भारतीय पंचांग में चैत्र मास को विशेष महत्व प्राप्त है। यह वह समय होता है जब प्रकृति में नवजीवन का संचार होता है, पेड़-पौधे नई हरियाली से भर जाता है और मौसम में एक विशेष प्रकार की ताजगी महसूस होती है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में चैत्र मास को नए आरंभ का प्रतीक माना गया है। चैत्र शुक्ल पक्ष से ही हिन्दू नववर्ष की शुरुआत मानी जाती है। इस अवधि में कई महत्वपूर्ण धार्मिक पर्व आते हैं जो न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र हैं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
चैत्र मास में मनाया जाने वाला चैती छठ सूर्य उपासना का अत्यंत पवित्र और प्राचीन पर्व है। भारत की सनातन परंपरा में सूर्य को प्रत्यक्ष देवता माना गया है, जिन्हें प्रतिदिन देखा और अनुभव किया जा सकता है। इसी कारण सूर्य की पूजा का विशेष महत्व है। छठ पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, सूर्य ऊर्जा और जीवन के बीच गहरे संबंध का प्रतीक भी है। इस पर्व से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं, जो इसकी महत्ता और आध्यात्मिक शक्ति को दर्शाती हैं।
22 मार्च से चैती छठ का पावन पर्व आरंभ हो रहा है। चार दिनों तक चलने वाला यह व्रत सूर्य देव और छठी मैया की आराधना का महान पर्व है। इसके बाद इसी महीने में रामनवमी, कामदा एकादशी और चैत्र पूर्णिमा जैसे कई महत्वपूर्ण पर्व होता है। यह पूरा महीना भारतीय समाज में आस्था, अनुशासन, तपस्या और भक्ति का प्रतीक बन जाता है।
चैती छठ बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में विशेष रूप से मनाया जाने वाला अत्यंत पवित्र पर्व है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की आराधना के लिए समर्पित है। अधिकांश लोग छठ पर्व को कार्तिक महीने में मनाते हैं, लेकिन चैत्र मास में भी इसी विधि से छठ मनाया जाता है, जिसे चैती छठ कहा जाता है। यह पर्व चार दिनों तक चलता है और इसमें कठोर व्रत, नियम और शुद्धता का पालन किया जाता है। चैती छठ के दौरान व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं और सूर्य देव को अर्घ्य देकर परिवार की सुख-समृद्धि और संतानों की उन्नति की कामना करते हैं।
इस वर्ष चैती छठ का पर्व 22 मार्च को नहाय खाय, 23 मार्च को खरना, 24 मार्च को अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य और 25 मार्च को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य और व्रत का पारण मनाया जाएगा। चार दिनों तक चलने वाला यह पर्व अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसमें परिवार तथा समाज के सभी लोग मिलकर भाग लेते हैं।
छठ पर्व का पहला दिन नहाय-खाय कहलाता है। इस दिन व्रती सुबह जल्दी उठकर नदी, तालाब या घर में गंगाजल से स्नान करते हैं। इसके बाद घर की पूरी तरह सफाई की जाती है। नहाय-खाय का अर्थ है, शुद्ध होकर सात्विक भोजन करना। इस दिन व्रती कद्दू-भात और चने की दाल का प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह भोजन पूरी तरह सात्विक और शुद्ध होता है। मान्यता है कि इसी भोजन के साथ व्रती अगले दिन से कठिन व्रत की शुरुआत करते हैं।
छठ पर्व का दूसरा दिन खरना कहलाता है। इस दिन व्रती पूरे दिन उपवास रखते हैं और शाम को सूर्यास्त के बाद विशेष पूजा करते हैं। खरना के दिन बनने वाले प्रसाद में मुख्य रूप से शामिल होते हैं गुड़ की खीर, रोटी, केला और दूध। पूजा के बाद व्रती सबसे पहले प्रसाद ग्रहण करते हैं और उसके बाद इसे परिवार तथा पड़ोसियों में बांटा जाता है। खरना के बाद व्रती 36 घंटे का निर्जला उपवास रखते हैं, जो छठ पर्व की सबसे कठिन तपस्या मानी जाती है।
छठ पर्व का तीसरा दिन सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन व्रती शाम के समय नदी, तालाब या घाट पर जाकर डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देने के लिए बांस के सूप में कई प्रकार के प्रसाद रखे जाते हैं जिसमें ठेकुआ, फल, गन्ना, नारियल, अदरक, नींबू शामिल रहता है। पूरा वातावरण भक्ति गीतों से गूंज उठता है। महिलाएं छठी मैया के गीत गाती हैं और सूर्य देव से परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
