भारत की सांस्कृतिक विरासत केवल देश की पहचान ही नहीं, बल्कि उसकी आध्यात्मिक और ऐतिहासिक परंपरा का जीवंत प्रतीक भी है। सदियों पुरानी मूर्तियां, मंदिर और कलाकृतियां भारत की समृद्ध संस्कृति का प्रमाण हैं। लेकिन औपनिवेशिक काल और उसके बाद के वर्षों में ऐसी कई अमूल्य धरोहरें चोरी होकर विदेशों के संग्रहालयों तक पहुंच गईं। हाल ही में इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण कदम सामने आया है, जब ब्रिटेन के प्रसिद्ध ‘एशमोलियन म्यूजियम’ ने 16वीं सदी की एक ऐतिहासिक कांस्य प्रतिमा भारत को लौटा दी है। यह प्रतिमा “वैष्णव संत तिरुमंगई अलवर” की है, जो लगभग 500 वर्ष पुरानी बताई जा रही है।
तिरुमंगई अलवर दक्षिण भारत के प्रमुख वैष्णव संतों में से एक माने जाते हैं। वे तमिल भक्ति आंदोलन के महत्वपूर्ण संतों में शामिल थे और भगवान विष्णु के प्रति उनकी गहरी भक्ति के लिए जाने जाते हैं।
अलवर संतों की परंपरा में कुल 12 संत माने जाते हैं, जिन्होंने भगवान विष्णु की भक्ति में अनेक भजन और स्तुतियां रचीं। तिरुमंगई अलवर को इन संतों में अंतिम और सबसे प्रभावशाली संतों में गिना जाता है। उन्होंने तमिल भाषा में कई भक्ति रचनाएं लिखीं, जो आज भी दक्षिण भारत के मंदिरों में गाई जाती हैं। उनकी प्रतिमाएं विशेष रूप से तमिलनाडु के विष्णु मंदिरों में स्थापित की जाती हैं और भक्तों के लिए अत्यंत श्रद्धा का विषय होती हैं।
यह अनमोल कांस्य प्रतिमा तमिलनाडु के डिंडीगुल जिले के थाडिकोम्बु गांव में स्थित श्री सौंदरराजा पेरुमल मंदिर की बताई जाती है। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित एक प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। जांच में पता चला कि कई दशक पहले यह प्रतिमा मंदिर से चोरी कर ली गई थी। उस समय मंदिरों की सुरक्षा व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं थी, जिसके कारण कई प्राचीन मूर्तियां तस्करों के हाथ लग गईं। ऐसी ही परिस्थितियों में यह प्रतिमा भी चोरी होकर विदेश पहुंच गई और अंततः ब्रिटेन के संग्रहालय तक पहुंच गई।
ब्रिटेन की ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़ा एशमोलियन म्यूजियम दुनिया के सबसे पुराने सार्वजनिक संग्रहालयों में से एक माना जाता है। इस संग्रहालय में दुनिया भर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं।
संग्रहालय ने इस प्रतिमा को वर्ष 1967 में हुई एक नीलामी के दौरान खरीदा था। उस समय यह स्पष्ट नहीं था कि प्रतिमा चोरी की गई है। लेकिन बाद में भारत सरकार और तमिलनाडु पुलिस की जांच के दौरान यह सामने आया कि यह मूर्ति मूल रूप से थाडिकोम्बु मंदिर की है और इसे अवैध रूप से बाहर ले जाया गया था।
जब इस मूर्ति की असली पहचान और उसके चोरी होने की जानकारी सामने आई, तब भारतीय अधिकारियों ने इसके संबंध में कार्रवाई शुरू की। इसके बाद संग्रहालय प्रशासन ने मामले की समीक्षा की। जांच के बाद एशमोलियन म्यूजियम ने यह स्वीकार किया कि यह प्रतिमा भारत की सांस्कृतिक संपत्ति है और इसे अपने मूल स्थान पर लौटाया जाना चाहिए। इसी निर्णय के तहत संग्रहालय ने यह प्रतिमा भारतीय अधिकारियों को सौंप दी। अब इसे जल्द ही तमिलनाडु भेजा जाएगा, जहां इसे पुनः मंदिर या राज्य के संग्रहालय में सुरक्षित रखा जाएगा।
पिछले कुछ वर्षों में दुनिया भर के संग्रहालयों और संस्थानों द्वारा चोरी या अवैध रूप से ले जाई गई कलाकृतियों को उनके मूल देशों को लौटाने की पहल बढ़ी है। भारत भी लगातार अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की वस्तुओं को वापस लाने के लिए प्रयास कर रहा है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देशों ने पहले भी भारत को अनेक प्राचीन मूर्तियां और कलाकृतियां लौटाई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल सांस्कृतिक न्याय का मामला नहीं है, बल्कि यह उन समुदायों और मंदिरों की आस्था से भी जुड़ा हुआ है, जिनसे ये कलाकृतियां संबंधित हैं।
तिरुमंगई अलवर की यह प्रतिमा केवल एक धातु की मूर्ति नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, भक्ति और इतिहास का प्रतीक है। मंदिरों में स्थापित ऐसी मूर्तियां धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं का महत्वपूर्ण हिस्सा होती हैं। जब ऐसी मूर्तियां चोरी हो जाती हैं, तो केवल एक वस्तु नहीं खोती, बल्कि उससे जुड़ी धार्मिक भावना और सांस्कृतिक पहचान भी प्रभावित होती है। इसलिए इस तरह की धरोहरों की वापसी भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
ब्रिटेन के एशमोलियन म्यूजियम द्वारा 500 साल पुरानी संत तिरुमंगई अलवर की प्रतिमा भारत को लौटाना एक सकारात्मक और सराहनीय कदम है। यह न केवल सांस्कृतिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि दुनिया अब ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहरों के संरक्षण और सम्मान के प्रति अधिक जागरूक हो रही है। उम्मीद की जा रही है कि भविष्य में भी इसी तरह की पहल के जरिए भारत की कई अन्य खोई हुई धरोहरें अपने मूल स्थान तक वापस पहुंच सकेगी।
