भारत में शायद ही कोई ऐसा विषय हो, जो शिक्षा, जाति, न्याय और लोकतंत्र को एक साथ छूता हो। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा बनाए गए नए नियमों पर उठा विवाद आज उसी चौराहे पर खड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर फिलहाल रोक लगा दी है, लेकिन यह रोक विवाद का अंत नहीं है, बल्कि एक बड़े राष्ट्रीय विमर्श की शुरुआत है।
आज स्थिति यह है कि पहले जिन नियमों के विरोध में तथाकथित अगड़ी जातियों के लोग सड़कों पर उतरे थे, अब उन्हीं नियमों के समर्थन में एससी, एसटी और ओबीसी समुदायों के लोग प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रश्न यह नहीं है कि कौन सही है और कौन गलत, बल्कि प्रश्न यह है कि क्या हमारा लोकतंत्र ऐसे नियमों की अनुमति दे सकता है, जिनसे एक भी निर्दोष व्यक्ति प्रताड़ित हो?
UGC द्वारा प्रस्तावित नियमों का मूल उद्देश्य भले ही सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व बढ़ाना बताया गया हो, लेकिन इन नियमों की भाषा, संरचना और क्रियान्वयन की संभावना ने एक गहरी आशंका को जन्म दिया है। क्या यह नियम न्याय के सिद्धांतों से मेल खाता है? क्या यह नियम दुरुपयोग की आशंका से मुक्त हैं। क्या यह नियम समानता के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन करता है? जब किसी भी कानून या नियम को लागू करने से पहले समाज के बड़े हिस्से में भय पैदा हो जाए, तो यह मान लेना चाहिए कि उस नियम में कहीं न कहीं गंभीर खामी है।
भारतीय न्याय व्यवस्था का एक बुनियादी सिद्धांत रहा है कि “सौ दोषी भले छूट जाएं, लेकिन एक भी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए।” यह कोई भावनात्मक वाक्य नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा है। क्योंकि यदि निर्दोष को सजा मिलने लगे, तो न्याय व्यवस्था पर समाज का भरोसा खत्म हो जाता है।
UGC के नए नियमों को जब इस कसौटी पर परखा जाता है, तो स्पष्ट होता है कि इनमें आरोप को ही अपराध मान लेने की प्रवृत्ति है। जांच और प्रमाण की जगह पहले कार्रवाई, बाद में सत्यापन का रास्ता खुलता है। इससे निर्दोष व्यक्ति के जीवन, करियर और सम्मान को अपूरणीय क्षति हो सकती है।
इस विवाद को केवल अगड़ी और पिछड़ी जातियों के संघर्ष के रूप में देखना सबसे बड़ी भूल होगी। सही प्रश्न यह है कि क्या कानून का पालन करने वाला नागरिक सुरक्षित है? क्या राज्य किसी व्यक्ति को बिना ठोस प्रमाण के प्रताड़ित कर सकता है? क्या गिरफ्तारी ही न्याय बन चुकी है? यह विवाद अब व्यक्ति बनाम व्यवस्था का हो चुका है।
कई लोग यह कहते हुए नजर आते हैं कि “दुरुपयोग तो हर कानून का हो सकता है।” यह तर्क सुनने में व्यावहारिक लगता है, लेकिन वास्तव में यह लोकतंत्र के लिए बेहद खतरनाक है। क्योंकि यदि यह मान लें कि दुरुपयोग स्वाभाविक है, तो फिर निर्दोषों की गिरफ्तारी जायज ठहराई जाएगी। पुलिस को निरंकुश अधिकार मिल जाएगा और न्याय प्रक्रिया सजा से पहले ही शुरू हो जाएगी। कानून वही अच्छा होता है, जो दुरुपयोग की संभावना को न्यूनतम करे।
यह एक कड़वा सच है कि भारत की जेलों में आज भी हजारों लोग ऐसे बंद हैं, जिन पर न तो आरोप सिद्ध हुआ है और न ही मुकदमा पूरा हुआ है। विचाराधीन कैदी, झूठे मामलों में फंसे लोग और सामाजिक दबाव में गिरफ्तार किए गए नागरिक। क्या यह लोकतंत्र है? क्या यही न्याय है? अब समय आ गया है कि इसे राष्ट्रीय मुद्दा बनाया जाए कि बिना सजा के वर्षों तक जेल में रखने के लिए कौन जिम्मेदार है?
