वैश्विक उथल-पुथल और भारत की चिंता

Jitendra Kumar Sinha
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पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, बढ़ती भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता का असर अब दुनिया के लगभग हर देश पर दिखने लगा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने लगी हैं, होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर तनाव बढ़ रहा है, वैश्विक शेयर बाजारों में गिरावट देखी जा रही है और भारतीय रुपया भी दबाव में है। यह स्थिति केवल आर्थिक आंकड़ों की हलचल नहीं है, बल्कि यह एक गहरे और व्यापक संकट का संकेत है। इस संकट का प्रभाव भारत में केवल बड़े उद्योगों या शेयर बाजारों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह देश के सात सितारा होटलों से लेकर गाँव की साधारण रसोई तक महसूस किया जा सकता है। ऊर्जा की कीमतें बढ़ने का अर्थ है परिवहन महंगा होना, खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि, उत्पादन लागत में बढ़ोतरी और अंततः आम नागरिक की जेब पर बोझ। यह स्थिति डरावनी भले न हो, लेकिन निस्संदेह चिंताजनक अवश्य है।

पश्चिम एशिया, जिसे अक्सर मध्य पूर्व भी कहा जाता है, विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इसका सबसे बड़ा कारण है यहां मौजूद विशाल तेल और गैस भंडार। सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे देश वैश्विक ऊर्जा बाजार में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। दुनिया के लगभग एक-तिहाई से अधिक तेल भंडार इसी क्षेत्र में स्थित हैं। इसके अलावा यह क्षेत्र यूरोप, एशिया और अफ्रीका को जोड़ने वाले समुद्री और व्यापारिक मार्गों का केंद्र भी है। होर्मुज जलडमरूमध्य, बाब-अल-मंदेब और स्वेज नहर जैसे मार्ग वैश्विक व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। जब भी इस क्षेत्र में संघर्ष बढ़ता है, उसका असर सीधे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।

होर्मुज जलडमरूमध्य को दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा लाइनों में से एक माना जाता है। यह फारस की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ता है और इसी मार्ग से विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल का परिवहन होता है। यदि इस मार्ग में किसी प्रकार का अवरोध उत्पन्न होता है तो उसका असर तुरंत वैश्विक तेल बाजार पर पड़ता है। इतिहास बताता है कि जब भी इस मार्ग पर तनाव बढ़ा है, तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। भारत के लिए यह मार्ग और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात करता है और उसका बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है।

जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो उसका असर केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता है। यह परिवहन लागत, कृषि उत्पादन, उद्योग और सेवाओं तक हर क्षेत्र को प्रभावित करता है। भारत जैसे विकासशील देश के लिए तेल की कीमतों में वृद्धि का अर्थ है आयात बिल में वृद्धि, चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी, रुपये पर दबाव और महंगाई में वृद्धि। यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक 100 डॉलर के आसपास रहती हैं तो भारत की आर्थिक योजनाओं पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

वैश्विक अस्थिरता का असर अक्सर मुद्रा बाजारों पर भी दिखाई देता है। जब निवेशक अनिश्चितता महसूस करते हैं तो वे उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पूंजी निकालकर सुरक्षित निवेश की ओर चले जाते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि रुपये जैसी मुद्राओं पर दबाव बढ़ जाता है। रुपये का कमजोर होना कई समस्याएं पैदा करता है। जैसे आयात महंगा हो जाता है। विदेशी कर्ज की लागत बढ़ जाती है। महंगाई का दबाव बढ़ता है। भारत जैसे देश के लिए यह स्थिति आर्थिक संतुलन को चुनौती देती है।

भू-राजनीतिक संकटों का असर अक्सर शेयर बाजारों पर सबसे पहले दिखाई देता है। निवेशक अनिश्चितता से डरते हैं और जोखिम वाले निवेश से दूरी बनाने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि बाजारों में तेज गिरावट देखने को मिलती है। हालांकि लंबे समय में बाजार अक्सर स्थिर हो जाता है, लेकिन अल्पकालिक गिरावट निवेशकों के विश्वास को प्रभावित करती है।

ऊर्जा संकट का प्रभाव समाज के हर वर्ग पर अलग-अलग रूप में पड़ता है। शहरों के बड़े होटल और उद्योग बिजली और ईंधन की बढ़ती लागत का सामना करते हैं, जबकि गांवों में रहने वाले लोगों को रसोई गैस, खाद्य पदार्थ और परिवहन के बढ़ते खर्च का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार वैश्विक संकट का प्रभाव धीरे-धीरे समाज के हर स्तर तक पहुंच जाता है।

भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ऊर्जा खपत वाली अर्थव्यवस्था है। लेकिन ऊर्जा उत्पादन के मामले में भारत अभी भी आत्मनिर्भर नहीं है। भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 80-85 प्रतिशत आयात करता है। यह निर्भरता भारत को वैश्विक संकटों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बना देती है।

यदि भारत को भविष्य के ऐसे संकटों से बचना है तो उसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे। इसके लिए कई उपाय किए जा सकते हैं। जैसे नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार। घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाना। वैकल्पिक ईंधनों का विकास। ऊर्जा दक्षता में सुधार। इन कदमों से भारत धीरे-धीरे आयात पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। देश ने 2030 तक 500 गीगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का लक्ष्य रखा है। सौर ऊर्जा विशेष रूप से भारत के लिए एक बड़ा अवसर है क्योंकि देश में वर्ष भर पर्याप्त धूप उपलब्ध रहती है।

हरित हाइड्रोजन को भविष्य का ईंधन माना जा रहा है। भारत ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन की शुरुआत की है जिसका उद्देश्य देश को इस क्षेत्र में वैश्विक नेता बनाना है। यदि यह मिशन सफल होता है तो भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकेगा बल्कि ऊर्जा निर्यातक भी बन सकता है।

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। सरकार की विभिन्न योजनाओं के कारण इलेक्ट्रिक कारों, दोपहिया वाहनों और बसों का उपयोग बढ़ रहा है। यदि परिवहन क्षेत्र में पेट्रोल और डीजल की जगह बिजली का उपयोग बढ़ता है तो तेल आयात में उल्लेखनीय कमी आ सकती है।

भारत ने ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण किया है। इन भंडारों का उद्देश्य आपातकालीन स्थितियों में देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना है। हालांकि इन भंडारों की क्षमता अभी भी सीमित है और इसे बढ़ाने की आवश्यकता है।

ऊर्जा सुरक्षा केवल आर्थिक या तकनीकी मुद्दा नहीं है, बल्कि यह कूटनीतिक रणनीति का भी हिस्सा है। भारत को विभिन्न तेल उत्पादक देशों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने की आवश्यकता है। साथ ही, भारत को ऊर्जा आपूर्ति के स्रोतों में विविधता भी लानी होगी।

वर्तमान समय में जब वैश्विक संकट गहराता जा रहा है, तब यह अपेक्षा की जाती है कि देश की राजनीति गंभीर और जिम्मेदार हो। लेकिन अक्सर देखा जाता है कि राष्ट्रीय मुद्दों पर भी राजनीतिक विवाद हावी हो जाते हैं। राजधर्म का अर्थ है राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखना। जब राजनीति इस सिद्धांत से भटक जाती है तो दीर्घकालिक नीतियों का निर्माण कठिन हो जाता है।

ऊर्जा नीति जैसे महत्वपूर्ण विषयों में निरंतरता आवश्यक होती है। सरकारें बदल सकती हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित से जुड़ी नीतियां स्थिर रहनी चाहिए। यदि नीति निर्माण राजनीतिक विवादों में उलझ जाता है तो देश की दीर्घकालिक योजनाएं प्रभावित होती हैं।

इतिहास बताता है कि कई बार बड़े संकट नई संभावनाओं को जन्म देते हैं। 1970 के दशक के तेल संकट ने कई देशों को ऊर्जा दक्षता और वैकल्पिक ऊर्जा की ओर प्रेरित किया है। आज भारत के सामने भी ऐसा ही अवसर है। यदि भारत इस संकट को सही ढंग से समझे और दूरदर्शी नीतियां अपनाए तो वह ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकता है।

ऊर्जा परिवर्तन का सबसे बड़ा लाभ ग्रामीण भारत को मिल सकता है। सौर ऊर्जा, बायोगैस और छोटे पवन ऊर्जा संयंत्र गांवों में ऊर्जा की उपलब्धता बढ़ा सकता है। इससे न केवल ऊर्जा लागत कम होगी बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी।

पश्चिम एशिया का संकट केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि यह वैश्विक व्यवस्था की अस्थिरता का संकेत है। भारत जैसे बड़े और तेजी से विकसित होते देश के लिए यह समय गंभीर आत्ममंथन का है। ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता और राजनीतिक जिम्मेदारी, इन तीनों के संतुलन से ही भारत इस चुनौती का सामना कर सकता है। यदि राजधर्म को राजनीति से ऊपर रखकर दूरदर्शी नीतियां अपनाते हैं तो यह संकट भारत के लिए एक नए युग की शुरुआत भी बन सकता है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाया गया हर कदम भविष्य की पीढ़ियों को सुरक्षित और समृद्ध भारत देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास होगा।



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