समाज को आईना दिखाने वाली एक संवेदनशील कहानी है - “तारे जमीन पर”

Jitendra Kumar Sinha
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वर्ष 2007 में रिलीज़ हुई “तारे जमीन पर” केवल एक फिल्म नहीं है, बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली एक संवेदनशील कहानी है। इस फिल्म ने बच्चों की मानसिक और शैक्षणिक समस्याओं को जिस गहराई से प्रस्तुत किया, वह भारतीय सिनेमा में एक महत्वपूर्ण बदलाव माना गया। निर्देशक और अभिनेता अमीर खान ने इस फिल्म के माध्यम से यह संदेश दिया कि हर बच्चा विशेष होता है और उसे समझने के लिए प्रेम, धैर्य और सही मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। फिल्म में छोटे कलाकार दर्शील सफरी ने ईशान अवस्थी का किरदार निभाया है, जबकि टिस्का चोपड़ा ने उसकी मां माया अवस्थी की भूमिका निभाई है। मां और बेटे के रिश्ते को फिल्म में बेहद भावुक और वास्तविक तरीके से दिखाया गया है।


फिल्म की कहानी आठ वर्षीय ईशान अवस्थी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पढ़ाई में कमजोर है और अक्सर शब्दों व अक्षरों को समझने में गलती करता है। स्कूल में शिक्षक उसे आलसी और शरारती समझते हैं, जबकि उसके पिता उसकी असफलताओं से परेशान रहते हैं। असल में ईशान डिस्लेक्सिया नामक सीखने की समस्या से जूझ रहा होता है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें बच्चा सामान्य बुद्धि होने के बावजूद पढ़ने-लिखने में कठिनाई महसूस करता है। लेकिन समाज और परिवार अक्सर इसे समझ नहीं पाते। ईशान की मां माया अपने बेटे की परेशानियों को महसूस करती है। वह जानती है कि उसका बच्चा जानबूझकर गलतियाँ नहीं करता, बल्कि उसे समझे जाने की जरूरत है। यही मातृत्व की सबसे बड़ी खूबसूरती है, एक मां अपने बच्चे की तकलीफ को बिना शब्दों के भी महसूस कर लेती है।


माया अवस्थी का किरदार इस फिल्म की आत्मा है। वह अपने बेटे को डांटने के बजाय उसे समझने की कोशिश करती है। जब पूरा समाज ईशान को असफल मानने लगता है, तब उसकी मां ही उसके भीतर की प्रतिभा को पहचानती है। एक मां का प्रेम केवल लाड़-प्यार तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह अपने बच्चे के दर्द को सहने और उसके लिए संघर्ष करने का साहस भी देता है। माया हर परिस्थिति में ईशान का साथ देती है। फिल्म में कई ऐसे दृश्य हैं जो मां के त्याग और संवेदनशीलता को दर्शाते हैं। जब ईशान को बोर्डिंग स्कूल भेजा जाता है, तब उसकी मां की आंखों में दर्द साफ दिखाई देता है। वह चाहकर भी अपने बेटे की पीड़ा कम नहीं कर पाती, लेकिन उसका विश्वास कभी टूटता नहीं। 


ईशान की जिन्दगी में बदलाव तब आता है जब कला शिक्षक राम शंकर निकुंभ की एंट्री होती है। अमीर खान द्वारा निभाया गया यह किरदार बच्चों को समझने और उनकी प्रतिभा पहचानने का संदेश देता है। निकुंभ सर समझ जाते हैं कि ईशान किसी मानसिक कमजोरी का शिकार नहीं है, बल्कि डिस्लेक्सिया से जूझ रहा है। वह उसके अंदर छिपे कलाकार को बाहर लाने का प्रयास करते हैं। यहां भी मां का योगदान महत्वपूर्ण रहता है। माया अपने बेटे के लिए उम्मीद नहीं छोड़ती और शिक्षक के प्रयासों का पूरा समर्थन करती है। यही सहयोग ईशान के आत्मविश्वास को वापस लौटाता है।


“तारे जमीन पर” ने भारतीय समाज को यह सोचने पर मजबूर किया कि हर बच्चा एक जैसा नहीं होता। कई बार बच्चे पढ़ाई में कमजोर होते हैं, लेकिन उनमें दूसरी अद्भुत प्रतिभाएँ छिपी होती हैं। फिल्म यह भी बताती है कि माता-पिता और शिक्षकों का व्यवहार बच्चे के मानसिक विकास पर गहरा प्रभाव डालता है। यदि बच्चों को लगातार डांटा जाए, तो उनका आत्मविश्वास टूट जाता है। वहीं प्यार, समझ और प्रोत्साहन उन्हें नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकता है। माया अवस्थी जैसी मां हर बच्चे के जीवन में प्रेरणा बन सकती है। वह यह सिखाती हैं कि बच्चे को केवल अंकों से नहीं, बल्कि उसकी भावनाओं और क्षमताओं से पहचानना चाहिए।


“तारे जमीन पर” आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे भावुक और प्रेरणादायक फिल्मों में गिनी जाती है। यह फिल्म केवल डिस्लेक्सिया की कहानी नहीं, बल्कि मां के निस्वार्थ प्रेम, धैर्य और विश्वास की कहानी है। माया अवस्थी का किरदार यह एहसास कराता है कि एक मां अपने बच्चे के लिए सबसे बड़ी ताकत होती है। वह उसकी कमजोरियों को छिपाने के बजाय उन्हें स्वीकार कर उसे आगे बढ़ने का हौसला देती है। यही कारण है कि यह फिल्म दर्शकों के दिलों में आज भी खास जगह रखती है।



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