यह कहना जरूरी है कि महिला सुरक्षा कानूनों की आवश्यकता निर्विवाद है। लेकिन उतना ही जरूरी है यह पेश प्रश्न उठाना कि क्या बिना जांच गिरफ्तारी लोकतांत्रिक है? क्या आरोप लगते ही अपराधी घोषित कर देना न्याय है? जब कानून का डर अपराधी से ज्यादा निर्दोष को सताने लगे, तब उस कानून की समीक्षा अनिवार्य हो जाती है।
आरक्षण व्यवस्था इस देश के सामाजिक न्याय का एक अहम स्तंभ है। अगड़े वर्ग ने पिछले कई दशकों में इसे स्वीकार किया है। लेकिन आरक्षण समान अवसर के लिए है, प्रतिशोध के लिए नहीं और असीम अधिकार के लिए नहीं। किसी भी समूह को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता है कि वह किसी दूसरे को झूठे कानूनी विवादों में फंसा दे।
बार-बार हजारों साल के शोषण की बात की जाती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आज का भारत वही भारत है? क्या आज लोकतंत्र, संसद, न्यायपालिका और मीडिया मौजूद नहीं है? यदि अतीत के अन्याय का बदला वर्तमान में लिया जाएगा, तो यह “आंख के बदले आंख” वाला सिद्धांत लागू हो जाएगा और समाज अंधा हो जाएगा।
आज का दुर्भाग्य यह है कि कोई भी आंकड़ों पर बात नहीं करना चाहता है। शोषण कौन कर रहा है? शोषण किसका हो रहा है? इन सवालों का जवाब भावनाओं से नहीं, सिर्फ आंकड़ों से मिल सकता है, और जैसे ही आंकड़े सामने आते हैं, कई स्थापित धारणाएं टूट जाती हैं।
जब आबादी के आधार पर अधिकार तय करने की बात होती है, तो यह संविधान की भावना के खिलाफ जाती है। यदि यही तर्क लागू हुआ, तो अल्पसंख्यकों को और विशेषाधिकार देने होंगे। सामाजिक संतुलन और बिगड़ेगा, इसलिए यह रास्ता समाधान नहीं है, बल्कि नए विवादों को जन्म देगा।
केंद्र सरकार 2047 तक विकसित भारत का सपना दिखा रही है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या एक विकसित भारत में भी जातिगत भय, कानूनी आतंक और अतीत की गांठों के साथ प्रवेश करेंगे? या फिर न्याय को निष्पक्ष बनाएंगे। कानून को मानवीय बनाएंगे और लोकतंत्र को भरोसेमंद बनाएंगे।
UGC विवाद ने भारत को एक ऐतिहासिक अवसर दिया है। या तो साहसिक समीक्षा करें, निष्पक्ष कानून बनाएं और निर्दोष को सुरक्षा दें या फिर आने वाले दशकों तक यही विवाद, यही तनाव और यही अविश्वास झेलते रहें। अब फैसला टालने का समय नहीं है। अब फैसला करने का समय है।
भारत का संविधान केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक नैतिक अनुबंध है, राज्य और नागरिक के बीच। जब भी कोई नया कानून या नियम बनता है, तो उसे चार मूल संवैधानिक स्तंभों पर परखा जाता है। पहला समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14), दूसरा जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21), तीसरा निष्पक्ष प्रक्रिया (Due Process of Law) और चौथा प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Natural Justice)। UGC द्वारा प्रस्तावित नियमों पर विवाद इसलिए खड़ा हुआ है, क्योंकि इन नियमों में प्रक्रिया से अधिक दंडात्मक प्रवृत्ति दिखाई देती है। संविधान यह अनुमति नहीं देता है कि किसी भी नागरिक को सिर्फ आरोप के आधार पर दोषी की तरह ट्रीट किया जाए।
अनुच्छेद 14 कहता है कि “राज्य किसी भी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं करेगा।” यहां समानता का अर्थ समान व्यवहार नहीं है बल्कि समान संरक्षण है। यदि कोई नियम ऐसा है, जो एक वर्ग को शिकायतकर्ता के रूप में असीम शक्ति दे और दूसरे वर्ग को आरोपी बनते ही अधिकारहीन कर दे, तो वह समानता नहीं, बल्कि संवैधानिक असंतुलन है। UGC नियमों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वे शिकायत और अपराध के बीच की दूरी को खतरनाक रूप से कम कर देता है।
सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह चुका है कि अनुच्छेद 21 का अर्थ केवल जीवित रहना नहीं है, बल्कि गरिमा, प्रतिष्ठा, आजीविका और मानसिक शांति भी इसमें शामिल हैं। अब सोचने की बात है कि अगर किसी शिक्षक, प्रोफेसर या कर्मचारी पर बिना ठोस जांच के कार्रवाई होती है, तो उसका करियर खत्म होता है। सामाजिक प्रतिष्ठा नष्ट होती है और परिवार मानसिक यातना झेलता है, और बाद में वह निर्दोष साबित हो जाए तो क्या राज्य उसकी छिनी हुई गरिमा लौटा सकता है?
