ऊर्जा संसाधनों का इतिहास मानव सभ्यता के विकास से और गहराई से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में मनुष्य लकड़ी, पशु शक्ति और प्राकृतिक संसाधनों के सहारे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करता था। लेकिन औद्योगिक क्रांति के बाद ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ने लगी और कोयला, पेट्रोलियम तथा प्राकृतिक गैस जैसे संसाधन आधुनिक अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गए। 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी की शुरुआत में जब पेट्रोलियम का व्यावसायिक उपयोग बढ़ा, तब दुनिया की राजनीति में ऊर्जा का महत्व तेजी से बढ़ने लगा। अमेरिका, रूस और मध्य-पूर्व के देशों में तेल के विशाल भंडार मिलने के बाद यह स्पष्ट हो गया कि भविष्य की वैश्विक शक्ति उन्हीं देशों के हाथ में होगी जिनके पास ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण होगा। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान भी तेल की आपूर्ति और नियंत्रण युद्ध की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा था। युद्ध के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच शीत युद्ध शुरू हुआ और इस दौर में भी ऊर्जा संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा बनी रही। धीरे-धीरे दुनिया के कई देशों ने तेल और गैस को अपनी आर्थिक शक्ति का आधार बना लिया। इसी के साथ ऊर्जा बाजार एक वैश्विक व्यापार में बदल गया, जहां कीमतें केवल उत्पादन से नहीं बल्कि राजनीति, कूटनीति और रणनीतिक निर्णयों से भी तय होने लगीं।
1960 में तेल उत्पादक देशों ने मिलकर एक संगठन बनाया जिसे ओपेक (Organization of the Petroleum Exporting Countries) कहा जाता है। इस संगठन का उद्देश्य तेल उत्पादन और कीमतों को नियंत्रित करना था ताकि उत्पादक देशों को उचित लाभ मिल सके। ओपेक में सऊदी अरब, ईरान, इराक, कुवैत और वेनेजुएला जैसे देश शामिल थे। बाद में इसमें अन्य देश भी जुड़ते गए। 1973 का तेल संकट इस संगठन की शक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण था। उस समय अरब देशों ने पश्चिमी देशों के खिलाफ तेल आपूर्ति को सीमित कर दिया था। इसके परिणामस्वरूप दुनिया भर में तेल की कीमतें अचानक कई गुना बढ़ गईं और कई देशों की अर्थव्यवस्था संकट में आ गई। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि ऊर्जा केवल आर्थिक संसाधन नहीं है बल्कि एक राजनीतिक हथियार भी है। आज भी जब ओपेक या ओपेक प्लस उत्पादन घटाने या बढ़ाने का निर्णय लेते हैं, तो उसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है।
दुनिया में तेल और गैस का अधिकांश व्यापार समुद्री मार्गों के माध्यम से होता है। इसलिए समुद्री रास्तों की सुरक्षा वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती है। दुनिया के कुछ प्रमुख ऊर्जा व्यापार मार्ग हैं होर्मुज जलडमरूमध्य, मलक्का जलडमरूमध्य, स्वेज नहर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य। इनमें से होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। दुनिया के लगभग एक तिहाई तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। यदि किसी कारण से यह मार्ग बाधित हो जाए तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी संकट पैदा हो सकता है। यही कारण है कि इस क्षेत्र में होने वाले किसी भी सैन्य या राजनीतिक तनाव पर पूरी दुनिया की नजर रहती है। भारत के लिए भी इन समुद्री मार्गों का महत्व बहुत अधिक है क्योंकि उसका अधिकांश तेल और गैस आयात इन्हीं रास्तों से होकर आता है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। औद्योगिक विकास, शहरीकरण और बढ़ती आबादी के कारण ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन भारत के पास तेल और गैस के सीमित भंडार हैं। इसलिए देश को अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करना पड़ता है।वर्तमान स्थिति में भारत लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। प्राकृतिक गैस का भी बड़ा हिस्सा विदेशों से आता है। एलपीजी का भी महत्वपूर्ण हिस्सा आयातित है। इसका मतलब यह है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा वैश्विक बाजार की स्थिति पर काफी हद तक निर्भर करती है। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं या आपूर्ति में बाधा आती है, तो उसका असर भारत की अर्थव्यवस्था पर तुरंत दिखाई देता है।
