स्कूलों में मोबाइल पर रोक - क्या यह शिक्षा के लिए जरूरी कदम है?

Jitendra Kumar Sinha
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दुनिया तेजी से डिजिटल होती जा रही है, लेकिन इसके साथ ही इसके दुष्प्रभाव भी सामने आ रहे हैं। हाल ही में यूनेस्को की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया के लगभग 58% देशों ने स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर आंशिक या पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। यह निर्णय छात्रों के अध्ययन में बढ़ती बाधाओं, ध्यान भटकने और ऑनलाइन खतरों को देखते हुए लिया गया है। यह रिपोर्ट वैश्विक शिक्षा निगरानी टीम द्वारा जारी की गई है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि मोबाइल फोन अब केवल संचार का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह छात्रों के मानसिक और सामाजिक विकास को भी प्रभावित कर रहा है।


स्कूलों में मोबाइल फोन का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह छात्रों का ध्यान पढ़ाई से हटाता है। कक्षा के दौरान सोशल मीडिया, गेम्स और चैटिंग में व्यस्त रहने से उनकी एकाग्रता कमजोर होती है। शिक्षकों का भी मानना है कि मोबाइल के कारण कक्षा का अनुशासन प्रभावित होता है। छात्र पढ़ाई की बजाय स्क्रीन पर अधिक समय बिताने लगते हैं, जिससे उनकी शैक्षणिक प्रदर्शन में गिरावट देखी जाती है। इसलिए कई देशों ने यह माना है कि स्कूल एक ऐसा स्थान होना चाहिए जहां छात्र पूरी तरह से सीखने पर ध्यान केंद्रित करें, न कि डिजिटल विचलनों में उलझें।


मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग के साथ ऑनलाइन खतरों में भी वृद्धि हुई है। खासकर किशोरों के बीच साइबर बुलिंग एक गंभीर समस्या बनकर उभरी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे Instagram पर छात्रों को ट्रोलिंग, अपमानजनक टिप्पणियों और तुलना का सामना करना पड़ता है। इससे उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है और कई बार मानसिक तनाव या अवसाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया का अधिक उपयोग किशोरियों के लिए विशेष रूप से हानिकारक है, क्योंकि वे बाहरी रूप-रंग और सामाजिक स्वीकार्यता को लेकर अधिक संवेदनशील होती हैं।


एक शोध के अनुसार, 32% किशोरियों ने बताया है कि Instagram का उपयोग करने के बाद वे अपने शरीर को लेकर अधिक नकारात्मक महसूस करने लगी। इसके अलावा, रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि सोशल मीडिया के कारण खान-पान से जुड़े विकार (Eating Disorders) की संभावना किशोरियों में किशोरों की तुलना में दोगुनी हो जाती है। यह आंकड़े इस बात को दर्शाते हैं कि मोबाइल और सोशल मीडिया का प्रभाव केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी गहराई से प्रभावित कर रहा है।


दुनिया के कई देशों ने इस समस्या से निपटने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। कुछ देशों में स्कूल परिसर में मोबाइल पूरी तरह प्रतिबंधित है, जबकि कुछ में सीमित उपयोग की अनुमति दी गई है। उदाहरण के तौर पर, कुछ यूरोपीय देशों ने प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में मोबाइल फोन पर पूर्ण रोक लगा दी है। वहीं, कुछ देशों में केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही मोबाइल उपयोग की अनुमति है। भारत में भी इस विषय पर चर्चा तेज हो रही है, और कई राज्यों ने स्कूलों में मोबाइल उपयोग को नियंत्रित करने के लिए दिशानिर्देश जारी किए हैं।


मोबाइल फोन पर प्रतिबंध लगाने के कई फायदे हैं, लेकिन इसके कुछ नकारात्मक पहलू भी हो सकते हैं। मोबाइल फोन आज शिक्षा का एक महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। ऑनलाइन लर्निंग, डिजिटल कंटेंट और शैक्षणिक ऐप्स के माध्यम से छात्र नई-नई चीजें सीख सकते हैं। ऐसे में पूरी तरह प्रतिबंध लगाने से इन अवसरों का नुकसान हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पूरी तरह रोक लगाने के बजाय संतुलित उपयोग की नीति अपनानी चाहिए, जहां मोबाइल का उपयोग केवल पढ़ाई और आवश्यक कार्यों के लिए किया जाए।


स्कूलों में मोबाइल फोन पर रोक लगाने का फैसला एक महत्वपूर्ण और जरूरी कदम हो सकता है, लेकिन इसका उद्देश्य छात्रों को तकनीक से दूर करना नहीं, बल्कि उसका सही उपयोग सिखाना होना चाहिए। आज के डिजिटल युग में यह आवश्यक है कि बच्चों को तकनीक के फायदे और नुकसान दोनों के बारे में जागरूक किया जाए। स्कूल, अभिभावक और सरकार मिलकर एक ऐसा वातावरण बना सकते हैं, जहां तकनीक का उपयोग शिक्षा के लिए हो, न कि बाधा के रूप में। समाधान प्रतिबंध में नहीं, बल्कि संतुलन और समझदारी में है।



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