सत्ता, संघर्ष और राजनीतिक उत्तराधिकार जब राजनीति बन जाए

Jitendra Kumar Sinha
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भारतीय राजनीति केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने की कला नहीं है, बल्कि यह सत्ता, महत्वाकांक्षा, वर्चस्व, उत्तराधिकार और अंतर्कलह का ऐसा रंगमंच है जहाँ हर पात्र अपने समय, अपनी ताकत और अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करता दिखाई देता है। सत्ता जब तक सामूहिक उद्देश्य का माध्यम रहती है, तब तक वह संगठन को ऊर्जा देती है; लेकिन जैसे ही सत्ता किसी व्यक्ति, परिवार या गुट की निजी विरासत बन जाती है, वही सत्ता धीरे-धीरे संगठन के लिए सजा में बदलने लगती है। तब हर नेता अपने हाथ में अदृश्य कटार लिए दूसरे के पैरों को काटने में जुट जाता है। परिणामस्वरूप संगठन का मठाधीश्वर भी असुरक्षित हो उठता है और उसकी सारी राजनीति केवल अपने सिंहासन को बचाने तक सीमित हो जाती है।


भारतीय राजनीति के कई उदाहरण इसी सच्चाई को सामने रखते हैं। चाहे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस का संकट हो या बिहार की राजनीति में सत्ता परिवर्तन के बाद की बेचैनी। हर जगह एक ही प्रश्न खड़ा दिखाई देता है कि आखिर सत्ता का चरित्र इतना अस्थिर क्यों हो गया है? क्यों राजनीतिक दल अपने वैचारिक आधार की बजाय व्यक्तियों के इर्द-गिर्द सिमटते जा रहे हैं? और क्यों हर दल में उत्तराधिकार की राजनीति सबसे बड़ा संघर्ष बनती जा रही है? सत्ता अपने साथ केवल अधिकार नहीं लाती है, बल्कि असुरक्षा भी लेकर आती है। जो जितना बड़ा नेता होता है, उसके भीतर अपना वर्चस्व खोने का भय भी उतना ही बड़ा होता है। राजनीति में मित्रता स्थायी नहीं होती, केवल हित स्थायी होते हैं। यही कारण है कि सत्ता के केंद्र में बैठा व्यक्ति धीरे-धीरे अपने ही सहयोगियों से घिरा हुआ महसूस करने लगता है।


जब किसी दल में वैचारिक अनुशासन कमजोर हो जाता है, तब महत्वाकांक्षाएँ संगठन से बड़ी हो जाती हैं। हर नेता स्वयं को भविष्य का चेहरा मानने लगता है। ऐसे में संघर्ष केवल विपक्ष से नहीं होता है, बल्कि पार्टी के भीतर ही शुरू हो जाता है। यह संघर्ष खुला कम और परदे के पीछे अधिक होता है। मुस्कुराते चेहरों के पीछे अविश्वास की लंबी कहानियाँ छिपी रहती हैं। भारतीय राजनीति में यह स्थिति नई नहीं है। इतिहास गवाह है कि अधिकांश बड़े दल अंततः अंदरूनी संघर्ष के कारण कमजोर हुए हैं। जनता पार्टी का विघटन हो, कांग्रेस का टूटना हो, समाजवादी धारा का बिखराव हो या क्षेत्रीय दलों में पारिवारिक संघर्ष। हर जगह सत्ता की यही त्रासदी दिखाई देती है।


आज यदि कोई दल इस संकट का सबसे बड़ा प्रतीक बन चुका है तो वह है कांग्रेस। कभी देश की राजनीति पर दशकों तक राज करने वाली पार्टी आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि लगातार चुनावी हार के बावजूद कांग्रेस आत्ममंथन की जगह अंतर्कलह में उलझी रहती है। केरल इसका ताजा उदाहरण है। पिछले कई दिनों से वहाँ कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर जो संघर्ष चल रहा है, उसने पार्टी की वास्तविक स्थिति को उजागर कर दिया है। मुख्यमंत्री पद की घोषणा से पहले जिस तरह गुटबाजी, बयानबाजी और शक्ति प्रदर्शन हुआ, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि कांग्रेस के भीतर अब विचारधारा से अधिक व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ सक्रिय हैं।


कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह आज भी अपने संगठनात्मक ढाँचे को आधुनिक राजनीतिक जरूरतों के अनुरूप नहीं ढाल सकी। पार्टी में निर्णय प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। नेतृत्व को लेकर स्पष्टता नहीं है। युवा नेताओं और पुराने नेतृत्व के बीच संतुलन नहीं बन पा रहा है। परिणामस्वरूप हर चुनाव के बाद पार्टी के भीतर असंतोष और अधिक बढ़ जाता है। राजनीति में समय बहुत मायने रखता है। जो निर्णय समय पर लिए जाएँ, वही संगठन को बचाते हैं। लेकिन कांग्रेस अक्सर निर्णय लेने में देर करती है। जब तक निर्णय आता है, तब तक नुकसान हो चुका होता है। यही कारण है कि पार्टी लगातार कमजोर होती चली गई।


हर बड़े राजनीतिक दल में एक “मठाधीश्वर” होता है। एक ऐसा नेता जिसके इर्द-गिर्द पूरी सत्ता घूमती है। लेकिन जैसे-जैसे समय बदलता है, वैसे-वैसे उसके सामने चुनौती देने वाले चेहरे भी उभरने लगते हैं। यही वह समय होता है जब संगठन के भीतर संघर्ष तेज हो जाता है। मठाधीश्वर की सबसे बड़ी चिंता विपक्ष नहीं है, बल्कि अपने ही दल के भीतर उभरते चेहरे होते हैं। क्योंकि बाहरी विरोधी से लड़ना आसान है, लेकिन अंदरूनी चुनौती को नियंत्रित करना कठिन होता है। यही कारण है कि कई नेता अपने आसपास ऐसे लोगों को ही बढ़ावा देते हैं जो उनकी सत्ता के लिए खतरा न बनें।


राजनीति का स्वभाव ऐसा है कि महत्वाकांक्षा को अधिक समय तक दबाया नहीं जा सकता। धीरे-धीरे वही लोग चुनौती बनकर सामने आने लगते हैं। फिर संगठन दो हिस्सों में बँटने लगता है। एक सत्ता के साथ और दूसरा सत्ता की प्रतीक्षा में। यही स्थिति कई क्षेत्रीय दलों में भी दिखाई देती है, जहाँ नेतृत्व का सवाल उत्तराधिकार की लड़ाई में बदल जाता है। परिवारवाद इस संघर्ष को और जटिल बना देता है।


यदि राष्ट्रीय राजनीति में कांग्रेस संकट का प्रतीक है, तो बिहार की राजनीति सत्ता और उत्तराधिकार की जटिलताओं का सबसे बड़ा उदाहरण बन चुकी है। बिहार लंबे समय से गठबंधन, पलटवार, राजनीतिक प्रयोग और नेतृत्व परिवर्तन की राजनीति का केंद्र रहा है। आज पूरा राजनीतिक विमर्श इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता दिखाई देता है कि आखिर सत्ता से दूरी के बाद भी राजनीतिक सक्रियता क्यों बनी रहती है? क्यों कई बार पद छोड़ने के बाद भी नेता पूरी तरह पीछे नहीं हटते? और क्यों उत्तराधिकार की चर्चा अचानक तेज हो जाती है?


