छठी मइया - आस्था, विज्ञान और प्रकृति का अद्भुत संगम

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना

भारत की सांस्कृतिक परंपराओं में अनेक पर्व-त्योहार हैं, लेकिन छठ महापर्व का स्थान अत्यंत विशिष्ट और अद्वितीय है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि प्रकृति, अनुशासन, तपस्या और सामूहिकता का अद्भुत संगम है। “उदय का अस्त और अस्त का उदय”,  यह जीवन का गूढ़ सत्य छठ पर्व के माध्यम से सहज रूप में समझ में आता है। इस पर्व में सूर्य देव की उपासना की जाती है, जो साक्षात दिखने वाले देवता हैं। लेकिन इसके साथ ही छठी मइया की पूजा भी होती है और यही वह रहस्य है जिसे बहुत कम लोग गहराई से जानते हैं।


छठी मइया का स्वरूप अत्यंत रहस्यमय और आध्यात्मिक है। पुराणों के अनुसार, वे ब्रह्मा की मानस पुत्री हैं और सूर्य देव की बहन मानी जाती हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार, छठी मइया को “षष्ठी देवी” कहा जाता है, जो प्रकृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण में उल्लेख मिलता है कि वे सोलह माताओं में प्रमुख हैं और संतान की रक्षा तथा समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी हैं। कुछ परंपराओं में उन्हें कार्तिकेय की पत्नी भी माना गया है। इस प्रकार छठी मइया का स्वरूप केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि मातृत्व, संरक्षण और सृजन की शक्ति का प्रतीक है।


छठ पर्व सिखाता है कि जीवन में केवल उगते सूरज की पूजा नहीं, बल्कि अस्त होते सूर्य का भी सम्मान करना चाहिए। यह एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है कि जो हमें दिनभर ऊर्जा देता है, उसका सम्मान हर अवस्था में होना चाहिए। यह पर्व त्याग, तपस्या और संयम का प्रतीक है। व्रती 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखते हैं, जो मन और शरीर दोनों की शुद्धि का माध्यम है।


छठ पर्व केवल आस्था का विषय नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक आधार भी छिपा हुआ है। कार्तिक और चैत्र मास की अमावस्या के छठे दिन सूर्य की पराबैंगनी किरणें पृथ्वी पर विशेष कोण से पड़ती हैं। यह समय शरीर के लिए लाभकारी होता है, क्योंकि इस दौरान सूर्य की किरणें त्वचा और स्वास्थ्य को संतुलित करती हैं। जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देने से सूर्य की किरणें पानी से परावर्तित होकर शरीर पर पड़ती हैं, जिससे सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। छठ में प्लास्टिक या कृत्रिम वस्तुओं का प्रयोग नहीं होता है। सूप, टोकरी, फल, ठेकुआ, सब कुछ प्राकृतिक होता है, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश देता है।


महाभारत के महान योद्धा कर्ण सूर्य देव के परम भक्त थे। वे घंटों तक जल में खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। यही परंपरा आज भी छठ व्रत में जीवित है। जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हार गए थे, तब द्रौपदी ने श्रीकृष्ण के कहने पर छठ व्रत रखा। इसके प्रभाव से पांडवों को उनका राज्य वापस मिला। लंका विजय के बाद भगवान राम और माता सीता ने अयोध्या लौटकर छठ व्रत किया और सूर्य देव की आराधना की।





छठ महापर्व में पहले दिन व्रती नदी या तालाब में स्नान कर शुद्ध भोजन ग्रहण करते हैं कद्दू-भात, चने की दाल आदि। दूसरे दिन पूरे दिन उपवास के बाद शाम को गुड़ की खीर और रोटी का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। इसके बाद निर्जला व्रत शुरू होता है। तीसरे दिन डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यह अद्भुत दृश्य घाटों पर लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में दिव्य बन जाता है। चौथे दिन उगते सूर्य को अर्घ्य देकर व्रत का समापन होता है।


छठ पर्व पूरी तरह प्रकृति से जुड़ा हुआ है। इसमें उपयोग होने वाले हर तत्व जल, सूर्य, मिट्टी, फल, सब प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाना,पर्यावरण की रक्षा करना और सरल जीवन जीना। छठ महापर्व में जाति, वर्ग, अमीरी-गरीबी का कोई भेद नहीं होता है। सभी लोग एक साथ घाट पर खड़े होकर पूजा करते हैं। यह सामाजिक एकता का अद्भुत उदाहरण है। छठ व्रत को सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। 36 घंटे निर्जला उपवास शुद्धता और पवित्रता का पालन, मानसिक और शारीरिक संयम। यह व्रत व्यक्ति को आत्मनियंत्रण और आंतरिक शक्ति का अनुभव कराता है।


छठी मइया केवल एक देवी नहीं है, बल्कि मातृत्व का प्रतीक, संतानों की रक्षक, समृद्धि और सुख की दात्री है। उनकी पूजा से परिवार में सुख-शांति और स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। आज के व्यस्त और भौतिकवादी जीवन में छठ पर्व प्रकृति से जोड़ता है। मानसिक शांति देता है। परिवार और समाज को एक करता है। 


छठ महापर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है, बल्कि जीवन जीने की एक कला है। इसमें आस्था है, विज्ञान है, अनुशासन है और प्रकृति के प्रति सम्मान है। छठी मइया का स्वरूप यह सिखाता है कि सच्ची भक्ति केवल पूजा में नहीं है, बल्कि जीवन के हर कर्म में होनी चाहिए। यह पर्व याद दिलाता है कि जो अस्त होता है, वही पुनः उदय भी होता है और यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।





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