के लिए ऐतिहासिक कदम साबित होने जा रही है। डोमिसाइल नीति लागू होने के बाद यह पहली बड़ी बहाली है, जिसके तहत लगभग 46 हजार शिक्षकों की नियुक्ति की जाएगी। लंबे समय से राज्य के युवाओं द्वारा उठाई जा रही मांग के अनुरूप अब भर्ती प्रक्रिया में बिहार के मूल निवासियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे न केवल स्थानीय अभ्यर्थियों को अवसर मिलेगा, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में स्थायित्व और जवाबदेही भी बढ़ेगी।


बिहार राज्य विद्यालय अध्यापक नियुक्ति नियमावली 2025 के तहत डोमिसाइल नीति को मंजूरी दी गई है। इस नीति के अनुसार, लगभग 85 प्रतिशत पद बिहार के मूल निवासियों के लिए आरक्षित रहेंगे, जबकि शेष 15 प्रतिशत पद अन्य राज्यों के अभ्यर्थियों के लिए खुले होंगे।


यह प्रावधान उन युवाओं के लिए बड़ी राहत है, जो वर्षों से यह मांग कर रहे थे कि शिक्षक भर्ती में राज्य के छात्रों को प्राथमिकता दी जाए। अब केवल वैध डोमिसाइल प्रमाण पत्र धारक ही अधिकांश पदों के लिए आवेदन कर सकेंगे।


टीआरई-4 में महिलाओं को भी विशेष प्राथमिकता दी गई है। कुल पदों में से 35 प्रतिशत सीटें बिहार की महिलाओं के लिए आरक्षित रहेगी। इससे महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलेगा और विद्यालयों में महिला शिक्षकों की संख्या बढ़ेगी।


ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में बालिकाओं की शिक्षा को प्रोत्साहित करने में महिला शिक्षकों की अहम भूमिका होती है। ऐसे में यह आरक्षण नीति सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।


लगभग 46 हजार शिक्षकों की नियुक्ति से राज्य के सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी काफी हद तक दूर होने की उम्मीद है। कई स्कूलों में विषयवार शिक्षकों की कमी के कारण पढ़ाई प्रभावित हो रही थी। नई बहाली से छात्र-शिक्षक अनुपात बेहतर होगा। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा। विद्यालयों में नियमित कक्षाएं संचालित हो सकेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षण व्यवस्था सुदृढ़ होगी। इससे शिक्षा का आधार मजबूत होगा और राज्य के शैक्षणिक परिणामों में सुधार देखने को मिल सकता है।


डोमिसाइल नीति लागू करने की मांग लंबे समय से चल रही थी। बिहार के युवाओं का तर्क था कि राज्य की नौकरियों में स्थानीय अभ्यर्थियों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए, ताकि उन्हें अपने ही राज्य में रोजगार का अवसर प्राप्त हो सके।


टीआरई-4 के माध्यम से सरकार ने इस मांग को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्थानीय युवाओं को बड़ा अवसर प्रदान किया है। इससे राज्य के शिक्षित बेरोजगार युवाओं में सकारात्मक संदेश गया है।


बहाली की घोषणा स्वागतयोग्य है, लेकिन इसके साथ पारदर्शी और निष्पक्ष चयन प्रक्रिया सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। पिछली शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में परीक्षा प्रणाली और परिणामों को लेकर कई सवाल उठे थे। इस बार सरकार के सामने प्रमुख चुनौतियां होंगी समयबद्ध परीक्षा आयोजन। निष्पक्ष मूल्यांकन। पारदर्शी मेरिट सूची और शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था। यदि इन पहलुओं पर ध्यान दिया गया, तो यह बहाली राज्य की शिक्षा व्यवस्था के लिए मील का पत्थर साबित हो सकती है।


डोमिसाइल नीति लागू होने के बाद की यह पहली बड़ी बहाली राजनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह निर्णय राज्य की क्षेत्रीय भावनाओं और युवाओं की आकांक्षाओं से जुड़ा हुआ है।


एक ओर स्थानीय युवाओं में संतोष की भावना है, वहीं दूसरी ओर कुछ वर्गों द्वारा इसे लेकर बहस भी जारी है कि इससे प्रतिस्पर्धा का दायरा सीमित होगा। हालांकि सरकार का तर्क है कि इसका उद्देश्य राज्य के प्रतिभाशाली युवाओं को अवसर प्रदान करना और शिक्षा प्रणाली में स्थायित्व लाना है।


टीआरई-4 केवल एक भर्ती परीक्षा नहीं है, बल्कि बिहार की शिक्षा नीति में एक नई दिशा का संकेत है। 46 हजार शिक्षकों की नियुक्ति और डोमिसाइल नीति के तहत स्थानीय अभ्यर्थियों को प्राथमिकता देने से राज्य के युवाओं में रोजगार की नई उम्मीद जगी है।


यदि यह प्रक्रिया पारदर्शिता और गुणवत्ता के साथ पूरी होती है, तो इससे शिक्षा व्यवस्था को मजबूती मिलेगी और बिहार के विद्यालयों में शिक्षण स्तर में सुधार आएगा।


टीआरई-4 अब केवल परीक्षा नहीं है, बल्कि राज्य के युवाओं के सपनों और शिक्षा के भविष्य से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अध्याय बन चुकी है।



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