तमिलनाडु की राजनीति में उस समय नया विवाद खड़ा हो गया जब पूर्व केंद्रीय मंत्री मणिशंकर अय्यर ने कांग्रेस द्वारा टीवीके के साथ गठबंधन की संभावनाओं पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने इस कदम को “अनैतिक”, “सुविधा की राजनीति” और महात्मा गांधी के सिद्धांतों का “अक्षम्य उल्लंघन” बताया। मणिशंकर अय्यर के इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में बहस को और तेज कर दिया है। दरअसल, तमिलनाडु में आगामी चुनावों को लेकर राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। अभिनेता और नेता विजय की पार्टी टीवीके (तमिझगा वेत्री कझगम) लगातार राजनीतिक चर्चा के केंद्र में बनी हुई है। ऐसे में कांग्रेस और टीवीके के संभावित गठबंधन को लेकर कई तरह की अटकलें लगाई जा रही हैं।
मणिशंकर अय्यर ने कहा है कि कांग्रेस एक ऐसी पार्टी रही है जिसने हमेशा विचारधारा और सिद्धांतों की राजनीति की बात की है। यदि वही पार्टी केवल चुनावी लाभ के लिए किसी भी दल से समझौता करने लगे, तो इससे उसकी वैचारिक विश्वसनीयता कमजोर होगी। उन्होंने कहा कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं हो सकती। गांधीवादी विचारधारा नैतिकता, सिद्धांत और जनसेवा पर आधारित रही है। यदि कांग्रेस केवल राजनीतिक सुविधा को ध्यान में रखकर गठबंधन करती है, तो यह उसके मूल मूल्यों के खिलाफ होगा। मणिशंकर अय्यर का मानना है कि राजनीतिक दलों को गठबंधन करते समय केवल सीटों और वोटों का गणित नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि सामने वाली पार्टी की वैचारिक दिशा क्या है और उसका राजनीतिक अनुभव कितना मजबूत है।
तमिल फिल्म उद्योग के सुपरस्टार विजय ने हाल के वर्षों में राजनीति में सक्रिय कदम रखा है। उनकी पार्टी टीवीके युवाओं और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। विजय की साफ-सुथरी छवि और सामाजिक मुद्दों पर मुखर रुख ने उन्हें तमिलनाडु की राजनीति में एक मजबूत चेहरा बना दिया है। हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीवीके अभी शुरुआती दौर की पार्टी है और उसे संगठनात्मक मजबूती तथा जमीनी स्तर पर व्यापक नेटवर्क तैयार करने की आवश्यकता है। इसके बावजूद पार्टी ने राज्य की पारंपरिक राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। यही कारण है कि कई बड़े दल टीवीके के साथ संभावित समझौते की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं। कांग्रेस के साथ उसके संबंधों की चर्चा भी इसी संदर्भ में हो रही है।
तमिलनाडु में कांग्रेस लंबे समय से क्षेत्रीय दलों पर निर्भर रही है। राज्य की राजनीति में एम. करुणानिधि की द्रमुक और जे. जयललिता की अन्नाद्रमुक जैसी पार्टियों का दबदबा रहा है। कांग्रेस अपने दम पर राज्य में बड़ी राजनीतिक ताकत नहीं बन पाई। ऐसे में पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बनाए रखने की है। यदि कांग्रेस टीवीके के साथ जाती है, तो उसे युवाओं के बीच नया समर्थन मिल सकता है। लेकिन इसके साथ ही उसे वैचारिक आलोचनाओं का भी सामना करना पड़ेगा। मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता इसी पहलू को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं। उनका मानना है कि अल्पकालिक राजनीतिक लाभ के लिए पार्टी को अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करना चाहिए।
मणिशंकर अय्यर का बयान केवल एक गठबंधन पर टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह भारतीय राजनीति में लगातार बढ़ती “व्यावहारिक राजनीति” पर भी सवाल उठाता है। आज अधिकांश दल चुनावी जीत को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं और उसी के अनुसार गठबंधन बनते-बिगड़ते हैं। इसके विपरीत गांधीवादी राजनीति नैतिकता, पारदर्शिता और सिद्धांतों पर आधारित मानी जाती है। अय्यर का कहना है कि कांग्रेस यदि खुद को गांधी और नेहरू की विरासत वाली पार्टी बताती है, तो उसे राजनीतिक फैसलों में भी उसी आदर्शवाद को दिखाना चाहिए। हालांकि कांग्रेस के भीतर एक वर्ग ऐसा भी है जो मानता है कि बदलते राजनीतिक दौर में गठबंधन की राजनीति अपरिहार्य हो चुकी है। क्षेत्रीय दलों के बढ़ते प्रभाव के कारण राष्ट्रीय पार्टियों को नए सहयोगियों की तलाश करनी पड़ती है।
मणिशंकर अय्यर के बयान से साफ है कि कांग्रेस के भीतर भी इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। यदि भविष्य में टीवीके और कांग्रेस के बीच कोई औपचारिक समझौता होता है, तो पार्टी के अंदर वैचारिक बहस और तेज हो सकती है। तमिलनाडु की राजनीति पहले ही कई बड़े बदलावों के दौर से गुजर रही है। द्रमुक और अन्नाद्रमुक के पारंपरिक वर्चस्व के बीच अब नए राजनीतिक विकल्प उभर रहे हैं। विजय की टीवीके इसी बदलाव का प्रतीक मानी जा रही है। ऐसे में कांग्रेस का अगला कदम केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि उसकी वैचारिक दिशा का भी संकेत माना जाएगा। मणिशंकर अय्यर की टिप्पणी ने इस बहस को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना दिया है।