ऊर्जा कीमतों का प्रभाव केवल पेट्रोल और गैस तक सीमित नहीं रहता है। यह पूरे आर्थिक तंत्र को प्रभावित करता है। जब तेल और गैस की कीमतें बढ़ती हैं, तो उसके कई परिणाम सामने आते हैं। पहला प्रभाव परिवहन लागत में वृद्धि। इससे ट्रकों, बसों और अन्य वाहनों के लिए ईंधन महंगा हो जाता है, जिससे माल ढुलाई की लागत बढ़ जाती है। दूसरा प्रभाव खाद्य कीमतों पर असर। इससे जब परिवहन महंगा होता है, तो सब्जी, अनाज और अन्य खाद्य पदार्थों की कीमतें भी बढ़ जाती हैं। तीसरा प्रभाव औद्योगिक उत्पादन महंगा। कई उद्योगों में ऊर्जा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऊर्जा महंगी होने से उत्पादन लागत भी बढ़ जाती है। इन सभी कारणों से महंगाई बढ़ती है और इसका सबसे अधिक असर मध्यम और निम्न आय वर्ग पर पड़ता है।
पिछले दस वर्षों में भारत में एलपीजी की खपत तेजी से बढ़ी है। इसका सबसे बड़ा कारण ग्रामीण क्षेत्रों में गैस कनेक्शन का विस्तार और शहरीकरण है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में करोड़ों घरों तक एलपीजी कनेक्शन पहुंच चुका है। इससे पारंपरिक ईंधन जैसे लकड़ी और कोयले पर निर्भरता कम हुई है। लेकिन इसके साथ एक नई चुनौती भी सामने आई है, आपूर्ति और कीमतों का संतुलन बनाए रखना। यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं, तो सरकार के सामने दो विकल्प होते हैं। पहला उपभोक्ताओं पर कीमतों का बोझ डालना और दूसरा सब्सिडी देकर कीमतों को नियंत्रित करना। दोनों विकल्पों के अपने-अपने आर्थिक प्रभाव होते हैं।
भारत सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कई रणनीतिक कदम उठाए हैं। भारत अब केवल मध्य-पूर्व पर निर्भर नहीं रहना चाहता। इसलिए रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों से भी ऊर्जा आयात बढ़ाया जा रहा है। देश में रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बनाए गए हैं ताकि आपात स्थिति में कुछ समय तक ऊर्जा आपूर्ति जारी रखी जा सके। भारत ने सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में बड़े लक्ष्य निर्धारित किए हैं। इसका उद्देश्य भविष्य में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम करना है। सरकार तेल और गैस की घरेलू खोज और उत्पादन को बढ़ावा देने की भी कोशिश कर रही है।
आने वाले वर्षों में दुनिया को दो बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। पहली चुनौती है ऊर्जा सुरक्षा,
दुनिया में ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि कई संसाधन सीमित हैं और दूसरी चुनौती है जलवायु परिवर्तन जीवाश्म ईंधन के उपयोग से पर्यावरण पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए दुनिया को स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना होगा। भारत के लिए इन दोनों चुनौतियों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं होगा।
ऊर्जा केवल एक आर्थिक संसाधन नहीं बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का महत्वपूर्ण आधार है। एलपीजी जैसे ईंधन का संबंध सीधे आम नागरिक के जीवन से जुड़ा हुआ है। भारत जैसे देश में जहां करोड़ों परिवार अपनी रसोई के लिए एलपीजी पर निर्भर हैं, वहां ऊर्जा बाजार में होने वाले बदलावों का प्रभाव व्यापक हो सकता है। इसलिए ऊर्जा सुरक्षा केवल सरकार की नीति का विषय नहीं है बल्कि राष्ट्रीय रणनीति का हिस्सा है। आने वाले समय में भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए वैश्विक राजनीति, आर्थिक नीतियों और तकनीकी नवाचार के बीच संतुलन बनाना होगा।
