सत्य जानते हुए भी अविद्या का आवरण क्यों?

Jitendra Kumar Sinha
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पश्चिमी परंपरा में सत्य को अक्सर fact या verifiable statement के रूप में समझा गया है। भारतीय दर्शन में सत्य इससे कहीं आगे है। भारतीय दृष्टि में सत्य वह है जो भूत, वर्तमान और भविष्य, तीनों में समान रहे, जो सत्ता, शासन, बहुमत या परिस्थिति से न बदले और जो स्वीकार करने में कठिन हो, पर अस्वीकार करने पर आत्मा क्षत-विक्षत हो जाए। इसीलिए कहा गया है कि “सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात्”  लेकिन प्रिय होने का कारण असत्य नहीं है और असुविधाजनक होने के कारण सत्य त्याज्य नहीं है।

अधिकांश ने बचपन में यह पंक्ति अवश्य पढ़ी है “असतो मा सद्गमय,  तमसो मा ज्योतिर्गमय,  मृत्योर्मा अमृतं गमय”। लेकिन यह प्रश्न अनुत्तरित रह जाता है कि क्या असत् को पहचाना? क्या तमस् को स्वीकार किया? या केवल दूसरों को असत्य और अज्ञान का दोषी ठहराया? आज समस्या यह नहीं है कि सत्य नहीं जानते हैं, समस्या यह है कि सत्य जानते हुए भी अविद्या का आवरण ओढ़ना अधिक सुरक्षित समझते हैं।

भारतीय समाज में सत्य का सबसे लोकप्रिय प्रतीक राजा हरिश्चंद्र हैं। लेकिन आधुनिक भारत में हरिश्चंद्र की स्मृति अक्सर एक खतरनाक रूप ले चुकी है। आज कई लोग अपनी बात को ही सत्य घोषित करते हैं। असहमति को अधर्म मानते हैं और अपने कुटुंब, समाज या संस्थान को भावनात्मक चाबुक से वश में करना चाहते हैं। यह सत्य नहीं है, सत्य का आतंक है। जबकि हरिश्चंद्र का सत्य आत्मत्याग से उपजा था। विनम्रता से भरा था और स्वयं पर लागू था। आज का तथाकथित सत्य दूसरों पर थोपा जाता है। प्रश्नों से डरता है और सत्ता से पोषित होता है।

आज डिग्रियाँ बढ़ी हैं, सूचनाएँ अपार हैं, लेकिन बोध घटा है। सबलोग जानते हैं संविधान, लोकतंत्र, स्वतंत्रता, संस्थाएँ लेकिन उसके अर्थ से बचते हैं। भारत के राजचिह्न पर लिखा है “सत्यमेव जयते”। लेकिन यह वाक्य किसी भी शासन को स्वतः सत्यवादी नहीं बना देता है, किसी भी नागरिक को स्वतः नैतिक नहीं कर देता है और किसी भी आलोचक को राष्ट्रद्रोही नहीं ठहराता है। सत्य को लिख लेना आसान है, बोल लेना सरल है, लेकिन स्वीकार करना सबसे कठिन। सत्य स्वीकार करने के लिए चाहिए आत्मालोचना, विनय और संस्थागत परिपक्वता।

लोकतंत्र का मूल धर्म है “आलोचना”। लेकिन आज एक खतरनाक भ्रम फैलाया जा रहा है संस्थाओं का अपमान, षड्यंत्र और देशद्रोह। जबकि सत्य यह है कि बिना आलोचना के लोकतंत्र केवल चुनावी तंत्र रह जाता है। “लोकतांत्रिक व्यवस्था में आलोचना आवश्यक है, लेकिन संस्थाओं में विश्वास बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है”। यहाँ विश्वास का अर्थ आँख मूँद लेना नहीं है। प्रश्न छोड़ देना नहीं है और त्रुटियों को पवित्र मान लेना नहीं है, बल्कि सुधार की संभावना में आस्था रखना, संवाद की गुंजाइश होना और आत्मशुद्धि की अपेक्षा करना।