छठ पर्व का अंतिम दिन सबसे भावुक और आध्यात्मिक क्षणों से भरा होता है। इस दिन सुबह सूर्योदय से पहले व्रती घाट पर पहुंच जाते हैं और उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देते हैं। अर्घ्य देने के बाद व्रती छठी मैया से प्रार्थना करते हैं और परिवार के कल्याण की कामना करते हैं। इसके बाद व्रत का पारण किया जाता है।
छठ पर्व की सबसे प्रसिद्ध कथा महाभारत काल से जुड़ी हुई है। महाभारत के अनुसार, कर्ण भगवान सूर्य के पुत्र थे। कर्ण अत्यंत पराक्रमी, दानवीर और महान योद्धा थे। कहा जाता है कि कर्ण प्रतिदिन सूर्य देव की पूजा करते थे और घंटों तक कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। उनकी इस कठोर तपस्या से सूर्य देव अत्यंत प्रसन्न रहते थे और उन्हें अद्भुत शक्ति प्रदान करते थे। कर्ण की सूर्य भक्ति ही आगे चलकर छठ पर्व की परंपरा का आधार बनी। माना जाता है कि जिस प्रकार कर्ण सूर्य को अर्घ्य देते थे, उसी प्रकार आज भी छठ पर्व के दौरान व्रती जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस कथा के अनुसार छठ पर्व सूर्य उपासना की वही परंपरा है जो हजारों वर्षों से चली आ रही है।
छठ पर्व से जुड़ी दूसरी प्रमुख कथा रामायण काल से संबंधित है। जब भगवान राम ने रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त की, तब वे माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या लौटे। अयोध्या आने के बाद भगवान राम और माता सीता ने राज्य के कल्याण और सुख-समृद्धि के लिए सूर्य देव की पूजा की। कहा जाता है कि उन्होंने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन सूर्य देव की आराधना की थी। उन्होंने व्रत रखा और सूर्य देव को अर्घ्य दिया। इसके बाद सप्तमी के दिन पुनः उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का पारण किया। इसी घटना को छठ पर्व की परंपरा की शुरुआत माना जाता है। कुछ विद्वान मानते हैं कि इसी परंपरा को बाद में जनसामान्य ने अपनाया और यह पर्व व्यापक रूप से मनाया जाने लगा।
महाभारत में एक और कथा छठ पर्व से जुड़ी हुई बताई जाती है। जब पांडवों को जुए में हार के कारण वनवास मिला, तब उन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। वनवास के दौरान उनके पास भोजन और संसाधनों की भी कमी हो गई थी। तब द्रौपदी ने सूर्य देव की उपासना करने का संकल्प लिया। उन्होंने कठोर व्रत रखा और सूर्य देव की पूजा की। द्रौपदी की तपस्या से प्रसन्न होकर सूर्य देव ने उन्हें अक्षय पात्र प्रदान किया। इस पात्र की विशेषता यह थी कि उसमें से भोजन कभी समाप्त नहीं होता था। जब तक द्रौपदी भोजन नहीं कर लेती थीं, तब तक उस पात्र से असीमित भोजन निकलता रहता था। इस प्रकार पांडवों की भोजन की समस्या समाप्त हो गई। कहा जाता है कि इसी कारण सूर्य देव की आराधना से जुड़े इस व्रत को अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है।
छठ पर्व से जुड़ी एक अत्यंत लोकप्रिय कथा राजा प्रियव्रत की है। प्राचीन समय में प्रियव्रत नामक एक राजा थे। उनकी पत्नी का नाम मालिनी था। राजा और रानी के पास सब कुछ था, लेकिन उन्हें संतान सुख प्राप्त नहीं था। इस कारण वे बहुत दुखी रहते थे। एक दिन महर्षि कश्यप उनके महल में आए। राजा ने अपनी समस्या ऋषि को बताई। तब महर्षि कश्यप ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ करने की सलाह दी। यज्ञ के बाद रानी मालिनी को प्रसाद दिया गया, जिसके प्रभाव से उन्हें पुत्र प्राप्त हुआ। लेकिन दुर्भाग्यवश जन्म लेते ही वह बालक मृत हो गया। अपने पुत्र को मृत देखकर राजा और रानी अत्यंत दुखी हो गए। राजा प्रियव्रत अपने पुत्र के शव को लेकर श्मशान पहुंच गए और वहीं विलाप करने लगे। उसी समय आकाश से एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ। उस प्रकाश से छठी मैया प्रकट हुईं। उन्होंने राजा से कहा कि वे ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं और सृष्टि की रक्षा के लिए पृथ्वी पर आई हैं। छठी मैया ने राजा को छठ व्रत करने का निर्देश दिया। राजा ने श्रद्धा और विश्वास के साथ छठ व्रत किया। छठी मैया उनकी भक्ति से प्रसन्न हुईं और उनके मृत पुत्र को पुनर्जीवित कर दिया। तब से छठ व्रत को संतान प्राप्ति और संतान की रक्षा के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है।