बिहार में पिछले वर्षों की राजनीति को देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि सत्ता केवल शासन का माध्यम नहीं रही, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व का आधार बन गई है। सत्ता से बाहर होते ही नेता के आसपास का पूरा तंत्र कमजोर पड़ने लगता है। समर्थक बिखरने लगते हैं। राजनीतिक हैसियत पर प्रश्न उठने लगते हैं। यही कारण है कि कोई भी नेता सत्ता से पूरी तरह दूर नहीं जाना चाहता है। राजनीति में प्रतीक बहुत मायने रखते हैं। कोई पद छोड़ना, कोई पद बनाए रखना, कोई नया चेहरा आगे लाना, इन सबके पीछे राजनीतिक संकेत छिपे होते हैं। जनता केवल घटनाएँ देखती है, लेकिन राजनीति संकेतों की भाषा में चलती है।


भारतीय राजनीति का एक बड़ा संकट उत्तराधिकार की राजनीति भी है। लगभग हर बड़े दल में अब यह सवाल मौजूद है कि अगला नेतृत्व कौन संभालेगा। यही सवाल अंतर्कलह को जन्म देता है। कई क्षेत्रीय दलों में नई पीढ़ी को राजनीति में लाने की कोशिशें हो रही हैं। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यह प्रक्रिया स्वाभाविक राजनीतिक विकास की बजाय सत्ता संरक्षण का माध्यम बन जाती है। तब पार्टी के पुराने नेता स्वयं को उपेक्षित महसूस करने लगते हैं। उन्हें लगता है कि वर्षों की मेहनत के बाद भी निर्णय परिवार या खास समूह तक सीमित हैं। यहीं से असंतोष जन्म लेता है। कई बार यह असंतोष खुलकर सामने नहीं आता, लेकिन भीतर ही भीतर संगठन को कमजोर करता रहता है। राजनीति में चुप्पी हमेशा सहमति का संकेत नहीं होती है बल्कि कई बार वह बड़े विस्फोट की तैयारी होती है।


राजनीति केवल घटनाओं का खेल नहीं है, बल्कि समय का विज्ञान भी है। कौन सा निर्णय कब लिया जाए, किसे कब आगे बढ़ाया जाए, किसे कब रोका जाए, यही किसी नेता की वास्तविक क्षमता को तय करता है। कई बार नेता निर्णय लेने में देर कर देते हैं। वे यह मान बैठते हैं कि उनका प्रभाव हमेशा बना रहेगा। लेकिन राजनीति में स्थायी कुछ भी नहीं होता है। जनता का मूड, संगठन की ताकत, सहयोगियों की निष्ठा, सब समय के साथ बदलते रहते हैं। जो नेता समय को पढ़ लेते हैं, वे लंबे समय तक टिके रहते हैं। जो समय को नजरअंदाज करते हैं, वे धीरे-धीरे हाशिए पर चले जाते हैं। भारतीय राजनीति में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहाँ कभी अपराजेय दिखने वाले नेता अचानक कमजोर पड़ गए। कारण केवल चुनावी हार नहीं थी, बल्कि समय की नब्ज को न समझ पाना था।


सत्ता व्यक्ति को बदल देती है। लंबे समय तक सत्ता में रहने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे यह मानने लगता है कि वही संगठन है और वही व्यवस्था है। यही भ्रम सबसे ज्यादा खतरनाक होता है, क्योंकि जैसे ही नेता स्वयं को संगठन से बड़ा मानने लगता है, संगठन कमजोर होने लगता है। सत्ता का मनोविज्ञान व्यक्ति को असुरक्षित भी बनाता है। उसे हर तरफ षड्यंत्र दिखाई देने लगता है। वह अपने सहयोगियों पर भी पूरी तरह भरोसा नहीं कर पाता है। परिणामस्वरूप निर्णय प्रक्रिया सीमित होती जाती है और संगठन में संवाद खत्म होने लगता है। जब संवाद खत्म होता है, तब अंतर्कलह बढ़ती है। फिर हर गुट अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष शुरू कर देता है।


भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि देश लोकतांत्रिक है, लेकिन अधिकांश राजनीतिक दल आंतरिक रूप से लोकतांत्रिक नहीं हैं। निर्णय कुछ लोगों तक सीमित रहते हैं। संगठनात्मक चुनाव औपचारिकता बन जाते हैं। विचारधारा की जगह व्यक्तिपूजा हावी हो जाती है। जब दलों के भीतर लोकतंत्र कमजोर होता है, तब अंतर्कलह बढ़ना स्वाभाविक है, क्योंकि जिन नेताओं को अपनी बात रखने का अवसर नहीं मिलता, वे अंततः गुटबाजी का रास्ता अपनाते हैं। कांग्रेस का संकट हो, क्षेत्रीय दलों का संघर्ष हो या राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की लड़ाई, हर जगह यही समस्या दिखाई देती है।


आज की जनता पहले जैसी नहीं रही। सोशल मीडिया और सूचना क्रांति के दौर में राजनीतिक घटनाएँ तुरंत जनता तक पहुँचती हैं। लोग अब केवल भाषण नहीं देखते, बल्कि नेताओं के व्यवहार, उनके रिश्तों और उनके संघर्षों को भी समझते हैं। जब जनता किसी दल को लगातार अंतर्कलह में उलझा देखती है, तो उसका विश्वास कमजोर होने लगता है। क्योंकि जनता स्थिरता चाहती है। उसे ऐसा नेतृत्व चाहिए जो संघर्ष की बजाय समाधान दे सके। यही कारण है कि कई बार जनता वैचारिक मतभेदों के बावजूद मजबूत और स्पष्ट नेतृत्व को प्राथमिकता देती है।


सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या राजनीतिक दल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठ पाएँगे? क्या दलों में आंतरिक लोकतंत्र मजबूत होगा? क्या नेतृत्व का संक्रमण सहज हो पाएगा? इन प्रश्नों का उत्तर आसान नहीं है। लेकिन इतना निश्चित है कि जो दल समय रहते स्वयं को नहीं बदलेंगे, वे धीरे-धीरे कमजोर होते जाएँगे। राजनीति में केवल इतिहास के सहारे भविष्य नहीं बनाया जा सकता है। कांग्रेस के सामने यही चुनौती है। बिहार की राजनीति भी इसी मोड़ पर खड़ी दिखाई देती है। हर दल को यह समझना होगा कि सत्ता स्थायी नहीं होती है। जनता का विश्वास ही वास्तविक शक्ति है।


आज भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा संकट यही है कि अधिकांश दल समाज से अधिक अपने सिंहासन को बचाने में व्यस्त दिखाई देते हैं। सत्ता का संघर्ष इतना तीखा हो चुका है कि विचार, सिद्धांत और जनहित पीछे छूटते जा रहे हैं। जब हर व्यक्ति अदृश्य कटार लेकर दूसरे के पाँव काटने में जुट जाए, तब संगठन अंततः कमजोर ही होता है और जब मठाधीश्वर की सारी ऊर्जा केवल अपना सिंहासन बचाने में लग जाए, तब राजनीतिक पतन लगभग तय हो जाता है।


राजनीति में समय सबसे बड़ा निर्णायक होता है। वह हर चेहरे का वास्तविक आकार सामने ले आता है। काल के गाल में छिपी तस्वीरें धीरे-धीरे बाहर आती हैं और फिर इतिहास तय करता है कि कौन नेता था, कौन केवल सत्ता का यात्री। भारतीय राजनीति आज ऐसे ही संक्रमणकाल से गुजर रही है। आने वाले वर्षों में यह तय होगा कि दल अपने भीतर लोकतंत्र और संवाद को मजबूत करते हैं या फिर अंतर्कलह और उत्तराधिकार की राजनीति में उलझकर स्वयं को कमजोर करते रहते हैं। क्योंकि जनता सब देखती है, समय सब याद रखता है और इतिहास किसी के साथ स्थायी समझौता नहीं करता है।



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