तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) की वरिष्ठ नेता और सांसद कनिमोई करुणानिधि ने एक बार फिर राज्यपाल पद को लेकर अपनी पार्टी का स्पष्ट रुख सामने रखा है। चेन्नई में शुक्रवार को मीडिया से बातचीत के दौरान कनिमोई करुणानिधि ने कहा कि द्रमुक हमेशा से मानती रही है कि राज्यपाल पद की कोई आवश्यकता नहीं है और पार्टी का यह दृष्टिकोण आगे भी नहीं बदलेगा। उनके इस बयान के बाद देशभर में राज्यपाल की भूमिका और उसकी संवैधानिक आवश्यकता को लेकर बहस फिर तेज हो गई है। खासकर उन राज्यों में, जहां केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें हैं, वहां राज्यपाल और निर्वाचित सरकारों के बीच टकराव अक्सर देखने को मिलता रहा है।
भारत के संविधान में राज्यपाल को राज्य का संवैधानिक प्रमुख माना गया है। राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और वह केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में भी देखे जाते हैं। हालांकि व्यवहारिक राजनीति में कई बार विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि राज्यपाल पद का इस्तेमाल केंद्र सरकार राज्यों पर दबाव बनाने के लिए करती है। द्रमुक लंबे समय से यह आरोप लगाती रही है कि तमिलनाडु में राज्यपाल कई विधेयकों को मंजूरी देने में देरी करते हैं और राज्य सरकार के अधिकारों में हस्तक्षेप करते हैं। यही कारण है कि पार्टी लगातार राज्यपाल पद को समाप्त करने की मांग करती रही है। कनिमोई करुणानिधि का ताजा बयान भी इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में आया है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई राज्य सरकारों को काम करने की स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और राज्यपाल जैसी व्यवस्था कई बार अनावश्यक विवाद पैदा करती है।
पिछले कुछ वर्षों में तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच कई मुद्दों पर टकराव देखने को मिला है। विश्वविद्यालयों में कुलपति नियुक्ति से लेकर विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को लंबित रखने तक, कई मामलों में दोनों पक्ष आमने-सामने रहे हैं। द्रमुक और उसके सहयोगी दलों का कहना है कि राज्यपाल संविधान की सीमाओं से आगे जाकर राजनीतिक भूमिका निभाने का प्रयास करते हैं। वहीं दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों का तर्क है कि राज्यपाल संविधान की रक्षा के लिए जरूरी संस्था हैं और वे केवल अपने अधिकारों का उपयोग करते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र और राज्यों के बीच बढ़ते राजनीतिक मतभेदों ने राज्यपाल पद को विवाद का केंद्र बना दिया है।
कनिमोई करुणानिधि के बयान पर भाजपा नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। भाजपा का कहना है कि राज्यपाल भारतीय संघीय ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उन्हें हटाने की मांग संविधान विरोधी सोच को दर्शाती है। भाजपा नेताओं के अनुसार राज्यपाल राज्य में संवैधानिक संतुलन बनाए रखने का काम करते हैं। यदि किसी राज्य सरकार द्वारा संविधान के विरुद्ध कदम उठाए जाते हैं, तो राज्यपाल की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। वहीं कई क्षेत्रीय दलों ने द्रमुक के विचारों का समर्थन भी किया है। कुछ विपक्षी नेताओं का मानना है कि राज्यपालों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सुधार होना चाहिए ताकि वे निष्पक्ष तरीके से काम कर सके।
संविधान विशेषज्ञों के अनुसार राज्यपाल पद को समाप्त करना आसान नहीं है। इसके लिए संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 के तहत प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल का प्रावधान है। हालांकि समय-समय पर विभिन्न आयोगों और विशेषज्ञ समितियों ने राज्यपाल की भूमिका को लेकर सुझाव दिए हैं। सरकारिया आयोग और पंची आयोग ने भी राज्यपाल की नियुक्ति और कार्यप्रणाली में सुधार की बात कही थी ताकि केंद्र और राज्यों के बीच संतुलन बना रहे। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि राज्यपाल पद को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय उसकी शक्तियों और कार्यों को स्पष्ट करना अधिक व्यावहारिक समाधान हो सकता है।
कनिमोई करुणानिधि का बयान केवल तमिलनाडु तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश की संघीय राजनीति से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है। कई गैर-भाजपा शासित राज्यों ने समय-समय पर राज्यपालों पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगाए हैं। इस विवाद ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत की संघीय व्यवस्था में राज्यपाल की भूमिका वर्तमान स्वरूप में जरूरी है या इसमें व्यापक सुधार की आवश्यकता है। आने वाले समय में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और अधिक चर्चा का विषय बन सकता है।