छठ पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक ही नहीं है, बल्कि इसका वैज्ञानिक महत्व भी है। सूर्य को जीवन का आधार माना जाता है। सूर्य की किरणों में कई प्रकार के ऊर्जा तत्व होते हैं जो शरीर के लिए लाभदायक होते हैं। छठ पर्व के दौरान सूर्यास्त और सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। उस समय सूर्य की किरणें सबसे अधिक लाभकारी होती हैं। इसके अलावा उपवास और शुद्ध भोजन से शरीर का विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाता है और शरीर स्वस्थ रहता है।
छठ पर्व केवल सूर्य की पूजा तक सीमित नहीं है। इसमें छठी मैया की भी पूजा की जाती है। छठी मैया को प्रकृति की देवी और संतान की रक्षक माना जाता है। कुछ मान्यताओं के अनुसार छठी मैया भगवान सूर्य की बहन हैं। इसलिए सूर्य पूजा के साथ उनकी पूजा भी की जाती है। छठी मैया को मातृत्व, संरक्षण और जीवन की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। उनकी कृपा से परिवार में सुख-समृद्धि और संतानों का कल्याण होता है।
सूर्य पूजा की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन है। वेदों में भी सूर्य देव की महिमा का वर्णन मिलता है। ऋग्वेद में सूर्य को संसार का प्रकाश और जीवन का स्रोत बताया गया है। सूर्य देव को स्वास्थ्य, ऊर्जा और जीवन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। छठ पर्व इसी वैदिक परंपरा का विस्तार है।
छठ व्रत को अत्यंत कठिन और पवित्र व्रत माना जाता है। इसमें व्रती को कई नियमों का पालन करना पड़ता है। शुद्धता, सात्विक भोजन, संयम और निर्जला उपवास। इन नियमों का पालन करने से मन और शरीर दोनों शुद्ध होते हैं। छठ पर्व आत्मसंयम, अनुशासन और भक्ति का संदेश देता है।
चैती छठ केवल एक धार्मिक पर्व नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की गहरी आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है। कर्ण की सूर्य भक्ति, राम और सीता की पूजा, द्रौपदी की तपस्या और राजा प्रियव्रत की कथा। ये सभी कहानियां यह सिखाती हैं कि सच्ची श्रद्धा और विश्वास से जीवन की कठिनाइयों को दूर किया जा सकता है। छठ पर्व प्रकृति, सूर्य ऊर्जा और मानव जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने का संदेश देता है। इसी कारण यह पर्व आज भी करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र बना हुआ है।
छठ पर्व बिहार की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है। बिहार से बाहर रहने वाले लोग भी इस पर्व को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और विदेशों में भी छठ पर्व मनाया जाता है। घाटों पर हजारों लोग एकत्रित होकर सूर्य देव की पूजा करते हैं। यह पर्व समाज में भाईचारे और एकता का संदेश देता है।
चैत्र मास में छठ पर्व के बाद आने वाला अगला महत्वपूर्ण पर्व रामनवमी है। इस वर्ष 27 मार्च को पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र के शुभ संयोग में रामनवमी मनाई जाएगी। रामनवमी भगवान श्रीराम के जन्मदिन के रूप में मनाई जाती है। हिन्दू धर्म में भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। उन्होंने अपने जीवन में आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श पति और आदर्श राजा का उदाहरण प्रस्तुत किया। रामनवमी के दिन मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना होती है। रामचरितमानस और रामायण का पाठ किया जाता है। भक्तगण भगवान राम के जन्मोत्सव को बड़े उत्साह के साथ मनाते हैं। अयोध्या में इस दिन भव्य आयोजन होता है और लाखों श्रद्धालु वहां पहुंचते हैं।
चैत्र मास में आगे भी कई महत्वपूर्ण धार्मिक तिथियां आती हैं। 29 मार्च को कामदा एकादशी व्रत है। यह एकादशी व्रत सभी मनोकामनाओं को पूरा करने वाली मानी जाती है।
चैत्र मास में 2 अप्रैल को चैत्र पूर्णिमा है। यह दिन भी अत्यंत पवित्र माना जाता है। इस दिन गंगा स्नान और दान-पुण्य का विशेष महत्व होता है।
चैत्र मास भारतीय संस्कृति में आस्था, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का प्रतीक है। चैती छठ से लेकर रामनवमी और चैत्र पूर्णिमा तक पूरे महीने में धार्मिक उत्सवों की श्रृंखला चलती रहती है। ये पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान, अनुशासन, संयम और भक्ति का संदेश देता है।
