महत्वाकांक्षा विवेक पर भारी होता है - “अंतहीन युद्ध-चक्र”

Jitendra Kumar Sinha
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जब बैमनस्य चर्मोत्कर्ष पर होता है, महत्वाकांक्षाएँ शबाब पर और अहंकार पराकाष्ठा पर, तब इतिहास किसी क्षेत्र को रणभूमि में बदल देता है। मध्य-पूर्व इसका सबसे जीवंत उदाहरण है। यहाँ धार्मिक-सांस्कृतिक आस्था, राजनीतिक-आर्थिक हित और सैन्य-शक्ति का ऐसा त्रिकोण बनता है, जिसमें संतुलन क्षणिक और विस्फोट स्थायी प्रतीत होता है। इस भू-भाग में रातें केवल अंधकार नहीं लाती है। वे भय, अफवाह और भविष्य की अनिश्चितता भी साथ लाती हैं।

मध्य-पूर्व का संघर्ष केवल सीमाओं का नहीं है, अस्मिता का संघर्ष है। यहूदियत और इस्लाम, दोनों की पवित्र स्मृतियाँ एक ही भू-भाग पर अंकित हैं। यही कारण है कि हर सैन्य कार्रवाई के पीछे केवल रणनीति नहीं होती है बल्कि धार्मिक प्रतीक भी सक्रिय रहते हैं। यह संतुलन न तो पूर्ण युद्ध की अनुमति देता है, न स्थायी शांति की। यह एक त्रिशंकु अवस्था है।

यहाँ संघर्ष बहु-स्तरीय है। राज्य बनाम राज्य, राज्य बनाम गैर-राज्य, और गैर-राज्य बनाम गैर-राज्य। क्षेत्रीय शक्तियाँ अपने प्रॉक्सी के माध्यम से लड़ती हैं, ताकि लागत कम और प्रभाव अधिक रहे। ईरान, इज़राइल, खाड़ी देश और पश्चिमी संरक्षक, सब अपनी-अपनी लाल रेखाएँ खींचते हैं, जिन्हें छूना भी युद्ध का संकेत बन जाता है।

ईरान की राजनीति क्रांति-उपरांत वैचारिकता और सुरक्षा-केन्द्रित शासन के इर्द-गिर्द घूमती है। प्रतिरोध की धुरी (Axis of Resistance) का नैरेटिव ईरान को क्षेत्रीय प्रभाव देता है, लेकिन साथ ही उसे निरंतर टकराव में भी रखता है। यहाँ नेतृत्व की निरंतरता, वैचारिक वैधता और सैन्य-रणनीति, तीनों आपस में गुंथी हुई हैं।

इजराइल का सुरक्षा-दृष्टिकोण अस्तित्ववादी है। पहले चेतावनी, फिर प्रहार। सीमित भू-भाग, शत्रुतापूर्ण पड़ोस और ऐतिहासिक अनुभवों ने उसे पूर्व-प्रहार (pre-emptive) की नीति की ओर उन्मुख किया है। इसी कारण हर रात का सन्नाटा संभावित कार्रवाई का संकेत बन जाता है।

युद्ध केवल मिसाइलों से नहीं लड़ा जाता है बल्कि सूचना भी हथियार है। नेतृत्व-हानि की अफवाहें, मृत्यु-समाचार, या अपुष्ट दावे, ये सब मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के उपकरण हैं। ऐसी सूचनाएँ शत्रु-शिविर में भ्रम, समर्थकों में आक्रोश और अंतरराष्ट्रीय मंच पर दबाव पैदा करती हैं।

इतिहास बताता है कि नेतृत्व का अंत संघर्ष का अंत नहीं होता है। अक्सर इसके बाद उत्तराधिकार-संघर्ष तेज होता है। कट्टर गुट अधिक उग्र हो जाते हैं। प्रतिशोध-चक्र नई ऊर्जा पाता है। नेतृत्व व्यक्ति नहीं, संरचना होता है। संरचना बनी रहे तो संघर्ष भी बना रहता है।

युद्ध मानवीय आकांक्षाओं को विषाक्त करता है। जीवन, विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य सब पीछे छूट जाते हैं। शरणार्थी, नष्ट अवसंरचना और पीढ़ीगत आघात, ये युद्ध के स्थायी अवशेष हैं। युद्ध समाप्त भी हो जाए, उसका मनोवैज्ञानिक मलबा दशकों तक रहता है।

अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ शांति-दूत बनने का दावा करती हैं, लेकिन उनके हित अक्सर मध्यस्थता को सीमित कर देते हैं। प्रतिबंध, हथियार-आपूर्ति और कूटनीति, तीनों साथ-साथ चलते हैं। यह द्वैत शांति को स्थायी नहीं होने देता है।

तीन संभावनाएँ उभरती हैं।नियंत्रित ठहराव यनि सीमित झड़पें, बड़े युद्ध से परहेज। क्षेत्रीय विस्फोट यानि प्रॉक्सी से आगे बढ़ता संघर्ष। कठोर शांति यानि थकी हुई जनता और विवश नेतृत्व। वर्तमान संकेत पहले दो की ओर झुकते हैं।

क्योंकि युद्ध केवल हथियारों से नहीं होता है, बल्कि मानसिकताओं से लड़े जाते हैं। जब तक भय, अहंकार और अपूर्ण न्याय साथ-साथ रहेंगे, तब तक मध्य-पूर्व जैसी परिस्थितियाँ बार-बार जन्म लेगी। प्रश्न यह नहीं है कि कौन जीता बल्कि प्रश्न यह है कि मानवता कब जीतेगी?



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