सत्य कोई अंतिम घोषणा नहीं करता है। कोई सत्ता-प्रमाण पत्र नहीं देता है और न ही किसी समूह की बपौती होती है बल्कि सत्य निरंतर खोज है। स्वयं से संवाद है और साहसिक स्वीकार है। यदि सत्य बोलना नहीं, बल्कि सत्य जीना सीख लें तो “सत्यमेव जयते”  एक नारा नहीं रहेगा बल्कि एक जीवंत यथार्थ बन सकता है।

सत्य का सबसे बड़ा शत्रु असत्य नहीं होता है बल्कि सुविधा होती है। असत्य अक्सर स्पष्ट होता है, लेकिन सुविधा तर्क का मुखौटा पहन लेती है। नैतिकता का अभिनय करती है और विवेक को धीरे-धीरे सुन्न कर देती है। आज सबलोग ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ जो सत्य असुविधाजनक हो, उसे “अप्रासंगिक” कह दिया जाता है और जो सुविधा जनक हो, उसे “राष्ट्रीय हित” का नाम दे दिया जाता है।

भारतीय परंपरा में सत्य सत्ता को अनुशासित करता था लेकिन आज सत्ता सत्य को परिभाषित करने लगी है। यह परिवर्तन केवल राजनीतिक नहीं है बल्कि नैतिक और मानसिक है। लोकतंत्र में संख्या का महत्व है, लेकिन सत्य का नहीं। यह वाक्य चौंकाने वाला लग सकता है, लेकिन यही समय की विडंबना है। आज बहुमत को नैतिक प्रमाण मान लिया गया है। भीड़ की स्वीकृति को सत्य का विकल्प और तालियों को विवेक का प्रमाण। क्योंकि सत्य अकेला खड़ा रहता है, प्रश्न पूछने को बाध्य करता है और आत्मावलोकन माँगता है। भीड़ को यह सब असहज करता है। इसलिए भीड़ सत्य को नहीं, अपने विश्वास की पुष्टि चाहती है।

कहा जाता है कि “पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है।” आज यह वाक्य स्वयं एक प्रश्न बन चुका है। आज समाचार अधिक हैं, विश्लेषण कम है और शोर अपार है। जबकि सत्य धीमा होता है, जटिल होता है और धैर्य माँगता है। वहीं शोर त्वरित है, भावनात्मक है और ध्यान खींचता है। इस संघर्ष में सत्य अक्सर हार जाता है।

आज की शिक्षा उत्तर रटाती है। प्रश्नों से बचाती है और असहमति को अनुशासनहीनता मानती है। जबकि सत्य प्रश्न से जन्म लेता है, संदेह से परिपक्व होता है और संवाद से पुष्ट होता है।

भारत धार्मिक देश है, लेकिन क्या वह सत्यनिष्ठ भी है? यह प्रश्न असहज है, लेकिन आवश्यक है। आस्था विनम्र बनाती है, स्वीकार सिखाती है और सीमाएँ पहचानती है। आग्रह कठोर बनाता है, दूसरों को गलत ठहराता है और स्वयं को अचूक मानता है। जब आस्था आग्रह में बदलती है तब सत्य सबसे पहले मरता है।

संस्थाएँ मनुष्यों द्वारा बनाई जाती हैं, त्रुटिपूर्ण होती हैं और सुधार की मांग करती हैं। लेकिन वे लोकतंत्र की रीढ़ भी होती हैं। यदि हर संस्था संदिग्ध हो, हर प्रक्रिया षड्यंत्र लगे, हर निर्णय पूर्वाग्रह लगे, तो अंततः लोकतंत्र आत्मघात कर लेता है। इसलिए आलोचना आवश्यक है, लेकिन विध्वंस नहीं, अविश्वास नहीं और न ही निरंतर अवमानना। 

आज एक प्रवृत्ति उभर रही है जो सहमत नहीं, वह विरोधी है और जो विरोधी है, वह राष्ट्र-विरोधी है। यह सोच लोकतंत्र को संकुचित करती है। संवाद को कुचलती है और सत्य को संदिग्ध बनाती है। जबकि सच्चा राष्ट्रवाद प्रश्नों से डरता नहीं है। दूसरों को गलत ठहराना सरल है, लेकिन स्वयं को जाँचना कठिन है। सत्य का अंतिम चरण भाषण नहीं है, लेख नहीं है और न ही नारा, बल्कि आत्मालोचना है। जब तक अपने पूर्वाग्रह स्वीकार नहीं करते हैं, अपनी सुविधा पहचान नहीं लेते हैं और अपने डर से नहीं जूझते हैं, तब तक सत्य केवल शब्द बना रहता है।

