अंधेरे में जीता एक नाम है - फिल्म ‘कैनेडी’

Jitendra Kumar Sinha
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भारतीय सिनेमा में जब भी स्याह, बेचैन और आत्मा तक उतर जाने वाली कहानियों की बात होती है, तो “कैनेडी” Kennedy का नाम खास तौर पर उभरता है। यह फिल्म केवल एक क्राइम थ्रिलर नहीं है, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति की आंतरिक टूटन, व्यवस्था की सड़ांध और नैतिक धुंधलके की कहानी है, जो दिन और रात के बीच कहीं अटका हुआ है।


फिल्म की कहानी उदय शेट्टी नाम के एक ऐसे शख्स के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसे आधिकारिक रिकॉर्ड में मृत घोषित कर दिया गया है। लेकिन हकीकत में वह जिंदा है और पहले से कहीं ज्यादा अकेला, थका हुआ और खतरनाक। अब वह “कैनेडी” के नाम से जाना जाता है। 


उदय को नींद न आने की बीमारी (इंसोमनिया) है, जो उसकी मानसिक स्थिति और जीवन के अंधेरे को और गहरा कर देती है। नींद से वंचित यह इंसान दिन में टैक्सी चलाता है और रात में उसी पुलिस व्यवस्था के लिए किराये का किलर बन जाता है, जो कभी उसका हिस्सा थी।


“कैनेडी” की जिन्दगी दो हिस्सों में बंटी है, दिन और रात। दिन में वह आम लोगों के बीच रहता है, टैक्सी चलाता है, शहर की धड़कन को महसूस करता है। रात में वही आदमी पुलिस के इशारों पर अपराधियों को मारने वाला एक “जरूरी हथियार” बन जाता है। सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि वह यह सब क्यों कर रहा है? क्या यह सिर्फ मजबूरी है, या फिर किसी बड़े मकसद की तैयारी? फिल्म धीरे-धीरे इस राज की परतें खोलती है और दर्शक को लगातार बेचैन रखती है।


‘कैनेडी’ केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि एक भ्रष्ट पुलिस तंत्र और सड़े हुए सिस्टम की परतें भी खोलती है। यहां पुलिस कानून की रक्षक नहीं, बल्कि सौदेबाज बन चुकी है। “कैनेडी” उसी सिस्टम का शिकार भी है और औजार भी। वह जानता है कि वह गलत कर रहा है, लेकिन उसे यह भी पता है कि इस दलदल से बाहर निकलने का रास्ता आसान नहीं है।


मुख्य भूमिका में Rahul Bhat ने “कैनेडी” के किरदार को जिस गहराई से निभाया है, वही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। उनकी आंखों में लगातार दिखने वाली थकान, अकेलापन और भीतर जमा हुआ गुस्सा संवादों से कहीं ज्यादा बोलता है। सहायक कलाकारों में आमिर दलवी, मोहित ताकलकर और अन्य कलाकार कहानी को मजबूती देते हैं, लेकिन केंद्र में हमेशा “कैनेडी” ही रहता है।


निर्देशक Anurag Kashyap एक बार फिर अपने चिर-परिचित डार्क और नोयर स्टाइल में लौटते हैं। बारिश से भीगी सड़कें, नीली-पीली रोशनी, तंग गलियां और बेचैन कैमरा मूवमेंट, सब मिलकर एक ऐसा माहौल रचता है, जिसमें दर्शक खुद को भी उस अंधेरे का हिस्सा महसूस करने लगता है। कश्यप यहां मनोरंजन से ज्यादा अनुभव पर भरोसा करते हैं, और यही फिल्म को अलग बनाता है।


इंसोमनिया सिर्फ एक बीमारी नहीं है, बल्कि कैनेडी की मानसिक स्थिति का प्रतीक है। वह सो नहीं सकता है, क्योंकि शायद उसका जमीर उसे चैन नहीं लेने देता है। रातें उसके लिए काम का समय हैं, लेकिन वही रातें उसे अंदर से तोड़ भी देती हैं। यह फिल्म मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी दर्शक को सोचने पर मजबूर करती है।


‘कैनेडी’ हर दर्शक के लिए बनी फिल्म नहीं है। यह तेज रफ्तार मसाला थ्रिलर नहीं है, बल्कि धीमी, गहरी और बेचैन करने वाली कहानी है।



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