प्राकृतिक न्याय के दो बुनियादी सिद्धांत होता हैं। पहला Alteram Partem- दूसरे पक्ष को सुना जाए और दूसरा Judex in Causa Sua- कोई खुद अपने मामले में जज न बने। UGC के विवादित नियमों में सबसे बड़ा खतरा यही था कि शिकायतकर्ता की बात को प्राथमिक सत्य मान लिया जाता। आरोपी को सफाई का पूरा अवसर नहीं मिलता और प्रशासनिक कार्रवाई जांच से पहले शुरू हो जाती। यह प्रक्रिया न्याय नहीं, बल्कि संस्थागत पूर्वाग्रह बन जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल इन नियमों पर रोक लगाकर यह संकेत दिया है कि “मामला सिर्फ नीति का नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा का है।” लेकिन इतिहास बताता है कि जब-जब अदालत ने आधे-अधूरे समाधान दिए, तब-तब विवाद लंबे समय तक सुलगते रहे। अब अदालत के सामने अवसर है कि वह गिरफ्तारी-प्रधान कानूनों पर स्पष्ट दिशा दे। ‘आरोप अपराध’ को कानूनी सिद्धांत के रूप में स्थापित करे और यह तय करे कि सामाजिक न्याय और व्यक्तिगत स्वतंत्रता में संतुलन कैसे बने।
SC/ST Act पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी (2018)- अदालत ने कहा था कि “कानून का दुरुपयोग सामाजिक न्याय को कमजोर करता है।” हालांकि बाद में राजनीतिक दबाव में संशोधन हुआ, लेकिन यह फैसला यह दिखाता है कि अदालत खुद इस खतरे को पहचानती है।
DK Basu बनाम राज्य (1997)- इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी पर सख्त दिशानिर्देश दिए थे, क्योंकि “अनियंत्रित गिरफ्तारी लोकतंत्र के लिए जहर है।” UGC विवाद उसी चेतावनी का नया संस्करण है।
भारत में गिरफ्तारी अब जांच का अंतिम चरण नहीं बल्कि पहला कदम बन चुकी है। यह प्रवृत्ति पुलिस को ताकतवर बनाती है, निर्दोष को कमजोर और न्याय को धीमा। UGC नियम इसी गिरफ्तारी संस्कृति को वैधता देने की ओर बढ़ते दिखता है।
अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र में अमेरिका विश्वविद्यालयों में शिकायत तंत्र है, लेकिन Due Process सर्वोपरि है और आरोपी को पूरा अवसर मिलता है। ब्रिटेन में जांच स्वतंत्र होती है और प्रशासनिक कार्रवाई अंतिम निष्कर्ष के बाद होती है। जर्मनी में झूठी शिकायत पर कठोर दंड मिलता है ताकि सिस्टम का दुरुपयोग न हो सके। भारत में समस्या यह है कि अधिकार तो आयात कर लेते हैं लेकिन जिम्मेदारी नहीं।
विश्वविद्यालय में बहस के स्थान होते हैं। असहमति के मंच और विचारों की प्रयोगशाला है। यदि यहां हर निर्णय डर से लिया जाए और हर संवाद कानूनी जोखिम बन जाए तो शिक्षा नहीं, चुप्पी पैदा होगी। UGC नियमों पर विरोध सिर्फ नौकरी का नहीं, बल्कि अकादमिक स्वतंत्रता का भी है।
हर बार जब ऐसे कानूनों पर बहस होती है तो राजनीति तुरंत इसे जातीय रंग दे देती है। वोट बैंक हावी हो जाता है और तर्क पीछे छूट जाता है। UGC विवाद में भी यही हो रहा है। जब तक इसे राजनीतिक लाभ से ऊपर और राष्ट्रीय हित के स्तर पर नहीं देखा जाएगा तब तक समाधान असंभव है।
UGC विवाद अब केवल नियमों का मुद्दा नहीं है। यह प्रश्न है कि क्या भारत आरोप-आधारित न्याय चाहता है? या प्रमाण-आधारित लोकतंत्र? सुप्रीम कोर्ट, सरकार और समाज तीनों को मिलकर यह तय करना होगा कि 2047 का भारत भय से चलेगा या भरोसे से।