अक्सर सत्य और न्याय को एक-दूसरे का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि दोनों का संबंध सीधा नहीं है, बल्कि नैतिक है। सत्य यथार्थ का बोध कराता है, तथ्य उजागर करता है और आत्मा को साक्षी बनाता है। न्याय उस सत्य का सामाजिक निष्कर्ष है, शक्ति-संतुलन में सत्य की रक्षा है और कमजोर के पक्ष में सत्य की घोषणा है। जब सत्य तो दिखे, पर न्याय न हो तो सत्य अपूर्ण रह जाता है। आधुनिक लोकतंत्रों में न्याय अक्सर प्रक्रिया-केंद्रित हो गया है। नियम पूरे हुए या नहीं? काग़ज़ पूरे थे या नहीं? समय-सीमा का पालन हुआ या नहीं? ये सभी आवश्यक हैं, लेकिन यदि प्रक्रिया सही हो और परिणाम अन्यायपूर्ण, तो प्रश्न उठता है कि क्या न्याय हुआ?

भारतीय लोकतंत्र की आत्मा भारत का संविधान में बसती है। लेकिन संविधान केवल अनुच्छेदों का संग्रह नहीं है बल्कि ऐतिहासिक पीड़ा, संघर्ष और आशा का दस्तावेज है। संविधान यह नहीं पूछता है कि तुम कितने शक्तिशाली हो? तुम्हारे पास कितना बहुमत है? वह पूछता है तुम कमजोर के साथ क्या कर रहे हो? तुम असहमत को कितना सुरक्षित रखते हो? जब संविधान केवल सत्ता का औज़ार बन जाए और उसकी नैतिक आत्मा गौण हो जाए तो लोकतंत्र जीवित रहते हुए भी अर्थहीन हो जाता है।

लोकतंत्र में बहुमत आवश्यक है, लेकिन पर्याप्त नहीं। बहुमत निर्णय ले सकता है। सरकार बना सकता है। कानून पारित कर सकता है। लेकिन बहुमत सत्य का प्रमाण नहीं होता है। इतिहास साक्षी है कि कई बार बहुमत ने अन्याय का समर्थन किया, कई बार भीड़ ने विवेक को कुचला और कई बार सत्ता ने सत्य को देशद्रोह कहा।  विवेक संख्या से नहीं मापा जाता है, लोकप्रियता से नहीं तय होता है और चुनाव से नहीं मिलता है। विवेक अंतरात्मा का साहसिक निर्णय होता है। लोकतंत्र तब स्वस्थ रहता है जब बहुमत के साथ-साथ विवेक की जगह सुरक्षित हो।

आज एक खतरनाक मिलावट देखी जा रही है कि राज्य और राष्ट्र, सरकार और देश, नीति की आलोचना  और देशद्रोह। यह भ्रम राष्ट्र को कमजोर करता है, लोकतंत्र को संकुचित करता है और सत्य को संदिग्ध बनाता है। राष्ट्र भूमि नहीं, चेतना है, सरकार नहीं, जनता है और सत्ता नहीं, साझी स्मृति है। सत्य बोलना सरल है, जब कोई जोखिम न हो, कोई मूल्य न चुकाना पड़े। लेकिन सत्य तभी सत्य होता है जब उसकी कीमत चुकानी पड़े। नैतिक साहस पद से नहीं आता है, लोकप्रियता से नहीं मिलता है और न ही विचारधारा से सुनिश्चित होता है। वह अकेले खड़े होने की क्षमता रखता है, अस्वीकार सहने की शक्ति रखता है और स्वयं से झूठ न बोलने का संकल्प लेता है।

आज भारत एक चौराहे पर खड़ा है। एक रास्ता सुविधा का है, चुप्पी का है और भीड़ के साथ बह जाने का है।  दूसरा रास्ता सत्य का है, प्रश्नों का है और विवेकपूर्ण असहमति का है। यह निर्णय सरकार अकेले नहीं ले सकती है और संस्थाएँ अकेले नहीं तय कर सकतीं हैं यह निर्णय हर नागरिक को प्रतिदिन लेना होता है।



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