नवरात्र का दिव्य आरंभ होता है - माँ शैलपुत्री की प्रथम पूजा

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना

भारत की सनातन परंपरा में नवरात्र केवल एक पर्व नहीं है, बल्कि आत्मशुद्धि, साधना और शक्ति के जागरण का महापर्व है। वर्ष में दो बार आने वाले नवरात्र “चैत्र और शारदीय” विशेष महत्व रखते हैं। इनमें से चैत्र नवरात्र वसंत ऋतु के आगमन के साथ प्रकृति के नवजीवन और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। इस पावन पर्व का आरंभ कलश स्थापना और माँ शैलपुत्री की पूजा से होता है। नवरात्र के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है, जिन्हें नवदुर्गा कहा जाता है।


चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नवरात्र प्रारंभ होते हैं और नवमी तक चलते हैं। यह काल हिन्दू नववर्ष का भी आरंभ माना जाता है, जिससे इसका महत्व और बढ़ जाता है। यह पर्व यह संदेश देता है कि जीवन में हर अंधकार के बाद प्रकाश आता है। साधना और संयम से आत्मबल बढ़ता है। प्रकृति और मानव का संबंध गहरा होता है।


नवरात्र का पहला और सबसे महत्वपूर्ण कार्य है कलश स्थापना (घटस्थापना)। पूजा घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व दिशा) में कलश स्थापित करना शुभ माना जाता है। यह दिशा देवताओं की मानी जाती है। मिट्टी के पात्र में जौ (जवारे) बोए जाते हैं। उस पर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है। कलश के ऊपर नारियल और आम के पत्ते रखे जाते हैं। कलश सृष्टि का प्रतीक है। जल जीवन का। नारियल ऊर्जा का और जौ विकास और समृद्धि का प्रतीक है। "शैलपुत्री" का अर्थ है पर्वत (शैल) की पुत्री। यह देवी का प्रथम स्वरूप है, जो स्थिरता, शक्ति और मूल चेतना का प्रतीक है। माँ शैलपुत्री का संबंध देवी सती और उनके पुनर्जन्म से है।


एक समय प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने सभी देवताओं को आमंत्रित किया, लेकिन अपने जामाता भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। जब देवी सती को यह ज्ञात हुआ, तो उन्होंने पिता के यज्ञ में जाने की इच्छा व्यक्त की। भगवान शिव ने उन्हें समझाया कि बिना निमंत्रण जाना उचित नहीं, लेकिन सती का मन नहीं माना। यज्ञ में पहुँचने पर किसी ने उनका सम्मान नहीं किया और दक्ष ने शिव का अपमान किया। यह सब सहन न कर पाने पर सती ने योगाग्नि में अपने शरीर का त्याग कर दिया। यह समाचार सुनकर भगवान शिव ने क्रोधित होकर यज्ञ का विध्वंस कर दिया। इसके बाद सती ने हिमालय के घर पुत्री के रूप में जन्म लिया और "शैलपुत्री" कहलायी।


माँ शैलपुत्री का वाह है वृषभ (बैल), दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल। वृषभ का अर्थ है धर्म और शक्ति। त्रिशूल का अर्थ है तीन गुण (सत्व, रज, तम) और कमल का अर्थ है पवित्रता और ज्ञान। नवरात्र के प्रथम दिन साधक अपना ध्यान मूलाधार चक्र में केंद्रित करते हैं। यह शरीर का आधार चक्र है। स्थिरता और ऊर्जा का स्रोत है और जीवन की शुरुआत इसी से होती है।माँ शैलपुत्री की पूजा से मानसिक स्थिरता मिलती है। आत्मबल बढ़ता है और साधना का मार्ग खुलता है।




नवरात्र के प्रत्येक दिन एक अलग देवी की पूजा होती है माँ शैलपुत्री, माँ ब्रह्मचारिणी, माँ चंद्रघंटा, माँ कुष्मांडा, माँ स्कंदमाता, माँ कात्यायनी, माँ कालरात्रि, माँ महागौरी और माँ सिद्धिदात्री। इन सभी स्वरूपों का अपना अलग महत्व और ऊर्जा है। नवरात्र में पूजा की शुरुआत प्रार्थना से की जाती है। इसके बाद विभिन्न स्तोत्रों और मंत्रों का पाठ किया जाता है। सप्तश्लोकी दुर्गा, दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र, दुर्गा द्वात्रिशत नाम माला, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र, किलक स्तोत्र, तंत्रोक्त रात्रिसूक्त, देवी अथर्वशीर्ष और इसके बाद नवार्ण मंत्र का 108 बार जप, तब दुर्गा सप्तशती का पाठ करना चाहिए।


यदि कोई व्यक्ति संपूर्ण पाठ नहीं कर सकता है, तो वह पहला दिन प्रथम अध्याय, दूसरा दिन दूसरा, तीसरा, चौथा अध्याय, तीसरा दिन पाँचवाँ अध्याय, चौथा दिन छठा और सातवाँ, पाँचवा दिन आठवाँ और नौवाँ, छठा दिन दसवाँ और ग्यारहवाँ, सातवाँ दिन बारहवाँ, आठवां दिन तेरहवाँ और नौवाँ दिन रहस्य पाठ करना चाहिए।


नवरात्र में शुद्ध और सात्विक भोजन का विशेष महत्व है। जिसमें गंगाजल, दूध, फल, नींबू शामिल है। फलाहार को सर्वोत्तम माना जाता है क्योंकि यह शरीर को हल्का रखता है। ध्यान और साधना में सहायक होता है। यदि कठिनाई हो तो अरवा चावल, सेंधा नमक, चने की दाल, घी से बनी सब्जी रात को एक समय ले सकते हैं। मौसम परिवर्तन के समय शरीर को हल्का भोजन चाहिए और उपवास शरीर को डिटॉक्स करता है। मन की शुद्धि, इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्मा का जागरण होता है। नवरात्र का पर्व जाति, वर्ग, और भेदभाव से ऊपर उठकर एकता का संदेश देता है। सभी लोग एक साथ पूजा करते हैं। भक्ति में समानता का भाव होता है और समाज में भाईचारा बढ़ता है। 


नवरात्र का आरंभ माँ शैलपुत्री की पूजा से होता है, जो जीवन में स्थिरता, शक्ति और नई शुरुआत का संदेश देती हैं। यह पर्व सिखाता है कि कठिनाइयों में धैर्य रखें, आत्मबल को पहचानें और जीवन में सकारात्मकता लाएं। माँ शैलपुत्री की कृपा से जीवन में सुख-शांति आती है, साधना सफल होती है और आत्मिक उन्नति होती है



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