01 जुलाई से लागू होगा वीबी-जी राम जी अधिनियम

Jitendra Kumar Sinha
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केंद्र सरकार ने देश की ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में बड़ा बदलाव करते हुए घोषणा की है कि “विकसित भारत- रोजगार और आजीविका के लिए गारंटी मिशन” यानि वीबी-जी राम जी अधिनियम आगामी 1 जुलाई से पूरे देश में लागू किया जाएगा। इसके साथ ही लगभग दो दशक पुराना महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) समाप्त हो जाएगा। सरकार ने इसे ग्रामीण विकास और रोजगार प्रणाली में ऐतिहासिक परिवर्तन बताया है।


ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से जारी अधिसूचना के अनुसार, यह नया कानून सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एक साथ लागू होगा। सरकार का दावा है कि यह अधिनियम केवल रोजगार उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को अधिक मजबूत, आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में भी काम करेगा।


वीबी-जी राम जी अधिनियम का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को रोजगार की वैधानिक गारंटी देना है। इस योजना के तहत प्रत्येक पात्र ग्रामीण परिवार को साल में 125 दिनों तक मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार ने कहा है कि रोजगार निर्धारित समय सीमा के भीतर देना अनिवार्य होगा। यदि किसी पात्र व्यक्ति को तय समय के भीतर काम उपलब्ध नहीं कराया जाता है, तो उसे बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान भी रखा गया है। यह प्रावधान पहले मनरेगा में भी मौजूद था, लेकिन सरकार का कहना है कि नए कानून में इसकी निगरानी और जवाबदेही अधिक मजबूत होगी।


मनरेगा को ग्रामीण गरीबों के लिए सुरक्षा कवच माना जाता रहा है। वर्ष 2005 में लागू हुई इस योजना ने करोड़ों लोगों को रोजगार उपलब्ध कराया। खासकर कोरोना महामारी के दौरान मनरेगा ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभालने में बड़ी भूमिका निभाई थी। लेकिन समय के साथ इस योजना पर भ्रष्टाचार, फर्जी जॉब कार्ड, भुगतान में देरी और उत्पादक कार्यों की कमी जैसे आरोप भी लगते रहे हैं।


सरकार का कहना है कि वीबी-जी राम जी अधिनियम इन कमजोरियों को दूर करेगा। नए मॉडल में डिजिटल निगरानी, समयबद्ध भुगतान और कौशल आधारित कार्यों को अधिक महत्व दिया जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में केवल गड्ढे खोदने या सड़क निर्माण जैसे पारंपरिक कार्यों तक सीमित रहने के बजाय जल संरक्षण, ग्रामीण उद्योग, कृषि आधारित परियोजनाएं, डिजिटल अवसंरचना और स्थानीय रोजगार सृजन पर जोर दिया जाएगा।


केंद्र सरकार ने 2026-27 के लिए ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम हेतु 95,692.31 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है, जिसे अब तक का सबसे बड़ा आवंटन बताया जा रहा है। यदि राज्यों के संभावित योगदान को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो इस कार्यक्रम पर कुल खर्च 1.51 लाख करोड़ रुपये से अधिक होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी राशि का निवेश ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नई ऊर्जा ला सकता है। इससे गांवों में रोजगार बढ़ेगा, पलायन कम होगा और स्थानीय स्तर पर विकास कार्यों को गति मिलेगी। 


नए कानून से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है। सरकार का मानना है कि यह योजना केवल अस्थायी मजदूरी देने की बजाय ग्रामीण आजीविका को स्थायी रूप से मजबूत करेगी। यदि योजना का प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन होता है तो इससे कृषि आधारित उद्योगों, छोटे व्यवसायों और स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा मिल सकता है। गांवों में युवाओं के लिए नए अवसर पैदा हो सकते हैं। साथ ही महिलाओं की भागीदारी बढ़ने की भी संभावना है, क्योंकि ग्रामीण रोजगार योजनाओं में महिलाओं की उपस्थिति हमेशा महत्वपूर्ण रही है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मनरेगा जैसी व्यापक और स्थापित योजना को समाप्त करना जोखिम भरा कदम हो सकता है। उनका मानना है कि नई योजना को जमीनी स्तर पर सफल बनाने के लिए पारदर्शिता, समय पर भुगतान और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।


सरकार की इस घोषणा के बाद राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने मनरेगा को समाप्त करने के फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि मनरेगा गरीबों के लिए जीवनरेखा रही है और इसे पूरी तरह खत्म करने के बजाय सुधार की आवश्यकता थी। कुछ विपक्षी नेताओं ने आशंका जताई है कि नई योजना में निजीकरण और केंद्रीकरण बढ़ सकता है। वहीं सरकार का दावा है कि यह कानून “विकसित भारत” की सोच के अनुरूप ग्रामीण भारत को नई दिशा देगा।


वीबी-जी राम जी अधिनियम को सरकार ग्रामीण भारत के लिए नई शुरुआत के रूप में प्रस्तुत कर रही है। यदि योजना पारदर्शी तरीके से लागू होती है और रोजगार वास्तव में समय पर उपलब्ध कराया जाता है, तो यह ग्रामीण क्षेत्रों की आर्थिक तस्वीर बदल सकती है। लेकिन किसी भी नई योजना की सफलता केवल घोषणाओं से तय नहीं होती है। उसका असली मूल्यांकन जमीन पर उसके प्रभाव से होता है। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि नया कानून मनरेगा की जगह कितनी प्रभावी तरीके से ले पाता है और क्या यह वास्तव में ग्रामीण भारत को आत्मनिर्भर बनाने में सफल होता है।



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